भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2347

यं दृष्टवन्तस्ते साक्षाच्छ्रीवत्साङ्कविभूषणम् ।। २२ ।। लोकपूजित भगवान् नारायणका दर्शन तो तपस्यासे ही हो सकता है; किंतु मेरे पितामहोंने श्रीवत्सके चिह्नसे विभूषित उन भगवान्‌का साक्षात् दर्शन अनायास ही पा लिया था ।। २२ ।।

तेभ्यो धन्यतरश्चैव नारदः परमेष्ठिजः । न चाल्पतेजसमृषिं वेद्मि नारदमव्ययम् ।। २३ ।। श्वेतद्वीपं समासाद्य येन दृष्टः स्वयं हरिः । देवप्रसादानुगतं व्यक्तं तत् तस्य दर्शनम् ।। २४ ।। उन सबसे भी अधिक धन्यवादके योग्य ब्रह्मपुत्र नारदजी हैं। मैं अविनाशी नारदजीको कम तेजस्वी ऋषि नहीं समझता, जिन्होंने श्वेतद्वीपमें पहुँचकर साक्षात् श्रीहरिका दर्शन प्राप्त कर लिया। उनका वह भगवद्-दर्शन स्पष्ट ही उन भगवान्‌की कृपाका फल है ।।

तद् दृष्टवांस्तदा देवमनिरुद्धतनौ स्थितम् । बदरीमाश्रमं यत् तु नारदः प्राद्रवत् पुनः ।। २५ ।। नरनारायणौ द्रष्टुं किं तु तत् कारणं मुने । मुने! नारदजीने उस समय श्वेतद्वीपमें जाकर जो अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित नारायणदेवका साक्षात्कार किया तथा पुनः नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये जो बदरिकाश्रमको प्रस्थान किया, इसका क्या कारण है? ।। २५ १/२ ।।

श्वेतद्वीपान्निवृत्तश्च नारदः परमेष्ठिजः ।। २६ ।। बदरीमाश्रमं प्राप्य समागम्य च तावृषी । कियन्तं कालमवसत् प्रश्नान् कान् पृष्टवांश्च ह ।। २७ ।। ब्रह्मपुत्र नारदजी श्वेतद्वीपसे लौटनेपर जब बदरिकाश्रममें पहुँचकर उन दोनों ऋषियोंसे मिले, तब वहाँ उन्होंने कितने समयतक निवास किया? और वहाँ उनसे किन-किन प्रश्नोंको पूछा? ।। २६-२७ ।।

श्वेतद्वीपादुपावृत्ते तस्मिन् वा सुमहात्मनि । किमब्रूतां महात्मानौ नरनारायणावृषी ।। २८ ।। तदेतन्मे यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि । श्वेतद्वीपसे लौटे हुए उन नारदजीसे महात्मा नर-नारायण ऋषियोंने क्या बात की थी? ये सब बातें आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें ।। २८ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ।। २९ ।। यस्य प्रसादाद् वक्ष्यामि नारायणकथामिमाम् ।