भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2338

क्रमं प्रणीय शिक्षां च प्रणयित्वा स गालवः ॥ १०४ ॥ बाभ्रव्य-गोत्रमें उत्पन्न हुए वे महर्षि गालव भगवान् नारायणसे वर एवं परम उत्तम योग पाकर वेदके क्रमविभाग एवं शिक्षाका प्रणयन करके सबसे पहले क्रमविभागके पारंगत विद्वान् हुए थे ॥ १०३-१०४ ॥

कण्डरीकोऽथ राजा च ब्रह्मदत्तः प्रतापवान् । जातीमरणजं दुःखं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः ॥ १०५ ॥ सप्तजातिषु मुख्यत्वाद् योगानां सम्पदं गतः । कण्डरीक-कुलमें उत्पन्न हुए प्रतापी राजा ब्रह्मदत्तने सात जन्मोंके जन्म-मृत्युसम्बन्धी दुःखोंका बार-बार स्मरण करके तीव्रतम वैराग्यके कारण शीघ्र ही योगजनित ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया था ॥ १०५ १/२ ॥

पुराहमात्मजः पार्थ प्रथितः कारणान्तरे ॥ १०६ ॥ धर्मस्य कुरुशार्दूल ततोऽहं धर्मजः स्मृतः । कुरुश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार! पूर्वकालमें किसी कारणवश मैं धर्मके पुत्ररूपसे प्रसिद्ध हुआ था। इसीलिये मुझे ‘धर्मज’ कहा गया है ॥ १०६ १/२ ॥

नरनारायणौ पूर्वं तपस्तेपतुरव्ययम् ॥ १०७ ॥ धर्मयानं समारूढौ पर्वते गन्धमादने । तत्कालसमये चैव दक्षयज्ञो बभूव ह ॥ १०८ ॥ पहले नर और नारायणने जब धर्ममय रथपर आरूढ हो गन्धमादन पर्वतपर अक्षय तप किया था, उसी समय प्रजापति दक्षका यज्ञ आरम्भ हुआ ॥ १०७-१०८ ॥

न चैवाकल्पयद् भागं दक्षो रुद्रस्य भारत । ततो दधीचिवचनाद् दक्षयज्ञमपाहरत् ॥ १०९ ॥ भारत! उस यज्ञमें दक्षने रुद्रके लिये भाग नहीं दिया था; इसलिये दधीचिके कहनेसे रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस कर डाला ॥ १०९ ॥

ससर्ज शूलं कोपेन प्रज्वलन्तं मुहुर्मुहुः । तच्छूलं भस्मसात्कृत्वा दक्षयज्ञं सविस्तरम् ॥ ११० ॥ आवयोः सहसागच्छद् बदर्याश्रममन्तिकात् । रुद्रने क्रोधपूर्वक अपने प्रज्वलित त्रिशूलका बारंबार प्रयोग किया। वह त्रिशूल दक्षके विस्तृत यज्ञको भस्म करके सहसा बदरिकाश्रममें हम दोनों (नर और नारायण) के निकट आ पहुँचा ॥ ११० १/२ ॥

वेगेन महता पार्थ पतन्नारायणोरसि ॥ १११ ॥ ततस्तत् तेजसाऽऽविष्टः केशा नारायणस्य ह । बभूवुर्मुञ्जवर्णास्तु ततोऽहं मुञ्जकेशवान् ॥ ११२ ॥