महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्मा हि पुरुषव्याघ्र ज्ञेयो विष्णुरिति स्थितिः ।
पुरुषसिंह! भगवान् विष्णुको सबका आत्मा जानना चाहिये। यही वास्तविक स्थिति है। कोई भी मनुष्य भला अपने आत्माके साथ द्वेष कैसे कर सकता है? ।। ७ १/२ ।।
य एष गुरुरस्माकमृषिर्गन्धवतीसुतः ।। ८ ।।
तेनैतत् कथितं तात माहात्म्यं परमव्ययम् ।
तस्माच्छ्रुतं मया चेदं कथितं च तवानघ ।। ९ ।।
तात! ये जो हमलोगोंके गुरु गन्धवतीपुत्र महर्षि व्यास बैठे हैं, इन्होंने ही भगवान्के परम उत्तम अविनाशी माहात्म्यका वर्णन किया है। निष्पाप! उन्हींसे मैंने यह सब सुना है और मेरेद्वारा तुमको भी कहा गया है ।। ८-९ ।।
नारदेन तु सम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः ।
एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप ।। १० ।।
नरेश्वर! देवर्षि नारदने तो रहस्य और संग्रह-सहित इस धर्मको साक्षात् जगदीश्वर नारायणसे ही प्राप्त किया था ।। १० ।।
एवमेष महान् धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम ।
कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ।। ११ ।।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार यह महान् धर्म मैंने तुम्हें पहले हरिगीतामें संक्षेपसे बताया है ।। ११ ।।
कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं भुवि ।
को ह्यन्यः पुरुषव्याघ्र महाभारतकृद् भवेत् ।। १२ ।।
पुरुषसिंह! तुम कृष्णद्वैपायन व्यासको इस भूतलपर नारायणका ही स्वरूप समझो। भला, भगवान्के सिवा दूसरा कौन महाभारतका कर्ता हो सकता है? ।। १२ ।।
धर्मान् नानाविधांश्चैव को ब्रूयात् तमृते प्रभुम् ।। १३ ।।
वर्ततां ते महायज्ञो यथा संकल्पितस्त्वया ।
संकल्पिताश्वमेधस्त्वं श्रुतधर्मश्च तत्त्वतः ।। १४ ।।
भगवान्के सिवा दूसरा कौन ऐसा है, जो नाना प्रकारके धर्मोंका वर्णन कर सके? तुम्हारा यह महान् यज्ञ, जैसा कि तुमने संकल्प कर रखा है, निरन्तर चालू रहे। तुमने अश्वमेध-यज्ञ करनेका संकल्प लिया है और सब धर्मोंका यथार्थ रूपसे श्रवण किया है ।। १३-१४ ।।
सौतिरुवाच
एतत् तु महदाख्यानं श्रुत्वा पार्थिवसत्तमः ।
ततो यज्ञसमाप्त्यर्थं क्रियाः सर्वाः समारभत् ।। १५ ।।