महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
आत्मा हि पुरुषव्याघ्र ज्ञेयो विष्णुरिति स्थितिः ।
पुरुषसिंह! भगवान् विष्णुको सबका आत्मा जानना चाहिये। यही वास्तविक स्थिति है। कोई भी मनुष्य भला अपने आत्माके साथ द्वेष कैसे कर सकता है? ।। ७ १/२ ।।
य एष गुरुरस्माकमृषिर्गन्धवतीसुतः ।। ८ ।।
तेनैतत् कथितं तात माहात्म्यं परमव्ययम् ।
तस्माच्छ्रुतं मया चेदं कथितं च तवानघ ।। ९ ।।
तात! ये जो हमलोगोंके गुरु गन्धवतीपुत्र महर्षि व्यास बैठे हैं, इन्होंने ही भगवान्के परम उत्तम अविनाशी माहात्म्यका वर्णन किया है। निष्पाप! उन्हींसे मैंने यह सब सुना है और मेरेद्वारा तुमको भी कहा गया है ।। ८-९ ।।
नारदेन तु सम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः ।
एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप ।। १० ।।
नरेश्वर! देवर्षि नारदने तो रहस्य और संग्रह-सहित इस धर्मको साक्षात् जगदीश्वर नारायणसे ही प्राप्त किया था ।। १० ।।
एवमेष महान् धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम ।
कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ।। ११ ।।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार यह महान् धर्म मैंने तुम्हें पहले हरिगीतामें संक्षेपसे बताया है ।। ११ ।।
कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं भुवि ।
को ह्यन्यः पुरुषव्याघ्र महाभारतकृद् भवेत् ।। १२ ।।
पुरुषसिंह! तुम कृष्णद्वैपायन व्यासको इस भूतलपर नारायणका ही स्वरूप समझो। भला, भगवान्के सिवा दूसरा कौन महाभारतका कर्ता हो सकता है? ।। १२ ।।
धर्मान् नानाविधांश्चैव को ब्रूयात् तमृते प्रभुम् ।। १३ ।।
वर्ततां ते महायज्ञो यथा संकल्पितस्त्वया ।
संकल्पिताश्वमेधस्त्वं श्रुतधर्मश्च तत्त्वतः ।। १४ ।।
भगवान्के सिवा दूसरा कौन ऐसा है, जो नाना प्रकारके धर्मोंका वर्णन कर सके? तुम्हारा यह महान् यज्ञ, जैसा कि तुमने संकल्प कर रखा है, निरन्तर चालू रहे। तुमने अश्वमेध-यज्ञ करनेका संकल्प लिया है और सब धर्मोंका यथार्थ रूपसे श्रवण किया है ।। १३-१४ ।।
सौतिरुवाच
एतत् तु महदाख्यानं श्रुत्वा पार्थिवसत्तमः ।
ततो यज्ञसमाप्त्यर्थं क्रियाः सर्वाः समारभत् ।। १५ ।।
सूतपुत्र कहते हैं— शौनक! वैशम्पायनजीके मुखसे यह महान् उपाख्यान सुनकर राजाओंमें श्रेष्ठ जनमेजयने अपने यज्ञको पूर्ण करनेका सारा कार्य आरम्भ किया ।। १५ ।। नारायणीयमाख्यानमेतत् ते कथितं मया । पृष्टेन शौनकाद्येह नैमिषारण्यवासिषु ।। १६ ।। शौनक! आज तुम्हारे प्रश्नके अनुसार इन नैमिषा-रण्यनिवासी मुनियोंके समीप मैंने यहाँ यह नारायणका माहात्म्य-सम्बन्धी उपाख्यान तुम्हें सुनाया है ।। १६ ।। नारदेन पुरा राजन् गुरवे मे निवेदितम् । ऋषीणां पाण्डवानां च शृण्वतः कृष्णभीष्मयोः ।। १७ ।। राजन्! पूर्वकालमें नारदजीने ऋषियों, पाण्डवों, श्रीकृष्ण तथा भीष्मके सुनते हुए यह प्रसंग मेरे गुरु व्यासजीको बताया था ।। १७ ।। स हि परमगुरुर्जनभुवनपतिः पृथुधरणिधरः श्रुतिविनयनिधिः । शमनियमनिधिर्द्विजपरमहित- स्तव भवतु गतिर्हरिरमरहितः ।। १८ ।। वे परम गुरु, जनपति, भुवनपति, विशाल पृथ्वीको धारण करनेवाले, वेदज्ञान और विनयके भण्डार, शम और नियमकी निधि, ब्राह्मणोंके परम हितैषी तथा देवताओंके हितचिन्तक श्रीहरि तुम्हारे आश्रय हों ।। १८ ।। असुरवधकरस्तपसां निधिः सुमहतां यशसां च भाजनम् । मधुकैटभहा कृतधर्मविदां गतिदो- ऽभयदो मखभागहरोऽस्तु शरणं स ते ।। १९ ।। असुरोंका वध करनेवाले, तपस्याकी निधि, विशाल यशके भाजन, मधु और कैटभके हन्ता, सत्ययुगके धर्मोंका ज्ञान रखकर उनका पालन करनेवालोंको सद्गति प्रदान करनेवाले, अभयदाता तथा यज्ञका भाग ग्रहण करनेवाले भगवान् नारायण तुम्हें शरण दें ।। १९ ।। त्रिगुणो विगुणश्चतुरात्मधरः पूर्तेष्टयोश्च फलभागहरः । विदधातु नित्यमजितोऽतिचलो गतिमात्मगां सुकृतिनामृषीणाम् ।। २० ।। जो तीनों गुणोंसे विशिष्ट होते हुए भी निर्गुण हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नामक चार विग्रहोंको धारण करनेवाले हैं, इष्ट (यज्ञ-याग आदि), आपूर्त (वापी, कूप, तड़ाग-निर्माण आदि) के फलभागको ग्रहण करनेवाले हैं, जो कभी किसीसे पराजित
नहीं होते तथा धैर्य या मर्यादासे विचलित नहीं होते, वे भगवान् श्रीहरि पुण्यात्मा ऋषियोंको आत्मज्ञानजन्य सद्गति प्रदान करें॥ २०॥
तं लोकसाक्षिणमजं पुरुषं पुराणं
रविवर्णमीश्वरं गतिं बहुशः।
प्रणमध्वमेकमनसो यतः
सलिलोद्भवोऽपि तमृषिं प्रणतः॥ २१॥
जो सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, अजन्मा, अन्तर्यामी, पुराणपुरुष, सूर्यके समान तेजस्वी, ईश्वर और सब प्रकारसे सबकी गति हैं, उन परमेश्वरको तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करो; क्योंकि उन वासुदेवस्वरूप नारायण ऋषिको शेषशायी भी प्रणाम करते हैं॥ २१॥
स हि लोकयोनिरमृतस्य पदं
सूक्ष्मं परायणमचलं हि पदम्।
तत्सांख्ययोगिभिरुदारवृतं
बुद्ध्या यतात्मभिरिदं सनातनम्॥ २२॥
वे इस जगत्के आदिकारण, अमृतपद (मोक्षके आश्रय) सूक्ष्मस्वरूप, दूसरोंको शरण देनेवाले, अविचल और सनातन पद हैं। उदार शौनक! अपने मनको वशमें रखनेवाले सांख्ययोगी बुद्धिके द्वारा उन्हींका वरण करते हैं॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
षट्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ ३४६॥
इस प्रकार महाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४६॥
हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन
सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन
शौनक उवाच
श्रुतं भगवतस्तस्य माहात्म्यं परमात्मनः ।
जन्म धर्मगृहे चैव नरनारायणात्मकम् ॥ १ ॥
शौनकने कहा— सूतनन्दन! हमलोगोंने षड्विधि ऐश्वर्यसे सम्पन्न उन परमात्मा श्रीहरिका माहात्म्य सुना और धर्मके घरमें उन्होंने ही नर-नारायणरूपसे जन्म ग्रहण किया था, इस बातको भी जान लिया ॥ १ ॥
महावराहसृष्टा च पिण्डोत्पत्तिः पुरातनी ।
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यो यथा परिकल्पितः ॥ २ ॥
तथा च नः श्रुतो ब्रह्मन् कथ्यमानस्त्वयानघ ।
निष्पाप सूतपुत्र! भगवान् महावराहने जो प्राचीन कालमें पिण्डोंकी उत्पत्ति करके पिण्डदानकी मर्यादा चलायी तथा प्रवृत्ति और निवृत्तिके विषयमें जिस विधिकी जैसी कल्पना की, वह सब आपके मुखसे हमलोगोंने सुना ॥ २ ½ ॥
हव्यकव्यभुजो विष्णुरुदक्पूर्वे महोदधौ ॥ ३ ॥
यच्च तत् कथितं पूर्वं त्वया हयशिरो महत् ।
तच्च दृष्टं भगवता ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥ ४ ॥
समुद्रके उत्तर-पूर्वभागमें हव्य और कव्यका भोग ग्रहण करनेवाले भगवान् विष्णुने महान् हयग्रीवावतार धारण किया था, यह बात आपने पहले मुझसे कही थी। साथ ही यह भी बतायी थी कि भगवान् परमेष्ठी ब्रह्माने उस रूपका प्रत्यक्ष दर्शन किया था ॥ ३-४ ॥
किं तदुत्पादितं पूर्वं हरिणा लोकधारिणा ।
रूपं प्रभावं महतामपूर्व धीमतां वर ॥ ५ ॥
महान् बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र! सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले श्रीहरिने पूर्वकालमें वह अद्भुत प्रभावशाली रूप क्यों प्रकट किया? उनका वैसा रूप तो पहले कभी देखनेमें नहीं आया था ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा हि विबुधश्रेष्ठमपूर्वममितौजसम् ।
तदश्वशिरसं पुण्यं ब्रह्मा किमकरोन्मुने ॥ ६ ॥
मुने! अमित बलशाली एवं अपूर्वरूपधारी उन पुण्यात्मा सुरश्रेष्ठ हयग्रीवका दर्शन करके ब्रह्माजीने क्या किया? ॥ ६ ॥
एतन्नः संशयं ब्रह्मन् पुराणं ज्ञानसम्भवम् । कथयस्वोत्तममते महापुरुषनिर्मितम् ॥ ७ ॥ पाविताः स्म त्वया ब्रह्मन् पुण्यां कथयता कथाम् । सूतनन्दन! आपकी बुद्धि बड़ी उत्तम है। महापुरुष भगवान्के अवतारसम्बन्धी इस पुरातन ज्ञानके विषयमें हमलोगोंको संशय हो रहा है। आप इसका समाधान कीजिये। आपने यह पुण्यमयी कथा कहकर हमलोगोंको पवित्र कर दिया है ॥ ७ १/२ ॥
सौतिरुवाच
कथयिष्यामि ते सर्वं पुराणं वेदसम्मितम् ॥ ८ ॥ जगौ यद् भगवान् व्यासो राज्ञः पारिक्षितस्य वै । सूतपुत्रने कहा—शौनकजी! मैं तुमसे वेदतुल्य प्रमाणभूत सारा पुरातन वृत्तान्त कहूँगा, जिसे भगवान् व्यासने* राजा जनमेजयको सुनाया था ॥ ८ १/२ ॥ श्रुत्वाश्वशिरसो मूर्तिं देवस्य हरिमेधसः ॥ ९ ॥ उत्पन्नसंशयो राजा एतदेवमचोदयत् । भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी चर्चा सुनकर तुम्हारी ही तरह राजा जनमेजयको भी संदेह हो गया था। तब उन्होंने इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ९ १/२ ॥
जनमेजय उवाच
यत्तद् दर्शितवान् ब्रह्मा देवं हयशिरोधरम् ॥ १० ॥ किमर्थं तत् सम्भवत् तन्ममाचक्ष्व सत्तम । जनमेजय बोले—सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मुने! ब्रह्माजीने भगवान्के जिस हयग्रीवावतारका दर्शन किया था, उसका प्रादुर्भाव किसलिये हुआ था? यह मुझे बताइये ॥
वैशम्पायन उवाच
यत् किंचिदिह लोके वै देहसत्त्वं विशाम्पते ॥ ११ ॥ सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिभिः । वैशम्पायनजीने कहा—प्रजानाथ! इस जगत्में जितने प्राणी हैं, वे सब ईश्वरके संकल्पसे उत्पन्न हुए पाँच महाभूतोंसे युक्त हैं ॥ ११ १/२ ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् ॥ १२ ॥ भूतान्तरात्मा वरदः सगुणो निर्गुणोऽपि च । विराट्स्वरूप भगवान् नारायण इस जगत्के ईश्वर और स्रष्टा हैं, वे ही सब जीवोंके अन्तरात्मा, वरदाता, सगुण और निर्गुणरूप हैं ॥ १२ १/२ ॥ भूतप्रलयमत्यन्तं शृणुष्व नृपसत्तम ॥ १३ ॥ धरण्यामथ लीनायामप्सु चैकार्णवे पुरा ।
ज्योतिर्भूते जले चापि लीने ज्योतिषि चानिले ।। १४ ।।
वायौ चाकाशसंलीने आकाशे च मनोऽनुगे ।
व्यक्ते मनसि संलीने व्यक्ते चाव्यक्ततां गते ।। १५ ।।
अव्यक्ते पुरुषं याते पुंसि सर्वगतेऽपि च ।
तम एवाभवत् सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ।। १६ ।।
नृपश्रेष्ठ! अब तुम पञ्चभूतोंके आत्यन्तिक प्रलयकी बात सुनो। पूर्वकालमें जब इस
पृथ्वीका एकार्णवके जलमें लय हो गया। जलका तेजमें, तेजका वायुमें, वायुका आकाशमें,
आकाशका मनमें, मनका व्यक्त (महत्तत्त्व) में, व्यक्तका अव्यक्त प्रकृतिमें, अव्यक्तका
पुरुषमें अर्थात् मायाविशिष्ट ईश्वरमें और पुरुषका सर्वव्यापी परमात्मामें लय हो गया, उस
समय सब ओर केवल अन्धकार-ही-अन्धकार छा गया। उसके सिवा और कुछ भी जान
नहीं पड़ता था ।। १३-१६ ।।
तमसो ब्रह्म सम्भूतं तमोमूलामृतात्मकम् ।
तद्विश्वभावसंज्ञान्तं पौरुषीं तनुमाश्रितम् ।। १७ ।।
तमसे जगत्का कारणभूत ब्रह्म (परम व्योम) प्रकट हुआ है। तमका मूल है
अधिष्ठानभूत अमृततत्त्व। वह मूलभूत अमृत ही तमसे युक्त हो सभी नाम-रूपमें प्रपञ्चको
प्रकट करता है और विराट् शरीरका आश्रय लेकर रहता है ।। १७ ।।
सोऽनिरुद्ध इति प्रोक्तस्तत् प्रधानं प्रचक्षते ।
तदव्यक्तमिति ज्ञेयं त्रिगुणं नृपसत्तम ।। १८ ।।
नृपश्रेष्ठ! उसीको अनिरुद्ध कहा गया है। उसीको प्रधान भी कहते हैं तथा उसीको
त्रिगुणमय अव्यक्त जानना चाहिये ।। १८ ।।
विद्यासहायवान् देवो विष्वक्सेनो हरिःप्रभुः ।
अप्स्वेव शयनं चक्रे निद्रायोगमुपागतः ।। १९ ।।
उस अवस्थामें विद्याशक्तिसे सम्पन्न सर्वव्यापी भगवान् श्रीहरिने योगनिद्राका आश्रय
लेकर जलमें शयन किया ।। १९ ।।
जगतश्चिन्तयन् सृष्टिं चित्रां बहुगुणोद्भवाम् ।
तस्य चिन्तयतः सृष्टिं महानात्मगुणः स्मृतः ।। २० ।।
अहंकारस्ततो जातो ब्रह्मा स तु चतुर्मुखः ।
हिरण्यगर्भो भगवान् सर्वलोकपितामहः ।। २१ ।।
उस समय वे नाना गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली जगत्की अद्भुत सृष्टिके विषयमें विचार
करने लगे। सृष्टिके विषयमें विचार करते हुए उन्हें अपने गुण महान् (महत्तत्त्व) का स्मरण
हो आया। उससे अहंकार प्रकट हुआ। वह अहंकार ही चार मुखोंवाले ब्रह्माजी हैं, जो
सम्पूर्ण लोकोंके पितामह और भगवान् हिरण्यगर्भके नामसे प्रसिद्ध हैं ।। २०-२१ ।।
पद्मोऽनिरुद्धात् सम्भूतस्तदा पद्मनिभेक्षणः ।
सहस्रपत्रे द्युतिमानुपविष्टः सनातनः ॥ २२ ॥ ददृशेऽद्भुतसंकाशो लोकानापोमयान् प्रभुः । सत्त्वस्थः परमेष्ठी स ततो भूतगणान् सृजन् ॥ २३ ॥ ब्रह्माण्डमें कमलमें अनिरुद्ध (अहंकार) से कमलनयन ब्रह्माका उस समय प्रादुर्भाव हुआ था। वे अद्भुत रूपधारी एवं तेजस्वी सनातन भगवान् ब्रह्मा सहस्रदल कमलपर विराजमान हो जब इधर-उधर दृष्टि डालने लगे, तब उन्हें समस्त जगत् जलमय दिखायी दिया। तब ब्रह्माजी सत्त्वगुणमें स्थित होकर प्राणियोंकी सृष्टिमें प्रवृत्त हुए ॥ २२-२३ ॥
पूर्वमेव च पद्मस्य पत्रे सूर्यांशुसप्रभे । नारायणकृतौ बिन्दू अपामास्तां गुणोत्तरौ ॥ २४ ॥ वे जिस कमलपर बैठे थे, उसका पत्ता सूर्यके समान देदीप्यमान होता था। उसपर पहलेसे ही भगवान् नारायणकी प्रेरणासे जलकी बूँदें पड़ी थीं, जो रजोगुण और तमोगुणकी प्रतीक थीं ॥ २४ ॥
तावपश्यत् स भगवानादिनिधनोऽच्युतः । एकस्तत्राभवद् बिन्दुर्मध्वाभो रुचिरप्रभः ॥ २५ ॥ स तामसो मधुर्जातस्तदा नारायणाज्ञया । कठिनस्त्वपरो बिन्दुः कैटभो राजसस्तु सः ॥ २६ ॥ आदि-अन्तसे रहित भगवान् अच्युतने उन दोनों बूँदोंकी ओर देखा। उनमेंसे एक बूँद भगवान्की दृष्टि पड़ते ही उनकी प्रेरणासे तमोमय मधुनामक दैत्यके आकारमें परिणत हो गयी। उस दैत्यका रंग मधुके समान था और उसकी कान्ति बड़ी सुन्दर थी। जलकी दूसरी बूँद, जो कुछ कड़ी थी, नारायणकी आज्ञासे रजोगुणसे उत्पन्न कैटभ नामक दैत्यके रूपमें प्रकट हुई ॥
तावभ्यधावतां श्रेष्ठौ तमसा रजसान्वितौ । बलवन्तौ गदाहस्तौ पद्मनालानुसारिणौ ॥ २७ ॥ तमोगुण और रजोगुणसे युक्त वे दोनों श्रेष्ठ दैत्य मधु और कैटभ बड़े बलवान् थे। वे अपने हाथोंमें गदा लिये कमलनालका अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने लगे ॥ २७ ॥
ददृशातेऽरविन्दस्थं ब्रह्माणममितप्रभम् । सृजन्तं प्रथमं वेदांश्चतुरश्चारुविग्रहान् ॥ २८ ॥ ऊपर जाकर उन्होंने कमल-पुष्पके आसनपर बैठकर सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको देखा एवं उनके पास ही मनोहर रूप धारण किये हुए चारों वेदोंको देखा ॥ २८ ॥
ततो विग्रहवन्तौ तौ वेदान् दृष्ट्वासुरोत्तमौ । सहसा जगृहतुर्वेदान् ब्रह्मणः पश्यतस्तदा ॥ २९ ॥
उन विशालकाय श्रेष्ठ असुरोंने उस समय वेदोंपर दृष्टि पड़ते ही उन्हें ब्रह्माजीके देखते-देखते सहसा हर लिया ॥ २९ ॥
अथ तौ दानवश्रेष्ठौ वेदान् गृह्य सनातनान् ।
रसां विविशतुस्तूर्णमुदक्पूर्वे महोदधौ ॥ ३० ॥
सनातन वेदोंका अपहरण करके वे दोनों श्रेष्ठ दानव उत्तर-पूर्ववर्ती महासागरमें घुस गये और तुरंत रसातलमें जा पहुँचे ॥ ३० ॥
ततो हृतेषु वेदेषु ब्रह्मा कश्मलमाविशत् ।
ततो वचनमीशानं प्राह वेदैर्विनाकृतः ॥ ३१ ॥
वेदोंका अपहरण हो जानेपर ब्रह्माजीको बड़ा खेद हुआ। उनपर मोह छा गया। वे वेदोंसे वंचित होकर मन-ही-मन परमात्मासे इस प्रकार कहने लगे ॥ ३१ ॥
ब्रह्मोवाच
वेदा मे परमं चक्षुर्वेदा मे परमं बलम् ।
वेदा मे परमं धाम वेदा मे ब्रह्म चोत्तरम् ॥ ३२ ॥
**ब्रह्मा बोले—**भगवन्! वेद ही मेरे उत्तम नेत्र हैं, वेद ही मेरे परम बल हैं। वेद ही मेरे परम आश्रय तथा वेद ही मेरे सर्वोत्तम उपास्य देव हैं ॥ ३२ ॥
मम वेदा हृताः सर्वे दानवाभ्यां बलादितः ।
अन्धकारा हि मे लोका जाता वेदैर्विनाकृताः ॥ ३३ ॥
मेरे वे सभी वेद आज दो दानवोंने बलपूर्वक यहाँसे छीन लिये हैं। अब वेदोंके बिना मेरे लिये सम्पूर्ण लोक अन्धकारमय हो गये हैं ॥ ३३ ॥
वेदानृते हि किं कुर्यां लोकानां सृष्टिमुत्तमाम् ।
अहो बत महत् दुःखं वेदनाशनजं मम ॥ ३४ ॥
प्राप्तं दुनोति हृदयं तीव्रं शोकपरायणम् ।
को हि शोकार्णवे मग्नं मामितोऽद्य समुद्धरेत् ॥ ३५ ॥
वेदांस्तांश्चानयेन्नष्टान् कस्य चाहं प्रियो भवे ।
मैं वेदोंके बिना संसारकी उत्तम सृष्टि कैसे कर सकता हूँ? अहो! आज वेदोंके नष्ट होनेसे मुझपर बड़ा भारी दुःख आ पड़ा है, जो मेरे शोकमग्न हृदयको दुःसह पीड़ा दे रहा है। आज शोकके समुद्रमें डूबे हुए मुझ असहायका यहाँसे कौन उद्धार करेगा? उन नष्ट हुए वेदोंको कौन लायेगा? मैं किसको इतना प्रिय हूँ, जो मेरी ऐसी सहायता करेगा? ॥ ३४-३५
१/२ ॥
इत्येवं भाषमाणस्य ब्रह्मणो नृपसत्तम ॥ ३६ ॥
हरेः स्तोत्रार्थमुद्भूता बुद्धिर्बुद्धिमतां वर ।
ततो जगौ परं जप्यं साञ्जलिप्रग्रहः प्रभुः ॥ ३७ ॥
नृपश्रेष्ठ! ऐसी बातें कहते हुए ब्रह्माजीके मनमें भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ। बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य नरेश! तब भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर उत्तम एवं जपने योग्य स्तोत्रका गान आरम्भ किया ।। ३६-३७ ।।
ब्रह्मोवाच
ॐनमस्ते ब्रह्महृदय नमस्ते मम पूर्वज । लोकाद्य भुवनश्रेष्ठ सांख्ययोगनिधे प्रभो ।। ३८ ।। ब्रह्माजी बोले— प्रभो! वेद आपका हृदय है, आपको नमस्कार है। मेरे पूर्वज! आपको प्रणाम है। जगत्के आदि कारण! भुवनश्रेष्ठ! सांख्ययोगनिधे! प्रभो! आपको बारंबार नमस्कार है ।। ३८ ।। व्यक्ताव्यक्तकराचिन्त्य क्षेमं पन्थानमास्थित । विश्वभुक् सर्वभूतानामन्तरात्मन्नयोनिज । अहं प्रसादजस्तुभ्यं लोकधाम स्वयम्भुवः ।। ३९ ।। व्यक्त जगत् और अव्यक्त प्रकृतिको उत्पन्न करनेवाले परमात्मन्! आपका स्वरूप अचिन्त्य है। आप कल्याणमय मार्गमें स्थित हैं। विश्वपालक! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा, किसी योनिसे उत्पन्न न होनेवाले, जगत्के आधार और स्वयम्भू हैं। मैं आपकी कृपासे उत्पन्न हुआ हूँ ।। ३९ ।। त्वत्तो मे मानसं जन्म प्रथमं द्विजपूजितम् । चाक्षुषं वै द्वितीयं मे जन्म चासीत् पुरातनम् ।। ४० ।। आपसे मेरा प्रथम बार जो जन्म हुआ था, वह द्विजोंद्वारा सम्मानित मानस-जन्म कहा गया है अर्थात् प्रथम बार मैं आपके मनसे उत्पन्न हुआ। तदनन्तर पूर्वकालमें मैं आपके नेत्रसे उत्पन्न हुआ। वह मेरा दूसरा जन्म था ।। ४० ।। त्वत्प्रसादात् तु मे जन्म तृतीयं वाचिकं महत् । त्वत्तः श्रवणजं चापि चतुर्थं जन्म मे विभो ।। ४१ ।। तत्पश्चात् आपके कृपाप्रसादसे मेरा जो तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, वह वाचिक था अर्थात् आपके वचनमात्रसे सुलभ हो गया था। विभो! उसके बाद आपके कानोंसे मेरा चतुर्थ जन्म हुआ था ।। ४१ ।। नासिक्यं चापि मे जन्म त्वत्तः परममुच्यते । अण्डजं चापि मे जन्म त्वत्तः षष्ठं विनिर्मितम् ।। ४२ ।। उसके बाद आपकी नासिकासे मेरा पाँचवाँ उत्तम जन्म बताया जाता है। तदनन्तर मैं आपके द्वारा ब्रह्माण्डसे उत्पन्न किया गया। वह मेरा छठा जन्म था ।। ४२ ।। इदं च सप्तमं जन्म पद्मजन्मेति वै प्रभो । सर्गे सर्गे ह्यहं पुत्रस्तव त्रिगुणवर्जित ।। ४३ ।।
प्रभो! यह मेरा सातवाँ जन्म है, जो कमलसे उत्पन्न हुआ है। त्रिगुणातीत परमेश्वर! मैं प्रत्येक कल्पमें आपका पुत्र होकर प्रकट होता हूँ॥ ४३ ॥
प्रथितः पुण्डरीकाक्ष प्रधानगुणकल्पितः ।
त्वमीश्वरः स्वभावश्च स्वयम्भूः पुरुषोत्तम ॥ ४४ ॥
कमलनयन! आपका पुत्र मैं शुद्ध सत्त्वमय शरीरसे उत्पन्न हुआ हूँ। आप ईश्वर, स्वभाव, स्वयम्भू एवं पुरुषोत्तम हैं॥ ४४ ॥
त्वया विनिर्मितोऽहं वै वेदचक्षुर्वयोतिगः ।
ते मे वेदा हृताश्चक्षुरन्धो जातोऽस्मि जागृहि ॥ ४५ ॥
ददस्व चक्षूंषि मम प्रियोऽहं ते प्रियोऽसि मे ।
आपने मुझे वेदरूपी नेत्रोंसे युक्त बनाया है। आपकी ही कृपासे कालातीत हूँ—मुझपर कालका जोर नहीं चलता। मेरे नेत्ररूप वे वेद दानवोंद्वारा हर लिये गये हैं; अतः मैं अन्धा-सा हो गया हूँ। प्रभो! निद्रा त्यागकर जागिये। मुझे मेरे नेत्र वापस दीजिये; क्योंकि मैं आपका प्रिय भक्त हूँ और आप मेरे प्रियतम स्वामी हैं॥ ४५ १/२ ॥
एवं स्तुतः स भगवान् पुरुषः सर्वतोमुखः ॥ ४६ ॥
जहौ निद्रामथ तदा वेदकार्यार्थमुद्यतः ।
ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर सब ओर मुखवाले सबके अन्तर्यामी आत्मा भगवान्ने उसी क्षण निद्रा त्याग दी और वे वेदोंकी रक्षा करनेके लिये उद्यत हो गये॥ ४६ १/२ ॥
ऐश्वर्येण प्रयोगेण द्वितीयां तनुमास्थितः ॥ ४७ ॥
सुनासिकेन कायेन भूत्वा चन्द्रप्रभस्तदा ।
कृत्वा हयशिरः शुभ्रं वेदानामालयं प्रभुः ॥ ४८ ॥
उन्होंने अपने ऐश्वर्यके योगसे दूसरा शरीर धारण किया, जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् था। सुन्दर नासिकावाले शरीरसे युक्त हो वे प्रभु घोड़ेके समान गर्दन और मुखधारण करके स्थित हुए। उनका वह शुद्ध मुख सम्पूर्ण वेदोंका आलय था॥ ४७-४८ ॥
तस्य मूर्धा समभवद् द्यौः सनक्षत्रतारका ।
केशाश्चास्याभवन् दीर्घा रवेरंशुसमप्रभाः ॥ ४९ ॥
नक्षत्रों और ताराओंसे युक्त स्वर्गलोक उनका सिर था। सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बड़े-बड़े बाल थे॥ ४९ ॥
कर्णावाकाशपाताले ललाटं भूतधारिणी ।
गङ्गा सरस्वती श्रोण्यौ भ्रुवावास्तां महोदधी ॥ ५० ॥
आकाश और पाताल उनके कान थे एवं समस्त भूतोंको धारण करनेवाली पृथ्वी ललाट थी। गंगा और सरस्वती उनके नितम्ब तथा दो समुद्र उनकी दोनों भौंहें थे॥ ५० ॥
चक्षुषी सोमसूर्यौ ते नासा संध्या पुनः स्मृता ।
ॐ कारस्त्वथ संस्कारो विद्युज्जिह्वा च निर्मिता ।। ५१ ।। दन्ताश्च पितरो राजन् सोमपा इति विश्रुताः । गोलोको ब्रह्मलोकश्च ओष्ठावास्तां महात्मनः ।। ५२ ।। चन्द्रमा और सूर्य उनके दोनों नेत्र तथा नासिका संध्या थी। ॐकार संस्कार (आभूषण) और विद्युत् जिह्वा बनी हुई थी। राजन्! सोमपान करनेवाले पितर उनके दाँत सुने गये हैं तथा गोलोक और ब्रह्मलोक उन महात्माके ओष्ठ थे ।। ५१-५२ ।। ग्रीवा चास्याभवद् राजन् कालरात्रिर्गुणोत्तरा । एतद्धयशिरः कृत्वा नानामूर्तिभिरावृतम् ।। ५३ ।। अन्तर्दधौ स विश्वेशो विवेश च रसां प्रभुः । नरेश्वर! तमोमयी कालरात्रि उनकी ग्रीवा थी। इस प्रकार अनेक मूर्तियोंसे आवृत हयग्रीव रूप धारण करके वे जगदीश्वर श्रीहरि वहाँसे अन्तर्धान हो गये और रसातलमें जा पहुँचे ।। ५३ १/२ ।। रसां पुनः प्रविष्टश्च योगं परममास्थितः ।। ५४ ।। शैक्ष्यं स्वरं समास्थाय उद्गीतं प्रासृजत् स्वरम् । रसातलमें प्रवेश करके परम योगका आश्रय ले शिक्षाके नियमानुसार उदात्त आदि स्वरोंसे युक्त उच्च स्वरसे सामवेदका गान करने लगे ।। ५४ १/२ ।। स स्वरः सानुनादी च सर्वशः स्निग्ध एव च ।। ५५ ।। बभूवान्तर्महीभूतः सर्वभूतगुणोदितः । नाद और स्वरसे विशिष्ट सामगानकी वह सर्वथा स्निग्ध एवं मधुर ध्वनि रसातलमें सब ओर फैल गयी, जो समस्त प्राणियोंके लिये गुणकारक थी ।। ५५ १/२ ।। ततस्तावसुरौ कृत्वा वेदान् समयबन्धनान् ।। ५६ ।। रसातले विनिक्षिप्य यतः शब्दस्ततो द्रुतौ । उन दोनों असुरोंने वह शब्द सुनकर वेदोंको कालपाशसे आबद्ध करके रसातलमें फेंक दिया और स्वयं उसी ओर दौड़े जिधरसे वह ध्वनि आ रही थी ।। ५६ १/२ ।। एतस्मिन्नन्तरे राजन् देवो हयशिरोधरः ।। ५७ ।। जग्राह वेदानखिलान् रसातल गतान् हरिः । प्रादाच्च ब्रह्मणे भूयस्ततः स्वां प्रकृतिं गतः ।। ५८ ।। राजन्! इसी बीचमें हयग्रीव रूपधारी भगवान् श्रीहरिने रसातलमें पड़े हुए उन सम्पूर्ण वेदोंको ले लिया तथा ब्रह्माजीको पुनः वापस दे दिया और फिर वे अपने आदि रूपमें आ गये ।। ५७-५८ ।। स्थापयित्वा हयशिर उदक्पूर्वे महोदधौ । वेदानामालयं चापि बभूवाश्वशिरास्ततः ।। ५९ ।।
भगवान्ने महासागरके पूर्वोत्तरभागमें वेदोंके आश्रयभूत अपने हयग्रीव रूपकी स्थापना करके पुनः पूर्वरूप धारण कर लिया। तबसे भगवान् हयग्रीव वहीं रहने लगे ॥ ५९ ॥
अथ किंचिदपश्यन्तौ दानवौ मधुकैटभौ ।
पुनराजग्मतुस्तत्र वेगितौ पश्यतां च तौ ॥ ६० ॥
यत्र वेदा विनिक्षिप्तास्तत् स्थानं शून्यमेव च ।
इधर वेदध्वनिके स्थानपर आकर मधु और कैटभ दोनों दानवोंने जब कुछ नहीं देखा, तब वे बड़े वेगसे फिर वहीं लौट आये, जहाँ उन वेदोंको नीचे डाल रखा था। वहाँ देखनेपर उन्हें वह स्थान सूना ही दिखायी दिया ॥ ६०१/२ ॥
तत उत्तममास्थाय वेगं बलवतां वरौ ॥ ६१ ॥
पुनरुत्तस्थतुः शीघ्रं रसानामालयात् तदा ।
ददृशाते च पुरुषं तमेवादिकरं प्रभुम् ॥ ६२ ॥
श्वेतं चन्द्रविशुद्धाभमनिरुद्धतनौ स्थितम् ।
भूयोऽप्यमितविक्रान्तं निद्रायोगमुपागतम् ॥ ६३ ॥
तब वे बलवानोंमें श्रेष्ठ दोनों दानव पुनः उत्तम वेगका आश्रय ले रसातलसे शीघ्र ही ऊपर उठे और ऊपर आकर देखते हैं तो वे ही आदिकर्ता भगवान् पुरुषोत्तम दृष्टिगोचर हुए। जो चन्द्रमाके समान विशुद्ध, उज्ज्वल प्रभासे विभूषित, गौरवर्णके थे। वे उस समय अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित थे और वे अमित पराक्रमी भगवान् योगनिद्राका आश्रय लेकर सो रहे थे ॥
आत्मप्रमाणरचिते अपामुपार कल्पिते ।
शयने नागभोगाढ्ये ज्वालामालासमावृते ॥ ६४ ॥
निष्कल्मषेण सत्त्वेन सम्पन्नं रुचिरप्रभम् ।
तं दृष्ट्वा दानवेन्द्रौ तौ महाहासममुञ्चताम् ॥ ६५ ॥
पानीके ऊपर शेषनागके शरीरकी शय्या निर्मित हुई थी, जिसकी लम्बाई भगवान्के श्रीविग्रहके अनुरूप ही थी। वह शय्या ज्वालामालाओंसे आवृत जान पड़ती थी। उसके ऊपर विशुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न मनोहर कान्तिवाले भगवान् नारायण सो रहे थे। उन्हें देखकर वे दोनों दानवराज ठहाका मारकर जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ ६४-६५ ॥
ऊचतुश्च समाविष्टौ रजसा तमसा च तौ ।
अयं स पुरुषः श्वेतः शेते निद्रामुपागतः ॥ ६६ ॥
अनेन नूनं वेदानां कृतमाहरणं रसात् ।
कस्यैष को नु खल्वेष किं च स्वपिति भोगवान् ॥ ६७ ॥
रजोगुण और तमोगुणसे आविष्ट हुए वे दोनों असुर परस्पर कहने लगे, 'यह जो श्वेतवर्णवाला पुरुष निद्रामें निमग्न होकर सो रहा है, निश्चय ही इसीने रसातलसे वेदोंका
अपहरण किया है। यह किसका पुत्र है? कौन है? और क्यों यहाँ सर्पके शरीरकी शय्यापर सो रहा है?' ।। ६६-६७ ।।
इत्युच्चारितवाक्यौ तौ बोधयामासतुर्हरिम् ।
युद्धार्थिनौ हि विज्ञाय विबुद्धः पुरुषोत्तमः ।। ६८ ।।
निरीक्ष्य चासुरेन्द्रौ तौ ततो युद्धे मनो दधे ।
इस प्रकार बातचीत करके उन दोनोंने भगवान्को जगाया। उन्हें युद्धके लिये उत्सुक जान भगवान् पुरुषोत्तम जाग उठे। फिर उन दोनों असुरेन्द्रोंका अच्छी तरह निरीक्षण करके उन्होंने मन-ही-मन उनके साथ युद्ध करनेका निश्चय किया ।। ६८ १/२ ।।
अथ युद्धं समभवत् तयोर्नारायणस्य वै ।। ६९ ।।
रजस्तमोविष्टतनू तावुभौ मधुकैटभौ ।
ब्रह्मणोपचितिं कुर्वन् जघान मधुसूदनः ।। ७० ।।
फिर तो उन दोनों असुरोंका और भगवान् नारायणका युद्ध आरम्भ हो गया। भगवान् मधुसूदनने ब्रह्माजीका मान रखनेके लिये तमोगुण और रजोगुणसे आविष्ट शरीरवाले उन दोनों दैत्यों—मधु और कैटभको मार डाला ।।
ततस्तयोर्वधेनाशु वेदापहरणेन च ।
शोकापनयनं चक्रे ब्रह्मणः पुरुषोत्तमः ।। ७१ ।।
इस प्रकार वेदोंको वापस लाकर और मधु-कैटभका वध करके भगवान् पुरुषोत्तमने ब्रह्माजीका शोक दूर कर दिया ।। ७१ ।। ततः परिवृतो ब्रह्मा हरिणा वेदसत्कृतः । निर्ममे स तदा लोकान् कृत्स्नान् स्थावरजङ्गमान् ॥ ७२ ॥ तत्पश्चात् वेदसे सम्मानित और भगवान्से सुरक्षित होकर ब्रह्माजीने समस्त चराचर जगत्की सृष्टि की ।। ७२ ।। दत्त्वा पितामहायाग्र्यां मतिं लोकविसर्गिकाम् । तत्रैवान्तर्दधे देवो यत एवागतो हरिः ॥ ७३ ॥ ब्रह्माजीको लोक-रचनाकी श्रेष्ठ बुद्धि देकर भगवान् नारायणदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। वे जहाँसे आये थे, वहीं चले गये ।। ७३ ।। तौ दानवौ हरिर्हत्वा कृत्वा हयशिरस्तनुम् । पुनः प्रवृत्तिधर्मार्थं तामेव विदधे तनुम् ॥ ७४ ॥ श्रीहरिने इस प्रकार हयग्रीवरूप धारण करके उन दोनों दानवोंका वध किया था। उन्होंने पुनः प्रवृत्तिधर्मका प्रचार करनेके लिये ही उस शरीरको प्रकट किया था ।। ७४ ।। एवमेव महाभागो बभूवाश्वशिरा हरिः । पौराणमेतत् प्रख्यातं रूपं वरदमैश्वरम् ॥ ७५ ॥ इस तरह महाभाग श्रीहरिने हयग्रीवरूप धारण किया था। भगवान्का यह वरदायक रूप पुरातन एवं पुराण-प्रसिद्ध है ।। ७५ ।। यो ह्येतद् ब्राह्मणो नित्यं शृणुयाद् धारयीत वा । न तस्याध्ययनं नाशमुपगच्छेत् कदाचन ॥ ७६ ॥ जो ब्राह्मण प्रतिदिन इस अवतार-कथाको सुनता या स्मरण करता है, उसका अध्ययन कभी नष्ट (निष्फल) नहीं होता है ।। ७६ ।। आराध्य तपसोग्रेण देवं हयशिरोधरम् । पञ्चालेन क्रमः प्राप्तो देवेन पथि देशिते ॥ ७७ ॥ महादेवजीके बताये हुए मार्गपर चलकर उग्र तपस्याद्वारा भगवान् हयग्रीवकी आराधना करके पांचालदेशीय गालवमुनिने वेदोंका क्रमविभाग प्राप्त किया था ।। ७७ ।। एतद्धयशिरो राजन्नाख्यानं तव कीर्तितम् । पुराणं वेदसमितं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ७८ ॥ राजन्! तुमने जिसके लिये मुझसे पूछा था, यह हयग्रीवावतारकी वेदानुमोदित प्राचीन कथा मैंने तुम्हें सुना दी ।। ७८ ।। यां यामिच्छेत् तनुं देवः कर्तुं कार्यविधौ क्वचित् । तां तां कुर्याद् विकुर्वाणः स्वयमात्मानमात्मना ॥ ७९ ॥
परमात्मा कार्यसाधनके लिये जिस-जिस शरीरको धारण करना चाहते हैं, उसे कार्य करते समय स्वयं ही प्रकट कर लेते हैं ॥ ७९ ॥ एष वेदनिधिः श्रीमानेष वै तपसो निधिः । एष योगश्च सांख्यं च ब्रह्म चाग्र्यं हविर्विभुः ॥ ८० ॥ ये श्रीमान् हरि वेद और तपस्याकी निधि हैं। ये ही योग, सांख्य, ब्रह्म, श्रेष्ठ हविष्य और विभु हैं ॥ ८० ॥ नारायणपरा वेदा यज्ञा नारायणात्मकाः । तपो नारायणपरं नारायणपरा गतिः ॥ ८१ ॥ वेदोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है। यज्ञ नारायणके ही स्वरूप हैं। तपस्याके परम फल भगवान् नारायण ही हैं तथा नारायणकी प्राप्ति ही सर्वोत्तम गति है ॥ ८१ ॥ नारायणपरं सत्यमृतं नारायणात्मकम् । नारायणपरो धर्मः पुनरावृत्तिदुर्लभः ॥ ८२ ॥ सत्यके परम लक्ष्य नारायण ही हैं। ऋत नारायणका ही स्वरूप है। जिसके आचरणसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती, उस निवृत्तिप्रधान धर्मके भी चरम लक्ष्य भगवान् नारायण ही हैं ॥ ८२ ॥ प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः । नारायणात्मको गन्धो भूमौ श्रेष्ठतमः स्मृतः ॥ ८३ ॥ प्रवृत्तिरूप धर्म भी नारायणका ही स्वरूप है। भूमिका श्रेष्ठतम गुण गन्ध भी नारायणमय ही है ॥ ८३ ॥ अपां चापि गुणा राजन् रसा नारायणात्मकाः । ज्योतिषां च परं रूपं स्मृतं नारायणात्मकम् ॥ ८४ ॥ राजन्! जलका गुण रस भी नारायणका ही स्वरूप है। तेजका उत्तम गुण रूप भी नारायणमय ही है ॥ ८४ ॥ नारायणात्मकश्चापि स्पर्शो वायुगुणः स्मृतः । नारायणात्मकश्चैव शब्द आकाशसम्भवः ॥ ८५ ॥ वायुका गुण स्पर्श भी नारायणस्वरूप ही है तथा आकाशका गुण शब्द भी नारायणमय ही है ॥ ८५ ॥ मनश्चापि ततो भूतमव्यक्तगुणलक्षणम् । नारायणपरः कालो ज्योतिषामयनं च यत् ॥ ८६ ॥ अव्यक्त गुण एवं लक्षणवाला मन नामक भूत, काल और नक्षत्रमण्डल—ये सब नारायणके ही आश्रित हैं ॥ ८६ ॥ नारायणपरा कीर्तिः श्रीश्च लक्ष्मीश्च देवताः । नारायणपरं सांख्यं योगो नारायणात्मकः ॥ ८७ ॥
कीर्ति, श्री और लक्ष्मी आदि देवियाँ नारायणको ही अपना परम आश्रय मानती हैं। सांख्यका परम तात्पर्य भी नारायण ही हैं और योग भी नारायणका ही स्वरूप है ।। ८७ ।।
कारणं पुरुषो ह्येषां प्रधानं चापि कारणम् ।
स्वभावश्चैव कर्माणि दैवं येषां च कारणम् ।। ८८ ।।
पुरुष, प्रधान, स्वभाव, कर्म तथा दैव—ये जिन वस्तुओंके कारण हैं, वे भी नारायणरूप ही हैं ।। ८८ ।।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधा च तथा चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।। ८९ ।।
पञ्चकारणसंख्यातो निष्ठा सर्वत्र वै हरिः ।
अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न-भिन्न प्रकारके करण, नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ तथा पाँचवाँ दैव—इन पाँच कारणोंके रूपमें सर्वत्र श्रीहरि ही विराजमान हैं ।। ८९ ½ ।।
तत्त्वं जिज्ञासमानानां हेतुभिः सर्वतोमुखैः ।। ९० ।।
तत्त्वमेको महायोगी हरिनारायणः प्रभुः ।
जो लोग सर्वव्यापक हेतुओंद्वारा तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखते हैं, उनके लिये महायोगी भगवान् नारायण हरि ही एकमात्र ज्ञातव्य तत्त्व हैं ।। ९० ½ ।।
ब्रह्मादीनां स लोकानामृषीणां च महात्मनाम् ।। ९१ ।।
सांख्यानां योगिनां चापि यतीनामात्मवेदिनाम् ।
मनीषितं विजानाति केशवो न तु तस्य ते ।। ९२ ।।
भगवान् केशव ब्रह्मा आदि देवताओं, सम्पूर्ण लोकों, महात्मा-ऋषियों, सांख्यवेत्ताओं, योगियों और आत्मज्ञानी यतियोंके मनकी बातें भी जानते हैं; परंतु उनके मनमें क्या है? यह उनमेंसे किसीको पता नहीं है ।।
ये केचित् सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते ।
दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत् ।। ९३ ।।
सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः ।
सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते ।। ९४ ।।
समस्त विश्वमें जो कोई देवताओंके लिये यज्ञ और पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, दान देते हैं और बड़ी भारी तपस्या करते हैं, उन सबके आश्रय भगवान् विष्णु ही हैं। वे अपने ऐश्वर्ययोगमें स्थित रहते हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके आवासस्थान होनेके कारण वे 'वासुदेव' कहे जाते हैं ।। ९३-९४ ।।
अयं हि नित्यः परमो महर्षि-
र्महाविभूतिर्गुणवर्जिताख्यः ।
गुणैश्च संयोगमुपैति शीघ्रं
कालो यथर्तावृतुसम्प्रयुक्तः ।। ९५ ।।
ये परम महर्षि नारायण नित्य, महान् ऐश्वर्यसे युक्त और गुणोंसे रहित हैं तथापि जैसे गुणहीन काल ऋतुके गुणोंसे युक्त होता है, उसी प्रकार वे भी समय-समयपर गुणोंको स्वीकार करके उनसे संयुक्त होते हैं ।। ९५ ।।
नैवास्य विन्दन्ति गतिं महात्मनो
न चागतिं कश्चिदिहानुपश्यति ।
ज्ञानात्मकाः सन्ति हि ये महर्षयः
पश्यन्ति नित्यं पुरुषं गुणाधिकम् ।। ९६ ।।
उन महात्माकी गतिको कोई नहीं जानता। उनके आगमनका भी यहाँ किसीको कुछ पता नहीं चलता। जो ज्ञानस्वरूप महर्षि हैं, वे ही उन नित्य, अन्तर्यामी एवं अनन्तगुणविभूषित परमात्माका साक्षात्कार करते हैं ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३४७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४७ ।।
* वैशम्पायनजीने जनमेजयको महाभारतकी कथा वेदव्यासजीकी आज्ञासे सुनायी थी इस कारण यहाँ ऐसा लिखा है।
सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान्के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
अष्टचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान्के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
जनमेजय उवाच
अहो ह्येकान्तिनः सर्वान् प्रीणाति भगवान् हरिः ।
विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान् स्वयम् ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**ब्रह्मन्! भगवान् अनन्यभावसे भजन करनेवाले सभी भक्तोंको प्रसन्न करते और उनकी विधिवत् की हुई पूजाको स्वयं ग्रहण करते हैं; यह कितने आनन्दकी बात है ॥ १ ॥
ये तु दग्धेन्धना लोके पुण्यपापविवर्जिताः ।
तेषां त्वयाभिनिर्दिष्टा पारम्पर्यगता गतिः ॥ २ ॥
संसारमें जिन लोगोंकी वासनाएँ दग्ध हो गयी हैं और जो पुण्य-पापसे रहित हो गये हैं, उन्हें परम्परासे जो गति प्राप्त होती है, उसका भी आपने वर्णन किया है ॥
चतुर्थ्यां चैव ते गत्यां गच्छन्ति पुरुषोत्तमम् ।
एकान्तिनस्तु पुरुषा गच्छन्ति परमं पदम् ॥ ३ ॥
जो भगवान्के अनन्य भक्त हैं, वे साधुपुरुष अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और संकर्षणकी अपेक्षा न रखकर वासुदेवसंज्ञक चौथी गतिमें पहुँचकर भगवान् पुरुषोत्तम एवं उनके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३ ॥
नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रियः ।
अगत्वा गतयस्तिस्रो यद् गच्छत्यव्ययं हरिम् ॥ ४ ॥
निश्चय ही यह अनन्यभावसे भगवान्का भजनरूप धर्म श्रेष्ठ एवं श्रीनारायणको परम प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेनेवाले भक्तजन उक्त तीन गतियोंको प्राप्त न होकर सीधे चौथी गतिमें पहुँचकर अविनाशी श्रीहरिको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४ ॥
सहोपनिषदान् वेदान् ये विप्राः सम्यगास्थिताः ।
पठन्ति विधिमास्थाय ये चापि यतिधर्मिणः ॥ ५ ॥
तेभ्यो विशिष्टां जानामि गतिमेकान्तिनां नृणाम् ।
जो ब्राह्मण उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका भलीभाँति आश्रय ले उनका विधिपूर्वक स्वाध्याय करते हैं तथा जो संन्यासधर्मका पालन करनेवाले हैं, इन सबसे उत्तम गति उन्हींको प्राप्त होती है, जो भगवान्के अनन्य भक्त होते हैं ॥ ५ १/२ ॥
केनैश धर्मः कथितो देवेन ऋषिणापि वा ।। ६ ।।
एकान्तिनां च का चर्या कदा चोत्पादिता विभो ।
एतन्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ।। ७ ।।
भगवन्! इस भक्तिरूप धर्मका किस देवता अथवा ऋषिने उपदेश किया है? अनन्य भक्तोंकी जीवनचर्या क्या है? और वह कबसे प्रचलित हुई? मेरे इस संशयका निवारण कीजिये। इस विषयको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ।। ६-७ ।।
वैशम्पायन उवाच
समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपाण्डवयोधर्मृधे ।
अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ।। ८ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! जिस समय कौरव और पाण्डवोंकी सेनाएँ युद्धके लिये आमने-सामने डटी हुई थीं और अर्जुन युद्धसे अनमने हो रहे थे, उस समय स्वयं भगवान्ने उन्हें गीतामें इस धर्मका उपदेश दिया ।। ८ ।।
अगतिश्च गतिश्चैव पूर्वं ते कथिता मया ।
गहनो ह्येष धर्मो वै दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ।। ९ ।।
मैंने पहले तुमसे गति और अगदिका स्वरूप भी बताया था। यह धर्म गहन तथा अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्गम है ।। ९ ।।
सम्मितः सामवेदेन पुरैवादियुगे कृतः ।
धार्यते स्वयमीशेन राजन् नारायणेन च ।। १० ।।
राजन्! यह धर्म सामवेदके समान है। प्राचीनकालके सत्ययुगसे ही यह प्रचलित हुआ है। स्वयं जगदीश्वर भगवान् नारायण ही इस धर्मको धारण करते हैं ।। १० ।।
एतदर्थं महाराज पृष्टः पार्थेन नारदः ।
ऋषिमध्ये महाभागः शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ।। ११ ।।
महाराज! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने ऋषियोंके बीचमें महाभाग नारदजीसे यही विषय पूछा था। उस समय श्रीकृष्ण और भीष्म भी इस विषयको सुन रहे थे ।। ११ ।।
गुरुणा च मयाप्येष कथितो नृपसत्तम ।
यथा तत् कथितं तत्र नारदेन तथा शृणु ।। १२ ।।
नृपश्रेष्ठ! मेरे गुरु व्यासजीने और मैंने भी यह विषय कहा था; परंतु वहाँ नारदजीने उस विषयका जैसा वर्णन किया था, उसे बताता हूँ, सुनो ।। १२ ।।
यदासीन्मानसं जन्म नारायणमुखोद्गतम् ।
ब्रह्मणः पृथिवीपाल तदा नारायणः स्वयम् ।। १३ ।।
तेन धर्मेण कृतवान् दैवं पित्र्यं च भारत ।
फेनपा ऋषयश्चैव तं धर्मं प्रतिपेदिरे ।। १४ ।।
भूपाल! सृष्टिके आदिमें जब भगवान् नारायणके मुखसे ब्रह्माजीका मानसिक जन्म हुआ था, उस समय साक्षात् नारायणने उन्हें इस धर्मका उपदेश किया था। भरतनन्दन! नारायणने उस धर्मसे देवताओं और पितरोंका पूजनादि कर्म किया था। फिर फेनप ऋषियोंने उस धर्मको ग्रहण किया ।। १३-१४ ।।
वैखानसाः फेनपेभ्यो धर्मं तं प्रतिपेदिरे ।
वैखानसेभ्यः सोमस्तु ततः सोऽन्तर्दधे पुनः ।। १५ ।।
फेनपोंसे वैखानसोंने उस धर्मको उपलब्ध किया। उनसे सोमने उसे ग्रहण किया। तदनन्तर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। १५ ।।
यदासीच्चाक्षुषं जन्म द्वितीयं ब्रह्मणो नृप ।
तदा पितामहेनैव सोमाद् धर्मः परिश्रुतः ।। १६ ।।
नारायणात्मको राजन् रुद्राय प्रददौ च तम् ।
नरेश्वर! जब ब्रह्माजीका नेत्रजनित द्वितीय जन्म हुआ, तब उन्होंने सोमसे उस नारायण-स्वरूप धर्मको सुना था। राजन्! ब्रह्माजीने रुद्रको इसका उपदेश दिया ।। १६ १/२ ।।
ततो योगस्थितो रुद्रः पुरा कृतयुगे नृप ।। १७ ।।
बालखिल्यानृषीन् सर्वान् धर्ममेतदपाठयत् ।
अन्तर्दधे ततो भूयस्तस्य देवस्य मायया ।। १८ ।।
नरेश्वर! तत्पश्चात् योगनिष्ठ रुद्रने पूर्वकालके कृतयुगमें सम्पूर्ण बालखिल्य ऋषियोंको इस धर्मसे अवगत कराया; तदनन्तर भगवान् विष्णुकी मायासे वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। १७-१८ ।।
तृतीयं ब्रह्मणो जन्म यदासीद् वाचिकं महत् ।
तत्रैष धर्मः सम्भूतः स्वयं नारायणान्नृप ।। १९ ।।
राजन्! जब भगवान्की वाणीसे ब्रह्माजीका तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, तब फिर साक्षात् नारायणसे ही यह धर्म प्रकट हुआ ।। १९ ।।
सुपर्णो नाम तमृषिः प्राप्तवान् पुरुषोत्तमात् ।
तपसा वै सुतप्तेन दमेन नियमेन च ।। २० ।।
सुपर्ण नामक ऋषिने इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह-पूर्वक भलीभाँति तपस्या करके भगवान् पुरुषोत्तमसे इस धर्मको प्राप्त किया ।। २० ।।
त्रिःपरिक्रान्तवानेतत् सुपर्णो धर्ममुत्तमम् ।
यस्मात् तस्माद् व्रतं ह्येतत् त्रिसौपर्णमिहोच्यते ।। २१ ।।
सुपर्णने प्रतिदिन इस उत्तम धर्मकी तीन आवृत्ति की थी, इसलिये इस व्रत या धर्मको यहाँ 'त्रिसौपर्ण' कहते हैं ।। २१ ।।
ऋग्वेदपाठपठितं व्रतमेतद्धि दुश्चरम् ।