महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2349, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंआतपत्रेण सदृशे शिरसी देवयोस्तयोः । एवं लक्षणसम्पन्नौ महापुरुषसंज्ञितौ ॥ ३८ ॥ तौ दृष्ट्वा नारदो हृष्टस्ताभ्यां च प्रतिपूजितः । स्वागतेनाभिभाष्याथ पृष्टश्चानामयं तथा ॥ ३९ ॥ उन दोनों देवताओंके मस्तक छत्रके समान प्रतीत होते थे। ऐसे शुभलक्षणोंसे सम्पन्न उन दोनों महापुरुषोंका दर्शन करके नारदजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। भगवान् नर और नारायणने भी नारदजीका स्वागत-सत्कार करके उनका कुशल-समाचार पूछा ॥ ३८-३९ ॥ बभूवान्तर्गतमतिर्निरीक्ष्य पुरुषोत्तमौ । सदोगतास्तत्र ये वै सर्वभूतनमस्कृताः ॥ ४० ॥ श्वेतद्वीपे मया दृष्टास्तादृशावृषिसत्तमौ । तदनन्तर नारदजीने उन दोनों पुरुषोत्तमोंकी ओर देखकर मन-ही-मन विचार किया, अहो! मैंने श्वेतद्वीपमें भगवान्की सभाके भीतर जिन सर्वभूतवन्दित सदस्योंको देखा था, ये दोनों ऋषिश्रेष्ठ भी वैसे ही हैं ॥ इति संचिन्त्य मनसा कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ॥ ४१ ॥ स चोपविविशे तत्र पीठे कुशमये शुभे । मन-ही-मन ऐसा सोचकर वे उन दोनोंकी प्रदक्षिणा करके एक सुन्दर कुशासनपर बैठ गये ॥ ४१ १/२ ॥ ततस्तौ तपसां वासौ यशसां तेजसामपि ॥ ४२ ॥ ऋषी शमदमोपेतौ कृत्वा पौर्वाह्लिकं विधिम् । पश्चान्नारदमव्यग्रौ पाद्यार्घ्याभ्यामथार्चतः ॥ ४३ ॥ तदनन्तर तपस्या, यश और तेजके भी निवासस्थान वे शम-दमसम्पन्न दोनों ऋषि पूर्वाह्नकालका नित्य कर्म पूर्ण करके फिर शान्त-भावसे पाद्य और अर्घ्य आदि निवेदन करके नारदजीकी पूजा करने लगे ॥ ४२-४३ ॥ पीठयोश्चोपविष्टौ तौ कृतातिथ्याह्निकौ नृप । तेषु तत्रोपविष्टेषु स देशोऽभिव्यराजत ॥ ४४ ॥ आज्याहुतिमहाज्वालैर्यज्ञवाटो यथाग्निभिः । नरेश्वर! अपने नित्यकर्म तथा नारदजीका आतिथ्य-सत्कार करके वे दोनों ऋषि भी कुशासनपर बैठ गये। वहाँ उन तीनोंके बैठ जानेपर वह प्रदेश घीकी आहुतिसे प्रज्वलित विशाल लपटोंवाले तीन अग्नियोंसे प्रकाशित यज्ञमण्डपकी भाँति सुशोभित होने लगा ॥ ४४ १/२ ॥ अथ नारायणस्तत्र नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ ४५ ॥ सुखोपविष्टं विश्रान्तं कृतातिथ्यं सुखस्थितम् ।