महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2395, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसृज प्रजास्त्वं विविधा ब्रह्मन् सजडपण्डिताः ॥ १९ ॥ ‘ब्रह्मन्! तुम मेरी नाभिसे प्रजावर्गकी सृष्टि करनेके लिये उत्पन्न हुए हो और इस कार्यमें समर्थ हो; अतः जड-चेतनसहित नाना प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करो’ ॥ १९ ॥
स एवमुक्तो विमुखश्चिन्ताव्याकुलमानसः । प्रणम्य वरदं देवमुवाच हरिमीश्वरम् ॥ २० ॥ ‘भगवान्के इस प्रकार आदेश देनेपर ब्रह्माजीका मन चिन्तासे व्याकुल हो उठा। वे सृष्टिकार्यसे विमुख हो वरदायक देवता सर्वेश्वर श्रीहरिको प्रणाम करके इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥
का शक्तिर्मम देवेश प्रजाः स्रष्टुं नमोऽस्तु ते । अप्रज्ञावानहं देव विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ २१ ॥ “देवेश्वर! मुझमें प्रजाकी सृष्टि करनेकी क्या शक्ति है? आपको नमस्कार है। देव! मैं सृष्टिविषयक बुद्धिसे सर्वथा रहित हूँ—यह जानकर अब आपको जो उचित जान पड़े, वह कीजिये’ ॥ २१ ॥
स एवमुक्तो भगवान् भूत्वाथान्तर्हितस्ततः । चिन्तयामास देवेशो बुद्धिं बुद्धिमतां वरः ॥ २२ ॥ ‘ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देवेश्वर भगवान् विष्णुने अदृश्य होकर बुद्धिका चिन्तन किया ॥ २२ ॥
स्वरूपिणी ततो बुद्धिरुपतस्थे हरिं प्रभुम् । योगेन चैनां नियोगः स्वयं नियुयुजे तदा ॥ २३ ॥ ‘उनके चिन्तन करते ही मूर्तिमती बुद्धि उन सामर्थ्यशाली श्रीहरिकी सेवामें उपस्थित हो गयी। तदनन्तर जिनपर दूसरोंका वश नहीं चलता, उन भगवान् नारायणने स्वयं ही उस बुद्धिको उस समय योगशक्तिसे सम्पन्न कर दिया ॥ २३ ॥
स तामैश्वर्ययोगस्थां बुद्धिं गतिमतीं सतीम् । उवाच वचनं देवो बुद्धिं वै प्रभुरव्ययः ॥ २४ ॥ ‘अविनाशी प्रभु नारायणदेवने ऐश्वर्ययोगमें स्थित हुई उस सती-साध्वी प्रगतिशील बुद्धिसे कहा— ॥ २४ ॥
ब्रह्माणं प्रविशस्वेति लोकसृष्ट्यर्थसिद्धये । ततस्तमीश्वरादिष्टा बुद्धिः क्षिप्रं विवेश सा ॥ २५ ॥ “तुम संसारकी सृष्टिरूप अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये ब्रह्माजीके भीतर प्रवेश करो।’ ईश्वरका यह आदेश पाकर बुद्धि शीघ्र ही ब्रह्माजीमें प्रवेश कर गयी ॥
अथैनं बुद्धिसंयुक्तं पुनः स ददृशे हरिः । भूयश्चैव वचः प्राह सृजेमा विविधाः प्रजाः ॥ २६ ॥