भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2364, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2364

सूतपुत्र कहते हैं— शौनक! वैशम्पायनजीके मुखसे यह महान् उपाख्यान सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजयने अपने यज्ञको पूर्ण करनेका सारा कार्य आरम्भ किया ।। १५ ।। नारायणीयमाख्यानमेतत् ते कथितं मया । पृष्टेन शौनकाद्येह नैमिषारण्यवासिषु ।। १६ ।। शौनक! आज तुम्हारे प्रश्नके अनुसार इन नैमिषा-रण्यनिवासी मुनियोंके समीप मैंने यहाँ यह नारायणका माहात्म्य-सम्बन्धी उपाख्यान तुम्हें सुनाया है ।। १६ ।। नारदेन पुरा राजन् गुरवे मे निवेदितम् । ऋषीणां पाण्डवानां च शृण्वतः कृष्णभीष्मयोः ।। १७ ।। राजन्! पूर्वकालमें नारदजीने ऋषियों, पाण्डवों, श्रीकृष्ण तथा भीष्मके सुनते हुए यह प्रसंग मेरे गुरु व्यासजीको बताया था ।। १७ ।। स हि परमगुरुर्जनभुवनपतिः पृथुधरणिधरः श्रुतिविनयनिधिः । शमनियमनिधिर्द्विजपरमहित- स्तव भवतु गतिर्हरिरमरहितः ।। १८ ।। वे परम गुरु, जनपति, भुवनपति, विशाल पृथ्वीको धारण करनेवाले, वेदज्ञान और विनयके भण्डार, शम और नियमकी निधि, ब्राह्मणोंके परम हितैषी तथा देवताओंके हितचिन्तक श्रीहरि तुम्हारे आश्रय हों ।। १८ ।। असुरवधकरस्तपसां निधिः सुमहतां यशसां च भाजनम् । मधुकैटभहा कृतधर्मविदां गतिदो- ऽभयदो मखभागहरोऽस्तु शरणं स ते ।। १९ ।। असुरोंका वध करनेवाले, तपस्याकी निधि, विशाल यशके भाजन, मधु और कैटभके हन्ता, सत्ययुगके धर्मोंका ज्ञान रखकर उनका पालन करनेवालोंको सद्गति प्रदान करनेवाले, अभयदाता तथा यज्ञका भाग ग्रहण करनेवाले भगवान् नारायण तुम्हें शरण दें ।। १९ ।। त्रिगुणो विगुणश्चतुरात्मधरः पूर्तेष्टयोश्च फलभागहरः । विदधातु नित्यमजितोऽतिचलो गतिमात्मगां सुकृतिनामृषीणाम् ।। २० ।। जो तीनों गुणोंसे विशिष्ट होते हुए भी निर्गुण हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नामक चार विग्रहोंको धारण करनेवाले हैं, इष्ट (यज्ञ-याग आदि), आपूर्त (वापी, कूप, तड़ाग-निर्माण आदि) के फलभागको ग्रहण करनेवाले हैं, जो कभी किसीसे पराजित