महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2376, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार वेदोंको वापस लाकर और मधु-कैटभका वध करके भगवान् पुरुषोत्तमने ब्रह्माजीका शोक दूर कर दिया ।। ७१ ।। ततः परिवृतो ब्रह्मा हरिणा वेदसत्कृतः । निर्ममे स तदा लोकान् कृत्स्नान् स्थावरजङ्गमान् ॥ ७२ ॥ तत्पश्चात् वेदसे सम्मानित और भगवान्से सुरक्षित होकर ब्रह्माजीने समस्त चराचर जगत्की सृष्टि की ।। ७२ ।। दत्त्वा पितामहायाग्र्यां मतिं लोकविसर्गिकाम् । तत्रैवान्तर्दधे देवो यत एवागतो हरिः ॥ ७३ ॥ ब्रह्माजीको लोक-रचनाकी श्रेष्ठ बुद्धि देकर भगवान् नारायणदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। वे जहाँसे आये थे, वहीं चले गये ।। ७३ ।। तौ दानवौ हरिर्हत्वा कृत्वा हयशिरस्तनुम् । पुनः प्रवृत्तिधर्मार्थं तामेव विदधे तनुम् ॥ ७४ ॥ श्रीहरिने इस प्रकार हयग्रीवरूप धारण करके उन दोनों दानवोंका वध किया था। उन्होंने पुनः प्रवृत्तिधर्मका प्रचार करनेके लिये ही उस शरीरको प्रकट किया था ।। ७४ ।। एवमेव महाभागो बभूवाश्वशिरा हरिः । पौराणमेतत् प्रख्यातं रूपं वरदमैश्वरम् ॥ ७५ ॥ इस तरह महाभाग श्रीहरिने हयग्रीवरूप धारण किया था। भगवान्का यह वरदायक रूप पुरातन एवं पुराण-प्रसिद्ध है ।। ७५ ।। यो ह्येतद् ब्राह्मणो नित्यं शृणुयाद् धारयीत वा । न तस्याध्ययनं नाशमुपगच्छेत् कदाचन ॥ ७६ ॥ जो ब्राह्मण प्रतिदिन इस अवतार-कथाको सुनता या स्मरण करता है, उसका अध्ययन कभी नष्ट (निष्फल) नहीं होता है ।। ७६ ।। आराध्य तपसोग्रेण देवं हयशिरोधरम् । पञ्चालेन क्रमः प्राप्तो देवेन पथि देशिते ॥ ७७ ॥ महादेवजीके बताये हुए मार्गपर चलकर उग्र तपस्याद्वारा भगवान् हयग्रीवकी आराधना करके पांचालदेशीय गालवमुनिने वेदोंका क्रमविभाग प्राप्त किया था ।। ७७ ।। एतद्धयशिरो राजन्नाख्यानं तव कीर्तितम् । पुराणं वेदसमितं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ७८ ॥ राजन्! तुमने जिसके लिये मुझसे पूछा था, यह हयग्रीवावतारकी वेदानुमोदित प्राचीन कथा मैंने तुम्हें सुना दी ।। ७८ ।। यां यामिच्छेत् तनुं देवः कर्तुं कार्यविधौ क्वचित् । तां तां कुर्याद् विकुर्वाणः स्वयमात्मानमात्मना ॥ ७९ ॥