भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2348, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2348

**वैशम्पायनजीने कहा—**अमिततेजस्वी भगवान् व्यासको नमस्कार है, जिनके कृपाप्रसादसे मैं भगवान् नारायणकी यह कथा कह रहा हूँ॥ २९ १/२ ॥ प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम्॥ ३०॥ निवृत्तो नारदो राजंस्तरसा मेरुमागमत्। हृदयेनोद्वहन् भारं यदुक्तं परमात्मना ॥ ३१ ॥ राजन्! श्वेतनामक महाद्वीपमें जाकर वहाँ अविनाशी श्रीहरिका दर्शन करके जब नारदजी लौटे, तब बड़े वेगसे मेरुपर्वतपर आ पहुँचे। परमात्मा श्रीहरिने उनसे जो कुछ कहा था, उस कार्यभारको वे हृदयसे ढो रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ पश्चादस्याभवद् राजन्नात्मनः साध्वसं महत्। यद् गत्वा दूरमध्वानं क्षेमी पुनरिहागतः ॥ ३२ ॥ नरेश्वर! तत्पश्चात् उनके मनमें यह सोचकर बड़ा भारी विस्मय हुआ कि मैं इतनी दूरका मार्ग तय करके पुनः यहाँ सकुशल कैसे लौट आया? ॥ ३२ ॥ मेरोः प्रचक्राम ततः पर्वतं गन्धमादनम्। निपपात च खात् तूर्णं विशालां बदरीमनु ॥ ३३ ॥ तदनन्तर वे मेरुसे गन्धमादन पर्वतकी ओर चले और बदरीविशालतीर्थके समीप तुरंत ही आकाशसे नीचे उतर पड़े ॥ ३३ ॥ ततः स ददृशे देवौ पुराणावृषिसत्तमौ। तपश्चरन्तौ सुमहदात्मनिष्ठौ महाव्रतौ ॥ ३४ ॥ वहाँ उन्होंने उन दोनों पुरातन देवता ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायणका दर्शन किया, जो आत्मनिष्ठ हो महान् व्रत लेकर बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे ॥ ३४ ॥ तेजसाभ्यधिकौ सूर्यात् सर्वलोकविरोचनात्। श्रीवत्सलक्षणौ पूज्यौ जटामण्डलधारिणौ ॥ ३५ ॥ वे दोनों सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करनेवाले सूर्यसे भी अधिक तेजस्वी थे। उन पूज्य महात्माओंके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सके चिह्न सुशोभित हो रहे थे और वे अपने मस्तकपर जटामण्डल धारण किये हुए थे ॥ जालपादभुजौ तौ तु पादयोश्चक्रलक्षणौ। व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ तथा मुष्कचतुष्किणौ ॥ ३६ ॥ षष्टिदन्तावष्टदंष्ट्रौ मेघौघसदृशस्वनौ। स्वाक्यौ पृथुललाटौ च सुभ्रू सुहनुनासिकौ ॥ ३७ ॥ उनके हाथोंमें हंसका और चरणोंमें चक्रका चिह्न था। विशाल वक्षःस्थल, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, अण्डकोशमें चार-चार बीज, मुखमें साठ दाँत और आठ दाढ़ें, मेघके समान गम्भीर स्वर, सुन्दर मुख, चौड़े ललाट, बाँकी भौंहें, सुन्दर ठोढ़ी और मनोहर नासिकासे उन दोनोंकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ३६-३७ ॥