भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2375

अपहरण किया है। यह किसका पुत्र है? कौन है? और क्यों यहाँ सर्पके शरीरकी शय्यापर सो रहा है?' ।। ६६-६७ ।।

इत्युच्चारितवाक्यौ तौ बोधयामासतुर्हरिम् ।
युद्धार्थिनौ हि विज्ञाय विबुद्धः पुरुषोत्तमः ।। ६८ ।।
निरीक्ष्य चासुरेन्द्रौ तौ ततो युद्धे मनो दधे ।
इस प्रकार बातचीत करके उन दोनोंने भगवान्‌को जगाया। उन्हें युद्धके लिये उत्सुक जान भगवान् पुरुषोत्तम जाग उठे। फिर उन दोनों असुरेन्द्रोंका अच्छी तरह निरीक्षण करके उन्होंने मन-ही-मन उनके साथ युद्ध करनेका निश्चय किया ।। ६८ १/२ ।।

अथ युद्धं समभवत् तयोर्नारायणस्य वै ।। ६९ ।।
रजस्तमोविष्टतनू तावुभौ मधुकैटभौ ।
ब्रह्मणोपचितिं कुर्वन् जघान मधुसूदनः ।। ७० ।।
फिर तो उन दोनों असुरोंका और भगवान् नारायणका युद्ध आरम्भ हो गया। भगवान् मधुसूदनने ब्रह्माजीका मान रखनेके लिये तमोगुण और रजोगुणसे आविष्ट शरीरवाले उन दोनों दैत्यों—मधु और कैटभको मार डाला ।।

ततस्तयोर्वधेनाशु वेदापहरणेन च ।
शोकापनयनं चक्रे ब्रह्मणः पुरुषोत्तमः ।। ७१ ।।