महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कीर्ति, श्री और लक्ष्मी आदि देवियाँ नारायणको ही अपना परम आश्रय मानती हैं। सांख्यका परम तात्पर्य भी नारायण ही हैं और योग भी नारायणका ही स्वरूप है ।। ८७ ।।
कारणं पुरुषो ह्येषां प्रधानं चापि कारणम् ।
स्वभावश्चैव कर्माणि दैवं येषां च कारणम् ।। ८८ ।।
पुरुष, प्रधान, स्वभाव, कर्म तथा दैव—ये जिन वस्तुओंके कारण हैं, वे भी नारायणरूप ही हैं ।। ८८ ।।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधा च तथा चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।। ८९ ।।
पञ्चकारणसंख्यातो निष्ठा सर्वत्र वै हरिः ।
अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न-भिन्न प्रकारके करण, नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ तथा पाँचवाँ दैव—इन पाँच कारणोंके रूपमें सर्वत्र श्रीहरि ही विराजमान हैं ।। ८९ ½ ।।
तत्त्वं जिज्ञासमानानां हेतुभिः सर्वतोमुखैः ।। ९० ।।
तत्त्वमेको महायोगी हरिनारायणः प्रभुः ।
जो लोग सर्वव्यापक हेतुओंद्वारा तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखते हैं, उनके लिये महायोगी भगवान् नारायण हरि ही एकमात्र ज्ञातव्य तत्त्व हैं ।। ९० ½ ।।
ब्रह्मादीनां स लोकानामृषीणां च महात्मनाम् ।। ९१ ।।
सांख्यानां योगिनां चापि यतीनामात्मवेदिनाम् ।
मनीषितं विजानाति केशवो न तु तस्य ते ।। ९२ ।।
भगवान् केशव ब्रह्मा आदि देवताओं, सम्पूर्ण लोकों, महात्मा-ऋषियों, सांख्यवेत्ताओं, योगियों और आत्मज्ञानी यतियोंके मनकी बातें भी जानते हैं; परंतु उनके मनमें क्या है? यह उनमेंसे किसीको पता नहीं है ।।
ये केचित् सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते ।
दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत् ।। ९३ ।।
सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थितः ।
सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते ।। ९४ ।।
समस्त विश्वमें जो कोई देवताओंके लिये यज्ञ और पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, दान देते हैं और बड़ी भारी तपस्या करते हैं, उन सबके आश्रय भगवान् विष्णु ही हैं। वे अपने ऐश्वर्ययोगमें स्थित रहते हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके आवासस्थान होनेके कारण वे 'वासुदेव' कहे जाते हैं ।। ९३-९४ ।।
अयं हि नित्यः परमो महर्षि-
र्महाविभूतिर्गुणवर्जिताख्यः ।
गुणैश्च संयोगमुपैति शीघ्रं
कालो यथर्तावृतुसम्प्रयुक्तः ।। ९५ ।।
ये परम महर्षि नारायण नित्य, महान् ऐश्वर्यसे युक्त और गुणोंसे रहित हैं तथापि जैसे गुणहीन काल ऋतुके गुणोंसे युक्त होता है, उसी प्रकार वे भी समय-समयपर गुणोंको स्वीकार करके उनसे संयुक्त होते हैं ।। ९५ ।।
नैवास्य विन्दन्ति गतिं महात्मनो
न चागतिं कश्चिदिहानुपश्यति ।
ज्ञानात्मकाः सन्ति हि ये महर्षयः
पश्यन्ति नित्यं पुरुषं गुणाधिकम् ।। ९६ ।।
उन महात्माकी गतिको कोई नहीं जानता। उनके आगमनका भी यहाँ किसीको कुछ पता नहीं चलता। जो ज्ञानस्वरूप महर्षि हैं, वे ही उन नित्य, अन्तर्यामी एवं अनन्तगुणविभूषित परमात्माका साक्षात्कार करते हैं ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३४७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४७ ।।
* वैशम्पायनजीने जनमेजयको महाभारतकी कथा वेदव्यासजीकी आज्ञासे सुनायी थी इस कारण यहाँ ऐसा लिखा है।
सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान्के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
अष्टचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान्के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा
जनमेजय उवाच
अहो ह्येकान्तिनः सर्वान् प्रीणाति भगवान् हरिः ।
विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान् स्वयम् ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**ब्रह्मन्! भगवान् अनन्यभावसे भजन करनेवाले सभी भक्तोंको प्रसन्न करते और उनकी विधिवत् की हुई पूजाको स्वयं ग्रहण करते हैं; यह कितने आनन्दकी बात है ॥ १ ॥
ये तु दग्धेन्धना लोके पुण्यपापविवर्जिताः ।
तेषां त्वयाभिनिर्दिष्टा पारम्पर्यगता गतिः ॥ २ ॥
संसारमें जिन लोगोंकी वासनाएँ दग्ध हो गयी हैं और जो पुण्य-पापसे रहित हो गये हैं, उन्हें परम्परासे जो गति प्राप्त होती है, उसका भी आपने वर्णन किया है ॥
चतुर्थ्यां चैव ते गत्यां गच्छन्ति पुरुषोत्तमम् ।
एकान्तिनस्तु पुरुषा गच्छन्ति परमं पदम् ॥ ३ ॥
जो भगवान्के अनन्य भक्त हैं, वे साधुपुरुष अनिरुद्ध, प्रद्युम्न और संकर्षणकी अपेक्षा न रखकर वासुदेवसंज्ञक चौथी गतिमें पहुँचकर भगवान् पुरुषोत्तम एवं उनके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३ ॥
नूनमेकान्तधर्मोऽयं श्रेष्ठो नारायणप्रियः ।
अगत्वा गतयस्तिस्रो यद् गच्छत्यव्ययं हरिम् ॥ ४ ॥
निश्चय ही यह अनन्यभावसे भगवान्का भजनरूप धर्म श्रेष्ठ एवं श्रीनारायणको परम प्रिय है; क्योंकि इसका आश्रय लेनेवाले भक्तजन उक्त तीन गतियोंको प्राप्त न होकर सीधे चौथी गतिमें पहुँचकर अविनाशी श्रीहरिको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४ ॥
सहोपनिषदान् वेदान् ये विप्राः सम्यगास्थिताः ।
पठन्ति विधिमास्थाय ये चापि यतिधर्मिणः ॥ ५ ॥
तेभ्यो विशिष्टां जानामि गतिमेकान्तिनां नृणाम् ।
जो ब्राह्मण उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका भलीभाँति आश्रय ले उनका विधिपूर्वक स्वाध्याय करते हैं तथा जो संन्यासधर्मका पालन करनेवाले हैं, इन सबसे उत्तम गति उन्हींको प्राप्त होती है, जो भगवान्के अनन्य भक्त होते हैं ॥ ५ १/२ ॥
केनैश धर्मः कथितो देवेन ऋषिणापि वा ।। ६ ।।
एकान्तिनां च का चर्या कदा चोत्पादिता विभो ।
एतन्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ।। ७ ।।
भगवन्! इस भक्तिरूप धर्मका किस देवता अथवा ऋषिने उपदेश किया है? अनन्य भक्तोंकी जीवनचर्या क्या है? और वह कबसे प्रचलित हुई? मेरे इस संशयका निवारण कीजिये। इस विषयको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ।। ६-७ ।।
वैशम्पायन उवाच
समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपाण्डवयोधर्मृधे ।
अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ।। ८ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! जिस समय कौरव और पाण्डवोंकी सेनाएँ युद्धके लिये आमने-सामने डटी हुई थीं और अर्जुन युद्धसे अनमने हो रहे थे, उस समय स्वयं भगवान्ने उन्हें गीतामें इस धर्मका उपदेश दिया ।। ८ ।।
अगतिश्च गतिश्चैव पूर्वं ते कथिता मया ।
गहनो ह्येष धर्मो वै दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ।। ९ ।।
मैंने पहले तुमसे गति और अगदिका स्वरूप भी बताया था। यह धर्म गहन तथा अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्गम है ।। ९ ।।
सम्मितः सामवेदेन पुरैवादियुगे कृतः ।
धार्यते स्वयमीशेन राजन् नारायणेन च ।। १० ।।
राजन्! यह धर्म सामवेदके समान है। प्राचीनकालके सत्ययुगसे ही यह प्रचलित हुआ है। स्वयं जगदीश्वर भगवान् नारायण ही इस धर्मको धारण करते हैं ।। १० ।।
एतदर्थं महाराज पृष्टः पार्थेन नारदः ।
ऋषिमध्ये महाभागः शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ।। ११ ।।
महाराज! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने ऋषियोंके बीचमें महाभाग नारदजीसे यही विषय पूछा था। उस समय श्रीकृष्ण और भीष्म भी इस विषयको सुन रहे थे ।। ११ ।।
गुरुणा च मयाप्येष कथितो नृपसत्तम ।
यथा तत् कथितं तत्र नारदेन तथा शृणु ।। १२ ।।
नृपश्रेष्ठ! मेरे गुरु व्यासजीने और मैंने भी यह विषय कहा था; परंतु वहाँ नारदजीने उस विषयका जैसा वर्णन किया था, उसे बताता हूँ, सुनो ।। १२ ।।
यदासीन्मानसं जन्म नारायणमुखोद्गतम् ।
ब्रह्मणः पृथिवीपाल तदा नारायणः स्वयम् ।। १३ ।।
तेन धर्मेण कृतवान् दैवं पित्र्यं च भारत ।
फेनपा ऋषयश्चैव तं धर्मं प्रतिपेदिरे ।। १४ ।।
भूपाल! सृष्टिके आदिमें जब भगवान् नारायणके मुखसे ब्रह्माजीका मानसिक जन्म हुआ था, उस समय साक्षात् नारायणने उन्हें इस धर्मका उपदेश किया था। भरतनन्दन! नारायणने उस धर्मसे देवताओं और पितरोंका पूजनादि कर्म किया था। फिर फेनप ऋषियोंने उस धर्मको ग्रहण किया ।। १३-१४ ।।
वैखानसाः फेनपेभ्यो धर्मं तं प्रतिपेदिरे ।
वैखानसेभ्यः सोमस्तु ततः सोऽन्तर्दधे पुनः ।। १५ ।।
फेनपोंसे वैखानसोंने उस धर्मको उपलब्ध किया। उनसे सोमने उसे ग्रहण किया। तदनन्तर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। १५ ।।
यदासीच्चाक्षुषं जन्म द्वितीयं ब्रह्मणो नृप ।
तदा पितामहेनैव सोमाद् धर्मः परिश्रुतः ।। १६ ।।
नारायणात्मको राजन् रुद्राय प्रददौ च तम् ।
नरेश्वर! जब ब्रह्माजीका नेत्रजनित द्वितीय जन्म हुआ, तब उन्होंने सोमसे उस नारायण-स्वरूप धर्मको सुना था। राजन्! ब्रह्माजीने रुद्रको इसका उपदेश दिया ।। १६ १/२ ।।
ततो योगस्थितो रुद्रः पुरा कृतयुगे नृप ।। १७ ।।
बालखिल्यानृषीन् सर्वान् धर्ममेतदपाठयत् ।
अन्तर्दधे ततो भूयस्तस्य देवस्य मायया ।। १८ ।।
नरेश्वर! तत्पश्चात् योगनिष्ठ रुद्रने पूर्वकालके कृतयुगमें सम्पूर्ण बालखिल्य ऋषियोंको इस धर्मसे अवगत कराया; तदनन्तर भगवान् विष्णुकी मायासे वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। १७-१८ ।।
तृतीयं ब्रह्मणो जन्म यदासीद् वाचिकं महत् ।
तत्रैष धर्मः सम्भूतः स्वयं नारायणान्नृप ।। १९ ।।
राजन्! जब भगवान्की वाणीसे ब्रह्माजीका तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, तब फिर साक्षात् नारायणसे ही यह धर्म प्रकट हुआ ।। १९ ।।
सुपर्णो नाम तमृषिः प्राप्तवान् पुरुषोत्तमात् ।
तपसा वै सुतप्तेन दमेन नियमेन च ।। २० ।।
सुपर्ण नामक ऋषिने इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह-पूर्वक भलीभाँति तपस्या करके भगवान् पुरुषोत्तमसे इस धर्मको प्राप्त किया ।। २० ।।
त्रिःपरिक्रान्तवानेतत् सुपर्णो धर्ममुत्तमम् ।
यस्मात् तस्माद् व्रतं ह्येतत् त्रिसौपर्णमिहोच्यते ।। २१ ।।
सुपर्णने प्रतिदिन इस उत्तम धर्मकी तीन आवृत्ति की थी, इसलिये इस व्रत या धर्मको यहाँ 'त्रिसौपर्ण' कहते हैं ।। २१ ।।
ऋग्वेदपाठपठितं व्रतमेतद्धि दुश्चरम् ।
सुपर्णाच्चाप्यधिगतो धर्म एष सनातनः ॥ २२ ॥ वायुना द्विपदां श्रेष्ठ कथितो जगदायुषा । यह दुष्कर धर्म ऋग्वेदके पाठमें स्पष्टरूपसे पढ़ा गया है। नरश्रेष्ठ! सुपर्णसे उस सनातन धर्मको इस जगत्के प्राणस्वरूप वायुने प्राप्त किया ॥ २२ १/२ ॥ वायोः सकाशात् प्राप्तश्च ऋषिभिर्विघसाशिभिः ॥ २३ ॥ ततो महोदधिश्चैव प्राप्तवान् धर्ममुत्तमम् । अन्तर्दधे ततो भूयो नारायणसमाहितः ॥ २४ ॥ वायुसे विघसाशी ऋषियोंने इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया। उनसे महोदधिको इस उत्तम धर्मकी प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् यह धर्म फिर लुप्त होकर भगवान् नारायणमें विलीन हो गया ॥ २३-२४ ॥ यदा भूयः श्रवणजा सृष्टिरासीन्महात्मनः । ब्रह्मणः पुरुषव्याघ्र तत्र कीर्तयतः शृणु ॥ २५ ॥ पुरुषसिंह! जब पुनः भगवान्के कानोंसे महात्मा ब्रह्माजीकी चौथी बार उत्पत्ति हुई, तब जिस प्रकार इस धर्मका प्रादुर्भाव हुआ था, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २५ ॥ जगत्स्रष्टुमना देवो हरिनारायणः स्वयम् । चिन्तयामास पुरुषं जगत्सर्गकरं प्रभुम् ॥ २६ ॥ साक्षात् भगवान् नारायण हरिने जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे एक ऐसे पुरुषका चिन्तन किया, जो संसारकी सृष्टि करनेमें पूर्णतः समर्थ हो ॥ २६ ॥ अथ चिन्तयतस्तस्य कर्णाभ्यां पुरुषः स्मृतः । प्रजासर्गकरो ब्रह्मा तमुवाच जगत्पतिः ॥ २७ ॥ सृज प्रजाः पुत्र सर्वा मुखतः पादतस्तथा । कहा जाता है, चिन्तन करते समय भगवान्के दोनों कानोंसे एक पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। वही प्रजाकी सृष्टि करनेवाला ब्रह्मा हुआ। जगदीश्वर नारायणने ब्रह्मासे कहा—'बेटा! तुम अपने मुखसे लेकर पैरतकके अंगोंसे समस्त प्रजाकी सृष्टि करो ॥ २७ १/२ ॥ श्रेयस्तव विधास्यामि बलं तेजश्च सुव्रत ॥ २८ ॥ धर्मं च मत्तो गृह्णीष्व सात्वतं नाम नामतः । तेन सृष्टं कृतयुगं स्थापयस्व यथाविधि ॥ २९ ॥ 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुत्र! मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा और तुम्हारे भीतर तेज एवं बलकी वृद्धि करता रहूँगा। तुम मुझसे इस सात्वत नामक धर्मको ग्रहण करो और उसके द्वारा विधिपूर्वक सत्ययुगकी सृष्टि करके उसकी स्थापना करो' ॥ २८-२९ ॥ ततो ब्रह्मा नमश्चक्रे देवाय हरिमेधसे । धर्मं चाग्र्यं स जग्राह सरहस्यं ससंग्रहम् ॥ ३० ॥ आरण्यकेन सहितं नारायणमुखोद्भवम् ।
तदनन्तर ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिको नमस्कार किया और उन्हीं नारायणदेवके मुखसे प्रकट आरण्यक, रहस्य तथा संग्रहसहित उस श्रेष्ठ धर्मका उपदेश ग्रहण किया ।। ३० १/२ ।। उपदिश्य ततो धर्मं ब्रह्मणेऽमिततेजसे ।। ३१ ।। त्वं कर्ता युगधर्माणां निराशीः कर्मसंज्ञितम् । अमिततेजस्वी ब्रह्माको इस धर्मका उपदेश देकर उस समय भगवान्ने उनसे कहा—‘तुम निष्कामभावसे सारे कर्म करते हुए युगधर्मोंके प्रवर्तक बनो’ ।। ३१ १/२ ।। जगाम तमसः पारं यत्राव्यक्तं व्यवस्थितम् ।। ३२ ।। ततोऽथ वरदो देवो ब्रह्मा लोकपितामहः । असृजत् स ततो लोकान् कृत्स्नान् स्थावरजङ्गमान् ।। ३३ ।। यह आदेश देकर वे अज्ञानान्धकारसे परे विराजमान अपने परम अव्यक्त धामको चले गये। तदनन्तर वरदायक देवता लोकपितामह ब्रह्माने सम्पूर्ण चराचर लोकोंकी सृष्टि की ।। ३२-३३ ।। ततः प्रावर्तत तदा आदौ कृतयुगं शुभम् । ततो हि सात्वतो धर्मो व्याप्य लोकानवस्थितः ।। ३४ ।। फिर तो सृष्टिके आरम्भमें कल्याणकारी कृतयुगकी प्रवृत्ति हुई और तबसे सात्वतधर्म सारे संसारमें व्याप्त हो गया ।। ३४ ।। तेनैवाद्येन धर्मेण ब्रह्मा लोकविसर्गकृत् । पूजयामास देवेशं हरिं नारायणं प्रभुम् ।। ३५ ।। लोकस्रष्टा ब्रह्माने उसी आदिधर्मके द्वारा देवेश्वर भगवान् नारायण हरिकी आराधना की ।। ३५ ।। धर्मप्रतिष्ठाहेतोश्च मनुं स्वारोचिषं ततः । अध्यापयामास तदा लोकानां हितकाम्यया ।। ३६ ।। फिर इस धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उन्होंने स्वारोचिषमनुको उस समय इस धर्मका उपदेश किया ।। ३६ ।। ततः स्वरोचिषः पुत्रं स्वयं शङ्खपदं नृप । अध्यापयत् पुराव्यग्रः सर्वलोकपतिर्विभुः ।। ३७ ।। नरेश्वर! उन दिनों स्वारोचिष मनु ही सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति एवं प्रभु थे। उन्होंने शान्तभावसे पहले अपने पुत्र शंखपदको स्वयं इस धर्मका ज्ञान प्रदान किया ।। ३७ ।। ततः शङ्खपदश्चापि पुत्रमात्मजमौरसम् । दिशां पालं सुवर्णाभमध्यापयत भारत । सोऽन्तर्दधे ततो भूयः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ।। ३८ ।। भारत! फिर शंखपदने भी अपने औरस पुत्र दिक्पाल सुवर्णाभको इस धर्मका अध्ययन कराया। इसके बाद त्रेतायुग प्राप्त होनेपर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। ३८ ।।
नासिक्ये जन्मनि पुरा ब्रह्मणः पार्थिवोत्तम । धर्ममेतं स्वयं देवो हरिनारायणः प्रभुः ॥ ३९ ॥ तज्जगादारविन्दाक्षो ब्रह्मणः पश्यतस्तदा । नृपश्रेष्ठ! फिर पूर्वकालमें ब्रह्माजीने नासिकाके द्वारा जब पाँचवाँ जन्म ग्रहण किया, तब स्वयं कमलनयन भगवान् नारायण हरिने ब्रह्माजीके सामने इस धर्मका उपदेश दिया ॥ ३९ १/२ ॥
सनत्कुमारो भगवांस्ततः प्राधीतवान् नृप ॥ ४० ॥ सनत्कुमारादपि च वीरणो वै प्रजापतिः । कृतादौ कुरुशार्दूल धर्ममेतदधीतवान् ॥ ४१ ॥ नरेश्वर! तत्पश्चात् भगवान् सनत्कुमारने उनसे उस सात्वत-धर्मका उपदेश ग्रहण किया। कुरुश्रेष्ठ! सनत्कुमारसे वीरण प्रजापतिने कृतयुगके आदिमें इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया ॥ ४०-४१ ॥
वीरणश्चाप्यधीत्यैनं रैभ्याय मुनये ददौ । रैभ्यः पुत्राय शुद्धाय सुव्रताय सुमेधसे ॥ ४२ ॥ कुक्षिनाम्ने स प्रददौ दिशां पालाय धर्मिणे । ततोऽप्यन्तर्दधे भूयो नारायणमुखोद्भवः ॥ ४३ ॥ वीरणने इसका अध्ययन करके रैभ्यमुनिको उपदेश दिया। रैभ्यने उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ बुद्धिसे युक्त धर्मात्मा एवं शुद्ध आचार-विचारवाले अपने पुत्र दिक्पाल कुक्षिको इसका उपदेश दिया। तदनन्तर नारायणके मुखसे निकला हुआ यह सात्वत धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ ४२-४३ ॥
अण्डजे जन्मनि पुनर्ब्रह्मणे हरियोनये । एष धर्मः समुद्भूतो नारायणमुखात् पुनः ॥ ४४ ॥ इसके बाद जब ब्रह्माजीका अण्डसे छठा जन्म हुआ, तब भगवान्से उत्पन्न हुए ब्रह्माजीके लिये पुनः भगवान् नारायणके मुखसे यह धर्म प्रकट हुआ ॥ ४४ ॥
गृहीतो ब्रह्मणा राजन् प्रयुक्तश्च यथाविधि । अध्यापिताश्च मुनयो नाम्ना बर्हिषदो नृप ॥ ४५ ॥ राजन्! ब्रह्माजीने इस धर्मको ग्रहण किया और वे विधिपूर्वक उसे अपने उपयोगमें लाये। नरेश्वर! फिर उन्होंने बर्हिषद् नामवाले मुनियोंको इसका अध्ययन कराया ॥ ४५ ॥
बर्हिषद्भ्यश्च सम्प्राप्तः सामवेदान्तगं द्विजम् । ज्येष्ठं नामाभिविख्यातं ज्येष्ठसामव्रतो हरिः ॥ ४६ ॥ बर्हिषद् नामक ऋषियोंसे इस धर्मका उपदेश ज्येष्ठ नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मणको मिला, जो सामवेदके पारंगत विद्वान् थे। ज्येष्ठसामकी उपासनाका उन्होंने व्रत ले रखा था। इसलिये वे ज्येष्ठसामव्रती हरि कहलाते थे ॥ ४६ ॥
ज्येष्ठाच्चाप्यनुसंक्रान्तो राजानमविकम्पनम् ।
अन्तर्दधे ततो राजन्नेष धर्मः प्रभो हरेः ॥ ४७ ॥
राजन्! ज्येष्ठसे राजा अविकम्पनको इस धर्मका उपदेश प्राप्त हुआ। प्रभो! तदनन्तर यह भागवत-धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ ४७ ॥
यदिदं सप्तमं जन्म पद्मजं ब्रह्मणो नृप ।
तत्रैष धर्मः कथितः स्वयं नारायणेन ह ॥ ४८ ॥
पितामहाय शुद्धाय युगादौ लोकधारिणे ।
पितामहश्च दक्षाय धर्ममेतं पुरा ददौ ॥ ४९ ॥
नरेश्वर! यह जो ब्रह्माजीका भगवान्के नाभिकमलसे सातवाँ जन्म हुआ है, इसमें स्वयं नारायणने ही कल्पके आरम्भमें जगद्धाता शुद्धस्वरूप ब्रह्माको इस धर्मका उपदेश दिया; फिर ब्रह्माजीने सबसे पहले प्रजापति दक्षको इस धर्मकी शिक्षा दी ॥ ४८-४९ ॥
ततो ज्येष्ठे तु दौहित्रे प्रादाद् दक्षो नृपोत्तम ।
आदित्ये सवितुर्ज्येष्ठे विवस्वाञ्जगृहे ततः ॥ ५० ॥
नृपश्रेष्ठ! इसके बाद दक्षने अपने ज्येष्ठ दौहित्र-अदितिके सवितासे भी बड़े पुत्रको इस धर्मका उपदेश दिया। उन्हींसे विवस्वान् (सूर्य) ने इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया ॥ ५० ॥
त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान् मनवे ददौ ।
मनुश्च लोकभूत्यर्थं सुतायेक्ष्वाकवे ददौ ॥ ५१ ॥
फिर त्रेतायुगके आरम्भमें सूर्यने मनुको और मनुने सम्पूर्ण जगत्के कल्याणके लिये अपने पुत्र इक्ष्वाकुको इसका उपदेश दिया ॥ ५१ ॥
इक्ष्वाकुणा च कथितो व्याप्य लोकानवस्थितः ।
गमिष्यति क्षयान्ते च पुनर्नायणं नृप ॥ ५२ ॥
इक्ष्वाकुके उपदेशसे इस सात्वत धर्मका सम्पूर्ण जगत्में प्रचार और प्रसार हो गया। नरेश्वर! कल्पान्तमें यह धर्म फिर भगवान् नारायणको ही प्राप्त हो जायगा ॥
यतीनां चापि यो धर्मः स ते पूर्वं नृपोत्तम ।
कथितो हरिगीतासु समासविधिकल्पितः ॥ ५३ ॥
नृपश्रेष्ठ! यतियोंका जो धर्म है, वह मैंने पहले ही तुम्हें हरिगीतामें संक्षेप शैलीसे बता दिया है ॥ ५३ ॥
नारदेन सुसम्प्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहः ।
एष धर्मो जगन्नाथात् साक्षान्नारायणान्नृप ॥ ५४ ॥
महाराज! नारदजीने रहस्य और संग्रहसहित इस धर्मको साक्षात् जगदीश्वर नारायणसे भलीभाँति प्राप्त किया था ॥ ५४ ॥
एवमेष महान् धर्म आद्यो राजन् सनातनः ।
दुर्विज्ञेयो दुष्करश्च सात्वतैर्धार्यते सदा ॥ ५५ ॥
राजन्! इस प्रकार यह आदि एवं महान् धर्म सनातनकालसे चला आ रहा है। यह दूसरोंके लिये दुर्ज्ञेय और दुष्कर है। भगवान्के भक्त सदा ही इस धर्मको धारण करते हैं॥ ५५ ॥ धर्मज्ञानेन चैतेन सुप्रयुक्तेन कर्मणा । अहिंसाधर्मयुक्तेन प्रीयते हरिरीश्वरः ॥ ५६ ॥ इस धर्मको जाननेसे और अहिंसाभावसे युक्त इस सात्वतधर्मको क्रियारूपसे आचरणमें लानेसे जगदीश्वर श्रीहरि प्रसन्न होते हैं॥ ५६ ॥ एकव्यूहविभागो वा क्वचिद् द्विव्यूहसंज्ञितः । त्रिव्यूहश्चापि संख्यातश्चतुर्व्यूहश्च दृश्यते ॥ ५७ ॥ भगवान्के भक्तोंद्वारा कभी केवल एक व्यूह—भगवान् वासुदेवकी, कभी दो व्यूह—वासुदेव और संकर्षणकी, कभी प्रद्युम्नसहित तीन व्यूहोंकी और कभी अनिरुद्धसहित चार व्यूहोंकी उपासना देखी जाती है॥ हरिरेव हि क्षेत्रज्ञो निर्ममो निष्कलस्तथा । जीवश्च सर्वभूतेषु पञ्चभूतगुणातिगः ॥ ५८ ॥ भगवान् श्रीहरि ही क्षेत्रज्ञ हैं, ममतारहित और निष्कल हैं। ये ही सम्पूर्ण भूतोंमें पाञ्चभौतिक गुणोंसे अतीत जीवात्मारूपसे विराजमान हैं॥ ५८ ॥ मनश्च प्रथितं राजन् पञ्चेन्द्रियसमीरणम् । एष लोकविधिर्धीमानेष लोकविसर्गकृत् ॥ ५९ ॥ राजन्! पाँचों इन्द्रियोंका प्रेरक जो विख्यात मन है, वह भी श्रीहरि ही हैं। ये बुद्धिमान् श्रीहरि ही सम्पूर्ण जगत्के प्रेरक और स्रष्टा हैं॥ ५९ ॥ अकर्ता चैव कर्ता च कार्यं कारणमेव च । यथेच्छति तथा राजन् क्रीडते पुरुषोऽव्ययः ॥ ६० ॥ नरेश्वर! ये अविनाशी पुरुष नारायण ही अकर्ता, कर्ता, कार्य तथा कारण हैं। ये जैसा चाहते हैं, वैसे ही क्रीड़ा करते हैं ॥ ६० ॥ एष एकान्तधर्मस्ते कीर्तितो नृपसत्तम । मया गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ॥ ६१ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे गुरुकृपासे ज्ञात हुए अनन्य भक्तिरूप धर्मका वर्णन किया है। जिनका अन्तःकरण पवित्र नहीं है, ऐसे लोगोंके लिये इस धर्मका ज्ञान होना बहुत ही कठिन है॥ ६१॥ एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप । यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात् कुरुनन्दन ॥ ६२ ॥ अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतैः । भवेत् कृतयुगप्राप्तिराशीःकर्मविवर्जिता ॥ ६३ ॥
नरेश्वर! भगवान्के अनन्य भक्त दुर्लभ हैं, क्योंकि ऐसे पुरुष बहुत नहीं हुआ करते। कुरुनन्दन! यदि सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले, आत्मज्ञानी, अहिंसक एवं अनन्य भक्तोंसे जगत् भर जाय तो यहाँ सर्वत्र सत्ययुग ही छा जाय और कहीं भी सकाम कर्मोंका अनुष्ठान न हो ।। ६२-६३ ।।
एवं स भगवान् व्यासो गुरुर्मम विशाम्पते ।
कथयामास धर्मज्ञो धर्मराज्ञे द्विजोत्तमः ।। ६४ ।।
ऋषीणां संनिधौ राजन् शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ।
प्रजानाथ! इस प्रकार मेरे धर्मज्ञ गुरु द्विजश्रेष्ठ भगवान् व्यासने श्रीकृष्ण और भीष्मके सुनते हुए ऋषि-मुनियोंके समीप धर्मराजको इस धर्मका उपदेश किया था ।। ६४ १/२ ।।
तस्याप्यकथयत् पूर्वं नारदः सुमहातपाः ।। ६५ ।।
देवं परमकं ब्रह्म श्वेतं चन्द्राभमच्युतम् ।
यत्र चैकान्तिनो यान्ति नारायणपरायणाः ।। ६६ ।।
राजन्! उनसे भी प्राचीनकालमें महातपस्वी नारदजीने इसका प्रतिपादन किया था। नारायणकी आराधनामें लगे हुए अनन्य भक्त चन्द्रमाके समान गौरवर्णवाले उन्हीं परब्रह्मस्वरूप भगवान् अच्युतको प्राप्त होते हैं ।। ६५-६६ ।।
जनमेजय उवाच
एवं बहुविधं धर्मं प्रतिबुद्धैर्निषेवितम् ।
न कुर्वन्ति कथं विप्रा अन्ये नानाव्रते स्थिताः ।। ६७ ।।
**जनमेजयने पूछा—**मुने! इस प्रकार ज्ञानी पुरुषोंद्वारा सेवित जो यह अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न धर्म है, इसे नाना प्रकारके व्रतोंमें लगे हुए दूसरे ब्राह्मण क्यों आचरणमें नहीं लाते हैं? ।। ६७ ।।
वैशम्पायन उवाच
तिस्रः प्रकृतयो राजन् देहबन्धेषु निर्मिताः ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चैव भारत ।। ६८ ।।
**वैशम्पायनजीने कहा—**भरतनन्दन! शरीरके बन्धनमें बँधे हुए जो जीव हैं, उनके लिये ईश्वरने तीन प्रकारकी प्रकृतियाँ बनायी हैं—सात्त्विकी, राजसी और तामसी ।। ६८ ।।
देहबन्धेषु पुरुषः श्रेष्ठः कुरुकुलोद्वह ।
सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षाय निश्चितः ।। ६९ ।।
पुरुषसिंह! कुरुकुलधुरंधर वीर! इन तीन प्रकृतियोंवाले जीवोंमें जो सात्त्विकी प्रकृतिसे युक्त सात्त्विक पुरुष है, वही श्रेष्ठ है; क्योंकि वही मोक्षका निश्चित अधिकारी है ।। ६९ ।।
अत्रापि स विजानाति पुरुषं ब्रह्मवित्तमम् ।
नारायणपरो मोक्षस्ततो वै सात्त्विकः स्मृतः ।। ७० ।।
यहाँ भी वह इस बातको अच्छी तरह जानता है कि परमपुरुष नारायण सर्वोत्तम वेदवेत्ता हैं और मोक्षके परम आश्रय भगवान् नारायण ही हैं, इसीलिये वह मनुष्य सात्त्विक माना गया है ।। ७० ।।
मनीषितं च प्राप्नोति चिन्तयन् पुरुषोत्तमम् ।
एकान्तभक्तिः सततं नारायणपरायणः ।। ७१ ।।
भगवान् नारायणके आश्रित उनका अनन्य भक्त अपने मनके अभीष्ट भगवान् पुरुषोत्तमका निरन्तर चिन्तन करता हुआ उनको प्राप्त कर लेता है ।। ७१ ।।
मनीषिणो हि ये केचिद् यतयो मोक्षधर्मिणः ।
तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ।। ७२ ।।
मोक्षधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो कोई भी मनीषी यति हैं तथा जिनकी तृष्णाका सर्वथा नाश हो गया है, उनके योग-क्षेमका भार स्वयं भगवान् नारायण वहन करते हैं ।। ७२ ।।
जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः ।
सात्त्विकस्तु स विज्ञेयो भवेन्मोक्षे च निश्चितः ।। ७३ ।।
जन्म-मरणके चक्करमें पड़े हुए जिस पुरुषको भगवान् मधुसूदन अपनी कृपा-दृष्टिसे देख लेते हैं, उसे सात्त्विक जानना चाहिये। वह मोक्षका सुनिश्चित अधिकारी हो जाता है ।। ७३ ।।
सांख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तसेवितः ।
नारायणात्मके मोक्षे ततो यान्ति परां गतिम् ।। ७४ ।।
एकान्त भक्तोंद्वारा सेवित धर्म सांख्य और योगके तुल्य है। उसके सेवनसे मनुष्य नारायणस्वरूप मोक्षमें ही परम गतिको प्राप्त होते हैं ।। ७४ ।।
नारायणेन दृष्टस्तु प्रतिबुद्धो भवेत् पुमान् ।
एवमात्मेच्छया राजन् प्रतिबुद्धो न जायते ।। ७५ ।।
राजन्! जिसपर भगवान् नारायणकी कृपादृष्टि हो जाती है, वह पुरुष ही ज्ञानवान् होता है। इस तरह अपनी इच्छामात्रसे कोई ज्ञानी नहीं होता ।। ७५ ।।
राजसी तामसी चैव व्यामिश्रे प्रकृती स्मृते ।
तदात्मकं हि पुरुषं जायमानं विशाम्पते ।। ७६ ।।
प्रवृत्तिलक्षणैर्युक्तं नावेक्षति हरिः स्वयम् ।
प्रजानाथ! राजसी और तामसी—ये दो प्रकृतियाँ दोषोंसे मिश्रित होती हैं। जो पुरुष राजस और तामस प्रकृतिसे युक्त होकर जन्म धारण करता है, वह प्रायः सकाम कर्ममें प्रवृत्तिके लक्षणोंसे युक्त होता है। अतः भगवान् श्रीहरि उसकी ओर नहीं देखते ।। ७६ १/२ ।।
पश्यत्येनं जायमानं ब्रह्मा लोकपितामहः ।। ७७ ।।
रजसा तमसा चैव मानसं समभिप्लुतम् ।
ऐसा पुरुष जब जन्म लेता है, तब उसपर लोकपितामह ब्रह्माकी कृपादृष्टि होती है (और वे उसे प्रवृत्तिमार्गमें नियुक्त कर देते हैं)। उसका मन रजोगुण और तमोगुणके प्रवाहमें डूबा रहता है ।। ७७ १/२ ।।
कामं देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम ।। ७८ ।।
हीनाः सत्त्वेन शुद्धेन ततो वैकारिकाः स्मृताः ।
नृपश्रेष्ठ! देवता और ऋषि कामनायुक्त सत्त्वगुणमें स्थित होते हैं। उनमें भी शुद्ध सत्त्वगुणकी कमी होती है, इसलिये वे वैकारिक माने जाते हैं ।। ७८ १/२ ।।
जनमेजय उवाच
कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।। ७९ ।।
वद सर्वं यथादृष्टं प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् ।
**जनमेजयने पूछा—**मुने! वैकारिक पुरुष भगवान् पुरुषोत्तमको कैसे प्राप्त कर सकता है? यह सब आप अपने अनुभवके अनुसार बताइये और उसकी प्रवृत्तिका भी क्रमशः वर्णन कीजिये ।। ७९ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
सुसूक्ष्मं सत्त्वसंयुक्तं संयुक्तं त्रिभिरक्षरैः ।। ८० ।।
पुरुषः पुरुषं गच्छेन्निष्क्रियः पञ्चविंशकः ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**जो अत्यन्त सूक्ष्म, सत्त्वगुणसे संयुक्त तथा अकार, उकार और मकार—इन तीन अक्षरोंसे युक्त प्रणवस्वरूप है, उस परम पुरुष परमात्माको पचीसवाँ तत्त्वरूप पुरुष (जीवात्मा) कर्तृत्वके अहंकारसे शून्य होनेपर प्राप्त करता है ।। ८० १/२ ।।
एवमेकं सांख्ययोगं वेदारण्यकमेव च ।। ८१ ।।
परस्पराङ्गान्यतानि पाञ्चरात्रं च कथ्यते ।
एष एकान्तिनां धर्मो नारायणपरात्मकः ।। ८२ ।।
इस प्रकार आत्मा और अनात्माका विवेक करानेवाला सांख्य, चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपदेश देनेवाला योग, जीव और ब्रह्मके अभेदका बोध करानेवाला वेदोंका आरण्यकभाग (उपनिषद्) तथा भक्तिमार्गका प्रतिपादन करनेवाला पाञ्चरात्र आगम—ये सब शास्त्र एक लक्ष्यके साधक होनेके कारण एक बताये जाते हैं। ये सब एक-दूसरेके अंग हैं। सारे कर्मोंको भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंमें समर्पित कर देना यह एकान्त भक्तोंका धर्म है ।। ८१-८२ ।।
यथा समुद्रात् प्रसृता जलौघा-
स्तमेव राजन् पुनराविशन्ति ।
इमे तथा ज्ञानमहाजलौघा
नारायणं वै पुनराविशन्ति ।। ८३ ।।
राजन्! जैसे सारे जल-प्रवाह समुद्रसे ही प्रसारको प्राप्त होते हैं और फिर उस समुद्रमें ही आकर मिल जाते हैं, उसी प्रकार ज्ञानरूपी जलके महान् प्रवाह नारायणसे ही प्रकट होकर फिर उन्हींमें लीन हो जाते हैं ॥ ८३ ॥
एष ते कथितो धर्मः सात्वतः कुरुनन्दन ।
कुरुष्वैनं यथान्यायं यदि शक्तोऽसि भारत ॥ ८४ ॥
भरतभूषण! कुरुनन्दन! यह तुम्हें सात्वत-धर्मका परिचय दिया गया है। यदि तुमसे हो सके तो यथोचितरूपसे इस धर्मका पालन करो ॥ ८४ ॥
एवं हि स महाभागो नारदो गुरवे मम ।
श्वेतानां यतिनां चाह एकान्तगतिमव्ययाम् ॥ ८५ ॥
इस प्रकार महाभाग नारदजीने मेरे गुरु व्यासजीसे श्वेतवस्त्रधारी गृहस्थों और काषायवस्त्रधारी संन्यासियोंकी अविनश्वर एकान्त गतिका वर्णन किया है ॥ ८५ ॥
व्यासश्चाकथयत् प्रीत्या धर्मपुत्राय धीमते ।
स एवायं मया तुभ्यमाख्यातः प्रसृतो गुरोः ॥ ८६ ॥
व्यासजीने भी बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिरको प्रेमपूर्वक इस धर्मका उपदेश दिया। गुरुके मुखसे प्रकट हुए उसी धर्मका मैंने यहाँ तुम्हारे लिये वर्णन किया है ॥ ८६ ॥
इत्थं हि दुष्करो धर्म एष पार्थिवसत्तम ।
यथैव त्वं तथैवान्ये भवन्तीह विमोहिताः ॥ ८७ ॥
नृपश्रेष्ठ! इस तरह यह धर्म दुष्कर है। तुम्हारी तरह दूसरे लोग भी इसके विषयमें मोहित हो जाते हैं ॥ ८७ ॥
कृष्ण एव हि लोकानां भावनो मोहनस्तथा ।
संहारकारकश्चैव कारणं च विशांपते ॥ ८८ ॥
प्रजानाथ! भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण लोकोंके पालक, मोहक, संहारक तथा कारण हैं (अतः तुम उन्हींका भक्तिभावसे भजन करो)॥ ८८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
ऐकान्तिकभावेऽष्टचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमा एवं उनके प्रति ऐकान्तिकभावविषयक तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४८ ॥
व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा
एकोनपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा
जनमेजय उवाच
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदारण्यकमेव च ।
ज्ञानान्येतानि ब्रह्मर्षे लोकेषु प्रचरन्ति ह ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मर्षे! सांख्य, योग, पाञ्चरात्र और वेदोंके आरण्यकभाग—ये चार प्रकारके ज्ञान सम्पूर्ण लोकोंमें प्रचलित हैं ॥ १ ॥
किमेतान्येकनिष्ठानि पृथङ्निष्ठानि वा मुने ।
प्रब्रूहि वै मया पृष्टः प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् ॥ २ ॥
मुने! क्या ये सब एक ही लक्ष्यका बोध करानेवाले हैं अथवा पृथक्-पृथक् लक्ष्यके प्रतिपादक हैं? मेरे इस प्रश्नका आप यथावत् उत्तर दें और प्रवृत्तिका भी क्रमशः वर्णन करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
जज्ञे बहुज्ञं परमत्युदारं
यं द्वीपमध्ये सुतमात्मयोगात् ।
पराशरात् सत्यवती महर्षिं
तस्मै नमोऽज्ञानतमोनुदाय ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! देवी सत्यवतीने यमुनातटवर्ती द्वीपमें पराशर मुनिसे अपने शरीरका संयोग करके जिन बहुज्ञ और अत्यन्त उदार महर्षिको पुत्ररूपसे उत्पन्न किया था, अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेवाले ज्ञानसूर्यस्वरूप उन गुरुदेव व्यासजीको मेरा नमस्कार है ॥ ३ ॥
पितामहाद् यं प्रवदन्ति षष्ठं
महर्षिमार्षेयविभूतियुक्तम् ।
नारायणस्यांशजमेकपुत्रं
द्वैपायनं वेद महानिधानम् ॥ ४ ॥
ब्रह्माजीके आदिपुरुष जो नारायण हैं, उनके स्वरूपभूत जिन महर्षिको पूर्वपुरुष नारायणसे छठी पीढ़ीमें* उत्पन्न बताते हैं, जो ऋषियोंके सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं,
नारायणके अंशसे उत्पन्न हैं, अपने पिताके एक ही पुत्र हैं और द्वीपमें उत्पन्न होनेके कारण द्वैपायन कहलाते हैं, उन वेदके महान् भण्डाररूप व्यासजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥
तमादिकालेषु महाविभूति- र्नारायणो ब्रह्ममहानिधानम् । ससर्ज पुत्रार्थमुदारतेजा व्यासं महात्मानमजं पुराणम् ॥ ५ ॥
प्राचीनकालमें उदार तेजस्वी, महान् वैभवसम्पन्न भगवान् नारायणने वैदिक ज्ञानकी महानिधिरूप महात्मा अजन्मा और पुराणपुरुष व्यासजीको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्न किया था ॥ ५ ॥
जनमेजय उवाच
त्वयैव कथितं पूर्वं सम्भवे द्विजसत्तम । वसिष्ठस्य सुतः शक्तिः शक्तिपुत्रः पराशरः ॥ ६ ॥ पराशरस्य दायादः कृष्णद्वैपायनो मुनिः । भूयो नारायणसुतं त्वमेवैनं प्रभाषसे ॥ ७ ॥
**जनमेजयने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! आपहीने पहले आदिपर्वकी कथा सुनाते समय यह कहा था कि वसिष्ठके पुत्र शक्ति, शक्तिके पुत्र पराशर और पराशरके पुत्र मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हैं और अब पुनः आप इन्हें नारायणका पुत्र बतला रहे हैं ॥ ६-७ ॥
किमतः पूर्वजं जन्म व्यासस्यामिततेजसः । कथयस्वोत्तममते जन्म नारायणोद्भवम् ॥ ८ ॥
श्रेष्ठ बुद्धिवाले मुनीश्वर! क्या अमिततेजस्वी व्यासजीका इससे पहले भी कोई जन्म हुआ था? नारायणसे व्यासजीका जन्म कब और कैसे हुआ? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
वेदार्थान् वेत्तुकामस्य धर्मिष्ठस्य तपोनिधेः । गुरोर्मे ज्ञाननिष्ठस्य हिमवत्पाद आसतः ॥ ९ ॥ कृत्वा भारतमाख्यानं तपःश्रान्तस्य धीमतः । शुश्रूषां तत्परा राजन् कृतवन्तो वयं तदा ॥ १० ॥ सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः । अहं चतुर्थः शिष्यो वै शुकोव्यासात्मजस्तथा ॥ ११ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! मेरे धर्मिष्ठ गुरु वेदव्यास तपस्याकी निधि और ज्ञाननिष्ठ हैं। पहले वे वेदोंके अर्थका वास्तविक ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे हिमालयके एक शिखरपर रहते थे। ये महाभारत नामक इतिहासकी रचना करके तपस्या करते-करते थक
गये थे। उन दिनों इन बुद्धिमान् गुरुकी सेवामें तत्पर हम पाँच शिष्य उनके साथ रहते थे। सुमन्तु, जैमिनि, दृढ़तापूर्वक उत्तम धर्मका पालन करनेवाले पैल, चौथा मैं और पाँचवें व्यासपुत्र शुकदेव थे ॥ ९-११ ॥
एभिः परिवृतो व्यासः शिष्यैः पञ्चभिरुत्तमैः ।
शुशुभे हिमवत्पादे भूतैर्भूतपतिर्यथा ॥ १२ ॥
इन पाँच उत्तम शिष्योंसे घिरे हुए व्यासजी हिमालयके शिखरपर भूतोंसे परिवेष्टित भूतनाथ भगवान् शिवके समान शोभा पाते थे ॥ १२ ॥
वेदानावर्तयन् साङ्गान् भारतार्थांश्च सर्वशः ।
तमेकमनसं दान्तं युक्ता वयमुपास्महे ॥ १३ ॥
वहाँ व्यासजी अंगोंसहित सब वेदों तथा महाभारतके अर्थोंकी आवृत्ति करते और हम सब शिष्योंको पढ़ाते थे एवं हम सब लोग सदा उद्यत रहकर उन एकाग्रचित्त एवं जितेन्द्रिय गुरुकी सेवा करते थे ॥ १३ ॥
कथान्तरेऽथ कस्मिंश्चित् पृष्टोऽस्माभिर्द्विजोत्तमः ।
वेदार्थान् भारतार्थांश्च जन्म नारायणात् तथा ॥ १४ ॥
एक दिन किसी बातचीतके प्रसंगमें हमलोगोंने द्विजश्रेष्ठ व्यासजीसे वेदों और महाभारतका अर्थ तथा भगवान् नारायणसे उनके जन्म होनेका वृत्तान्त पूछा ॥ १४ ॥
स पूर्वमुक्त्वा वेदार्थान् भारतार्थांश्च तत्त्ववित् ।
नारायणादिदं जन्म व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १५ ॥
तत्त्वज्ञानी व्यासजीने पहले हमें वेदों और महाभारतका अर्थ बताया। उसके बाद भगवान् नारायणसे अपने जन्मका वृत्तान्त इस प्रकार बताना आरम्भ किया— ॥ १५ ॥
शृणुध्वमाख्यानवरमिदमार्षेयमुत्तमम् ।
आदिकालोद्भवं विप्रास्तपसाधिगतं मया ॥ १६ ॥
‘विप्रगण! ऋषिसम्बन्धी यह उत्तम आख्यान सुनो। प्राचीन कालका यह वृत्तान्त मैंने तपस्याके द्वारा जाना है ॥ १६ ॥
प्राप्ते प्रजाविसर्गे वै सप्तमे पद्मसंभवे ।
नारायणो महायोगी शुभाशुभविवर्जितः ॥ १७ ॥
ससृजे नाभितः पूर्वं ब्रह्माणममितप्रभः ।
ततः स प्रादुरभवदथैनं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८ ॥
‘जब सातवें कल्पके आरम्भमें सातवीं बार ब्रह्माजीके कमलसे जन्म-ग्रहण करनेका अवसर आया, तब शुभ और अशुभसे रहित अमिततेजस्वी महायोगी भगवान् नारायणने सबसे पहले अपने नाभिकमलसे ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। जब ब्रह्माजी प्रकट हो गये, तब उनसे भगवान्ने यह बात कही— ॥ १७-१८ ॥
मम त्वं नाभितो जातः प्रजासर्गकरः प्रभुः ।
सृज प्रजास्त्वं विविधा ब्रह्मन् सजडपण्डिताः ॥ १९ ॥ ‘ब्रह्मन्! तुम मेरी नाभिसे प्रजावर्गकी सृष्टि करनेके लिये उत्पन्न हुए हो और इस कार्यमें समर्थ हो; अतः जड-चेतनसहित नाना प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करो’ ॥ १९ ॥
स एवमुक्तो विमुखश्चिन्ताव्याकुलमानसः । प्रणम्य वरदं देवमुवाच हरिमीश्वरम् ॥ २० ॥ ‘भगवान्के इस प्रकार आदेश देनेपर ब्रह्माजीका मन चिन्तासे व्याकुल हो उठा। वे सृष्टिकार्यसे विमुख हो वरदायक देवता सर्वेश्वर श्रीहरिको प्रणाम करके इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥
का शक्तिर्मम देवेश प्रजाः स्रष्टुं नमोऽस्तु ते । अप्रज्ञावानहं देव विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ २१ ॥ “देवेश्वर! मुझमें प्रजाकी सृष्टि करनेकी क्या शक्ति है? आपको नमस्कार है। देव! मैं सृष्टिविषयक बुद्धिसे सर्वथा रहित हूँ—यह जानकर अब आपको जो उचित जान पड़े, वह कीजिये’ ॥ २१ ॥
स एवमुक्तो भगवान् भूत्वाथान्तर्हितस्ततः । चिन्तयामास देवेशो बुद्धिं बुद्धिमतां वरः ॥ २२ ॥ ‘ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देवेश्वर भगवान् विष्णुने अदृश्य होकर बुद्धिका चिन्तन किया ॥ २२ ॥
स्वरूपिणी ततो बुद्धिरुपतस्थे हरिं प्रभुम् । योगेन चैनां नियोगः स्वयं नियुयुजे तदा ॥ २३ ॥ ‘उनके चिन्तन करते ही मूर्तिमती बुद्धि उन सामर्थ्यशाली श्रीहरिकी सेवामें उपस्थित हो गयी। तदनन्तर जिनपर दूसरोंका वश नहीं चलता, उन भगवान् नारायणने स्वयं ही उस बुद्धिको उस समय योगशक्तिसे सम्पन्न कर दिया ॥ २३ ॥
स तामैश्वर्ययोगस्थां बुद्धिं गतिमतीं सतीम् । उवाच वचनं देवो बुद्धिं वै प्रभुरव्ययः ॥ २४ ॥ ‘अविनाशी प्रभु नारायणदेवने ऐश्वर्ययोगमें स्थित हुई उस सती-साध्वी प्रगतिशील बुद्धिसे कहा— ॥ २४ ॥
ब्रह्माणं प्रविशस्वेति लोकसृष्ट्यर्थसिद्धये । ततस्तमीश्वरादिष्टा बुद्धिः क्षिप्रं विवेश सा ॥ २५ ॥ “तुम संसारकी सृष्टिरूप अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये ब्रह्माजीके भीतर प्रवेश करो।’ ईश्वरका यह आदेश पाकर बुद्धि शीघ्र ही ब्रह्माजीमें प्रवेश कर गयी ॥
अथैनं बुद्धिसंयुक्तं पुनः स ददृशे हरिः । भूयश्चैव वचः प्राह सृजेमा विविधाः प्रजाः ॥ २६ ॥
'जब ब्रह्माजी सृष्टिविषयक बुद्धिसे संयुक्त हो गये, तब श्रीहरिने पुनः उनकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा और फिर इस प्रकार कहा—'अब तुम इन नाना प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करो' ॥ २६ ॥
बाढमित्येव कृत्वासौ यथाऽऽज्ञां शिरसा हरेः ।
एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २७ ॥
'तब 'बहुत अच्छा' कहकर उन्होंने श्रीहरिकी आज्ञा शिरोधार्य की। इस प्रकार उन्हें सृष्टिका आदेश देकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २७ ॥
प्राप चैनं मुहूर्तेन संस्थानं देवसंज्ञितम् ।
तां चैव प्रकृतिं प्राप्य एकीभावगतोऽभवत् ॥ २८ ॥
'वे एक ही मुहूर्तमें अपने देवधाममें जा पहुँचे और अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो उसके साथ एकीभूत हो गये ॥ २८ ॥
अथास्य बुद्धिरभवत् पुनरन्या तदा किल ।
सृष्टाः प्रजा इमाः सर्वा ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥ २९ ॥
'तदनन्तर कुछ कालके बाद भगवान्के मनमें फिर दूसरा विचार उठा। वे सोचने लगे, परमेष्ठी ब्रह्माने इन समस्त प्रजाओंकी सृष्टि तो कर दी ॥ २९ ॥
दैत्यदानवगन्धर्वरक्षोगणसमाकुला ।
जाता हीयं वसुमती भाराक्रान्ता तपस्विनी ॥ ३० ॥
'किंतु दैत्य, दानव, गन्धर्व और राक्षसोंसे व्याप्त हुई यह तपस्विनी पृथ्वी भारसे पीड़ित हो गयी है ॥
बहवो बलिनः पृथ्व्यां दैत्यदानवराक्षसाः ।
भविष्यन्ति तपोयुक्ता वरान् प्राप्स्यन्ति चोत्तमान् ॥ ३१ ॥
'इस पृथ्वीपर बहुत-से ऐसे बलवान् दैत्य, दानव और राक्षस होंगे, जो तपस्यामें प्रवृत्त हो उत्तमोत्तम वर प्राप्त करेंगे ॥ ३१ ॥
अवश्यमेव तैः सर्वैर्वरदानेन दर्पितैः ।
बाधितव्याः सुरगणा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ३२ ॥
'वरदानसे घमंडमें आकर वे समस्त दानव निश्चय ही देवसमूहों तथा तपोधन ऋषियोंको बाधा पहुँचायेंगे ॥ ३२ ॥
तत्र न्याय्यमिदं कर्तुं भारावतरणं मया ।
अथ नानासमुद्भूतैर्वसुधायां यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
'अतः अब मुझे पृथ्वीपर क्रमशः नाना अवतार धारण करके इसके भारको उतारना उचित होगा ॥ ३३ ॥
निग्रहेण च पापानां साधूनां प्रग्रहेण च ।
इयं तपस्विनी सत्या धारयिष्यति मेदिनी ॥ ३४ ॥
‘पापियोंको दण्ड देने और साधु पुरुषोंपर अनुग्रह करनेसे यह तपस्विनी सत्यस्वरूपा पृथ्वी बलसे टिकी रह सकेगी ॥ ३४ ॥
मया ह्येषा हि ध्रियते पातालस्थेन भोगिना ।
मया धृता धारयति जगद् विश्वं चराचरम् ॥ ३५ ॥
‘मैं पातालमें शेषनागके रूपसे रहकर इस पृथ्वीको धारण करता हूँ और मेरेद्वारा धारित होकर यह सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती है ॥ ३५ ॥
तस्मात् पृथ्व्याः परित्राणं करिष्ये सम्भवं गतः ।
एवं स चिन्तयित्वा तु भगवान् मधुसूदनः ॥ ३६ ॥
रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावे भवाय सः ।
वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥ ३७ ॥
एभिर्मया निहन्तव्या दुर्विनीताः सुरारयः ।
‘इसलिये मैं अवतार लेकर इस पृथ्वीकी रक्षा अवश्य करूँगा। ऐसा सोच-विचारकर भगवान् मधुसूदनने जगत्के लिये अवतार ग्रहण करनेके निमित्त अपने अनेक रूपोंकी सृष्टि की अर्थात् वाराह, नरसिंह, वामन एवं मनुष्यरूपोंका स्मरण किया। उन्होंने यह निश्चय किया था कि मुझे इन अवतारोंद्वारा उद्दण्ड दैत्योंका वध करना है ॥ ३६-३७ १/२ ॥
अथ भूयो जगत्स्रष्टा भोःशब्देनानुनादयन् ॥ ३८ ॥
सरस्वतीमुच्चचार तत्र सारस्वतोऽभवत् ।
अपान्तरतमा नाम सुतो वाक्सम्भवः प्रभुः ॥ ३९ ॥
‘तदनन्तर जगत्स्रष्टा श्रीहरिने ‘भोः' शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए सरस्वती (वाणी) का उच्चारण किया। इससे वहाँ सारस्वतका आविर्भाव हुआ। सरस्वती या वाणीसे उत्पन्न हुए उस शक्तिशाली पुत्रका नाम ‘अपान्तरतमा' हुआ ॥ ३८-३९ ॥
भूतभव्यभविष्यज्ञः सत्यवादी दृढव्रतः ।
तमुवाच नतं मूर्ध्ना देवानामादिरव्ययः ॥ ४० ॥
‘वे अपान्तरतमा भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता, सत्यवादी तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले थे। मस्तक झुकाकर खड़े हुए उस पुत्रसे देवताओंके आदिकारण अविनाशी श्रीहरिने कहा— ॥ ४० ॥
वेदाख्याने श्रुतिः कार्या त्वया मतिमतां वर ।
तस्मात् कुरु यथाऽऽज्ञप्तं ममैतद् वचनं मुने ॥ ४१ ॥
‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ मुने! तुम्हें वेदोंकी व्याख्याके लिये ऋक्, साम, यजुष् आदि श्रुतियोंका पृथक्-पृथक् संग्रह करना चाहिये। अतः तुम मेरी आज्ञाके अनुसार कार्य करो। मुझे तुमसे इतना ही कहना है’ ॥ ४१ ॥
तेन भिन्नास्तदा वेदा मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे ।
ततस्तुतोष भगवान् हरिस्तेनास्य कर्मणा ॥ ४२ ॥