महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2377, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरमात्मा कार्यसाधनके लिये जिस-जिस शरीरको धारण करना चाहते हैं, उसे कार्य करते समय स्वयं ही प्रकट कर लेते हैं ॥ ७९ ॥ एष वेदनिधिः श्रीमानेष वै तपसो निधिः । एष योगश्च सांख्यं च ब्रह्म चाग्र्यं हविर्विभुः ॥ ८० ॥ ये श्रीमान् हरि वेद और तपस्याकी निधि हैं। ये ही योग, सांख्य, ब्रह्म, श्रेष्ठ हविष्य और विभु हैं ॥ ८० ॥ नारायणपरा वेदा यज्ञा नारायणात्मकाः । तपो नारायणपरं नारायणपरा गतिः ॥ ८१ ॥ वेदोंका पर्यवसान भगवान् नारायणमें ही है। यज्ञ नारायणके ही स्वरूप हैं। तपस्याके परम फल भगवान् नारायण ही हैं तथा नारायणकी प्राप्ति ही सर्वोत्तम गति है ॥ ८१ ॥ नारायणपरं सत्यमृतं नारायणात्मकम् । नारायणपरो धर्मः पुनरावृत्तिदुर्लभः ॥ ८२ ॥ सत्यके परम लक्ष्य नारायण ही हैं। ऋत नारायणका ही स्वरूप है। जिसके आचरणसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती, उस निवृत्तिप्रधान धर्मके भी चरम लक्ष्य भगवान् नारायण ही हैं ॥ ८२ ॥ प्रवृत्तिलक्षणश्चैव धर्मो नारायणात्मकः । नारायणात्मको गन्धो भूमौ श्रेष्ठतमः स्मृतः ॥ ८३ ॥ प्रवृत्तिरूप धर्म भी नारायणका ही स्वरूप है। भूमिका श्रेष्ठतम गुण गन्ध भी नारायणमय ही है ॥ ८३ ॥ अपां चापि गुणा राजन् रसा नारायणात्मकाः । ज्योतिषां च परं रूपं स्मृतं नारायणात्मकम् ॥ ८४ ॥ राजन्! जलका गुण रस भी नारायणका ही स्वरूप है। तेजका उत्तम गुण रूप भी नारायणमय ही है ॥ ८४ ॥ नारायणात्मकश्चापि स्पर्शो वायुगुणः स्मृतः । नारायणात्मकश्चैव शब्द आकाशसम्भवः ॥ ८५ ॥ वायुका गुण स्पर्श भी नारायणस्वरूप ही है तथा आकाशका गुण शब्द भी नारायणमय ही है ॥ ८५ ॥ मनश्चापि ततो भूतमव्यक्तगुणलक्षणम् । नारायणपरः कालो ज्योतिषामयनं च यत् ॥ ८६ ॥ अव्यक्त गुण एवं लक्षणवाला मन नामक भूत, काल और नक्षत्रमण्डल—ये सब नारायणके ही आश्रित हैं ॥ ८६ ॥ नारायणपरा कीर्तिः श्रीश्च लक्ष्मीश्च देवताः । नारायणपरं सांख्यं योगो नारायणात्मकः ॥ ८७ ॥