महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2337, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेदोंमें जिनकी स्तुति की गयी है तथा इस जगत्में योगीजन सदा जिनकी पूजा और स्मरण करते हैं, वह तेजस्वी 'हिरण्यगर्भ' मैं ही हूँ ।। ९६ ।। एकविंशतिसाहस्रं ऋग्वेदं मां प्रचक्षते । सहस्रशाखं यत् साम ये वै वेदविदो जनाः ।। ९७ ।। वेदके विद्वान् मुझे ही इक्कीस हजार ऋचाओंसे युक्त 'ऋग्वेद' और एक हजार शाखाओंवाला 'सामवेद' कहते हैं ।। ९७ ।। गायन्त्यारण्यके विप्रा मद्भक्तास्ते हि दुर्लभाः । षट्पञ्चाशतमष्टौ च सप्तत्रिंशतमित्युत ।। ९८ ।। यस्मिन् शाखा यजुर्वेदे सोऽहमाध्वर्यवे स्मृतः । आरण्यकोंमें ब्राह्मणलोग मेरा ही गान करते हैं। वे मेरे परम भक्त दुर्लभ हैं। जिस यजुर्वेदकी छप्पन+आठ+सैंतीस=एक सौ एक शाखाएँ मौजूद हैं, उस यजुर्वेदमें भी मेरा ही गान किया गया है ।। ९८ ½ ।। पञ्चकल्पमथर्वाणं कृत्याभिः परिबृंहितम् ।। ९९ ।। कल्पयन्ति हि मां विप्रा अथर्वाणविदस्तथा । अथर्ववेदी ब्राह्मण मुझे ही कृत्याओं आभिचारिक प्रयोगोंसे सम्पन्न पंचकल्पात्मक 'अथर्ववेद' मानते हैं ।। शाखाभेदाश्च ये केचिद् याश्च शाखासु गीतयः ।। १०० ।। स्वरवर्णसमुच्चाराः सर्वांस्तान् विद्धि मत्कृतान् । वेदोंमें जो भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं, उन शाखाओंमें जितने गीत हैं तथा उन गीतोंमें स्वर और वर्णके उच्चारण करनेकी जितनी रीतियाँ हैं, उन सबको मेरी बनायी हुई ही समझो ।। १०० ½ ।। यत् तद् हयशिरः पार्थ समुदेति वरप्रदम् ।। १०१ ।। सोऽहमेवोत्तरे भागे क्रमाक्षरविभागवित् । कुन्तीनन्दन! सबको वर देनेवाले जो हयग्रीव प्रकट होते हैं, उनके रूपमें मैं ही अवतीर्ण होता हूँ। मैं ही उत्तरभागमें वेद-मन्त्रोंके क्रम-विभाग और अक्षर-विभागका ज्ञाता हूँ* ।। १०१ ½ ।। वामादेशितमार्गेण मत्प्रसादान्महात्मना ।। १०२ ।। पाञ्चालेन क्रमः प्राप्तस्तस्माद् भूतात् सनातनात् । महात्मा पांचालने वामदेवके बताये हुए ध्यान-मार्गसे मेरी आराधना करके मुझ सनातन पुरुषके ही कृपाप्रसादसे वेदका क्रमविभाग प्राप्त किया था ।। बाभ्रव्यगोत्रः स बभौ प्रथमं क्रमपारगः ।। १०३ ।। नारायणाद् वरं लब्ध्वा प्राप्य योगमनुत्तमम् ।