भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2378

कीर्ति, श्री और लक्ष्मी आदि देवियाँ नारायणको ही अपना परम आश्रय मानती हैं। सांख्यका परम तात्पर्य भी नारायण ही हैं और योग भी नारायणका ही स्वरूप है ।। ८७ ।।

कारणं पुरुषो ह्येषां प्रधानं चापि कारणम् ।
स्वभावश्चैव कर्माणि दैवं येषां च कारणम् ।। ८८ ।।
पुरुष, प्रधान, स्वभाव, कर्म तथा दैव—ये जिन वस्तुओंके कारण हैं, वे भी नारायणरूप ही हैं ।। ८८ ।।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधा च तथा चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।। ८९ ।।
पञ्चकारणसंख्यातो निष्ठा सर्वत्र वै हरिः ।
अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न-भिन्न प्रकारके करण, नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ तथा पाँचवाँ दैव—इन पाँच कारणोंके रूपमें सर्वत्र श्रीहरि ही विराजमान हैं ।। ८९ ½ ।।

तत्त्वं जिज्ञासमानानां हेतुभिः सर्वतोमुखैः ।। ९० ।।
तत्त्वमेको महायोगी हरिनारायणः प्रभुः ।
जो लोग सर्वव्यापक हेतुओंद्वारा तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखते हैं, उनके लिये महायोगी भगवान् नारायण हरि ही एकमात्र ज्ञातव्य तत्त्व हैं ।। ९० ½ ।।

ब्रह्मादीनां स लोकानामृषीणां च महात्मनाम् ।। ९१ ।।
सांख्यानां योगिनां चापि यतीनामात्मवेदिनाम् ।
मनीषितं विजानाति केशवो न तु तस्य ते ।। ९२ ।।
भगवान् केशव ब्रह्मा आदि देवताओं, सम्पूर्ण लोकों, महात्मा-ऋषियों, सांख्यवेत्ताओं, योगियों और आत्मज्ञानी यतियोंके मनकी बातें भी जानते हैं; परंतु उनके मनमें क्या है? यह उनमेंसे किसीको पता नहीं है ।।

ये केचित् सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते ।
दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत् ।। ९३ ।।
सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः ।
सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते ।। ९४ ।।
समस्त विश्वमें जो कोई देवताओंके लिये यज्ञ और पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, दान देते हैं और बड़ी भारी तपस्या करते हैं, उन सबके आश्रय भगवान् विष्णु ही हैं। वे अपने ऐश्वर्ययोगमें स्थित रहते हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके आवासस्थान होनेके कारण वे 'वासुदेव' कहे जाते हैं ।। ९३-९४ ।।

अयं हि नित्यः परमो महर्षि-
र्महाविभूतिर्गुणवर्जिताख्यः ।
गुणैश्च संयोगमुपैति शीघ्रं
कालो यथर्तावृतुसम्प्रयुक्तः ।। ९५ ।।

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