भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2329, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2329

ततः स देवराड् देवैर्ऋषिभिः स्तूयमानस्त्रिविष्ट-पस्थो निष्कल्मषो बभूव ह ब्रह्मवध्यां चतुर्षु स्थानेषु वनिताग्निवनस्पतिगोषु व्यभजदेवमिन्द्रो ब्रह्मतेजः-प्रभावोपबृंहितः शत्रुवधं कृत्वा स्वं स्थानं प्रापितः ॥ ५३ ॥ तदनन्तर देवताओं और ऋषियोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए देवराज इन्द्र निष्पाप हो स्वर्गलोकमें रहने लगे। अपनी ब्रह्महत्याको उन्होंने स्त्री, अग्नि, वृक्ष और गौ—इन चार स्थानोंमें विभक्त कर दिया। ब्रह्मतेजके प्रभावसे वृद्धिको प्राप्त हुए इन्द्रने शत्रुओंका वध करके पुनः अपना स्थान प्राप्त कर लिया ॥ ५३ ॥

(नहुषस्य शापमोक्षनिमित्तं देवैर्ऋषिभिश्च याच्यमानोऽगस्त्यः प्राह। यावत् स्वकुलजः श्रीमान् धर्मराजो युधिष्ठिरः। कथयित्वा स्वकान् प्रश्नान् भीमं तं च विमोक्ष्यते ॥) उधर नहुषको शापसे छुटकारा दिलानेके लिये देवताओं और ऋषियोंके प्रार्थना करनेपर अगस्त्यने कहा—‘जब नहुषके कुलमें उत्पन्न हुए श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर उनके प्रश्नोंका उत्तर देकर भीमसेनको उनके बन्धनसे छुड़ा देंगे, तब नहुषको भी वे शापसे मुक्त कर देंगे’ ॥

आकाशगङ्गागतश्च पुरा भरद्वाजो महर्षिरुपास्पृशत् त्रीन् क्रमान् क्रमता विष्णुनाभ्यासादितः स भरद्वाजेन ससलिलेन पाणिनोरसि ताडितः सलक्षणोरस्कः संवृत्तः ॥ ५४ ॥ प्राचीन कालमें महर्षि भरद्वाज आकाश-गंगाके जलमें खड़े हो आचमन कर रहे थे। उस समय तीन पगसे त्रिलोकीको नापते हुए भगवान् विष्णु उनके पासतक आ पहुँचे। तब भरद्वाजने जलसहित हाथसे उनकी छातीमें प्रहार किया। इससे उनकी छातीमें एक चिह्न बन गया ॥ ५४ ॥

भृगुणा महर्षिणा शप्तोऽग्निः सर्वभक्षत्वमुपानीतः ॥ ५५ ॥ महर्षि भृगुके शापसे अग्निदेव सर्वभक्षी हो गये ॥ ५५ ॥

अदितिर्वै देवानामन्नमपचदेतद् भुक्त्वासुरान् हनिष्यन्तीति तत्र बुधो व्रतचर्यासमाप्तावागच्छदितिं चावोचद् भिक्षां देहीति तत्र देवैः पूर्वमेतत् प्राश्यं नान्येनेत्यदितिर्भिक्षां नादादथ भिक्षाप्रत्याख्यान-रुषितेन बुधेन ब्रह्मभूतेनादितिः शप्ता अदितेरुदरे भविष्यति व्यथा विवस्वतो द्वितीयजन्मन्यण्डसंज्ञितस्य अण्डं मातुरदित्या मारितं स मार्तण्डो विस्वानभवच्छाद्धदेवः ॥ ५६ ॥ अदितिने देवताओंके लिये इस उद्देश्यसे रसोई तैयार की थी कि वे इसे खाकर असुरोंका वध कर सकेंगे। इसी समय बुध अपनी व्रतचर्या समाप्त करके अदितिके पास गये और बोले—‘मुझे भिक्षा दीजिये।’ अदितिने सोचा यह अन्न पहले देवताओंको ही खाना चाहिये, दूसरे किसीको नहीं; इसलिये उन्होंने बुधको भिक्षा नहीं दी। भिक्षा न मिलनेसे रोषमें भरे हुए ब्राह्मण बुधने अदितिको यह शाप दिया कि ‘अण्ड नामधारी विवस्वान्‌के