भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2396

'जब ब्रह्माजी सृष्टिविषयक बुद्धिसे संयुक्त हो गये, तब श्रीहरिने पुनः उनकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा और फिर इस प्रकार कहा—'अब तुम इन नाना प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करो' ॥ २६ ॥
बाढमित्येव कृत्वासौ यथाऽऽज्ञां शिरसा हरेः ।
एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २७ ॥
'तब 'बहुत अच्छा' कहकर उन्होंने श्रीहरिकी आज्ञा शिरोधार्य की। इस प्रकार उन्हें सृष्टिका आदेश देकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २७ ॥
प्राप चैनं मुहूर्तेन संस्थानं देवसंज्ञितम् ।
तां चैव प्रकृतिं प्राप्य एकीभावगतोऽभवत् ॥ २८ ॥
'वे एक ही मुहूर्तमें अपने देवधाममें जा पहुँचे और अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो उसके साथ एकीभूत हो गये ॥ २८ ॥
अथास्य बुद्धिरभवत् पुनरन्या तदा किल ।
सृष्टाः प्रजा इमाः सर्वा ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥ २९ ॥
'तदनन्तर कुछ कालके बाद भगवान्‌के मनमें फिर दूसरा विचार उठा। वे सोचने लगे, परमेष्ठी ब्रह्माने इन समस्त प्रजाओंकी सृष्टि तो कर दी ॥ २९ ॥
दैत्यदानवगन्धर्वरक्षोगणसमाकुला ।
जाता हीयं वसुमती भाराक्रान्ता तपस्विनी ॥ ३० ॥
'किंतु दैत्य, दानव, गन्धर्व और राक्षसोंसे व्याप्त हुई यह तपस्विनी पृथ्वी भारसे पीड़ित हो गयी है ॥
बहवो बलिनः पृथ्व्यां दैत्यदानवराक्षसाः ।
भविष्यन्ति तपोयुक्ता वरान् प्राप्स्यन्ति चोत्तमान् ॥ ३१ ॥
'इस पृथ्वीपर बहुत-से ऐसे बलवान् दैत्य, दानव और राक्षस होंगे, जो तपस्यामें प्रवृत्त हो उत्तमोत्तम वर प्राप्त करेंगे ॥ ३१ ॥
अवश्यमेव तैः सर्वैर्वरदानेन दर्पितैः ।
बाधितव्याः सुरगणा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ३२ ॥
'वरदानसे घमंडमें आकर वे समस्त दानव निश्चय ही देवसमूहों तथा तपोधन ऋषियोंको बाधा पहुँचायेंगे ॥ ३२ ॥
तत्र न्याय्यमिदं कर्तुं भारावतरणं मया ।
अथ नानासमुद्भूतैर्वसुधायां यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
'अतः अब मुझे पृथ्वीपर क्रमशः नाना अवतार धारण करके इसके भारको उतारना उचित होगा ॥ ३३ ॥
निग्रहेण च पापानां साधूनां प्रग्रहेण च ।
इयं तपस्विनी सत्या धारयिष्यति मेदिनी ॥ ३४ ॥