भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2394

गये थे। उन दिनों इन बुद्धिमान् गुरुकी सेवामें तत्पर हम पाँच शिष्य उनके साथ रहते थे। सुमन्तु, जैमिनि, दृढ़तापूर्वक उत्तम धर्मका पालन करनेवाले पैल, चौथा मैं और पाँचवें व्यासपुत्र शुकदेव थे ॥ ९-११ ॥

एभिः परिवृतो व्यासः शिष्यैः पञ्चभिरुत्तमैः ।
शुशुभे हिमवत्पादे भूतैर्भूतपतिर्यथा ॥ १२ ॥
इन पाँच उत्तम शिष्योंसे घिरे हुए व्यासजी हिमालयके शिखरपर भूतोंसे परिवेष्टित भूतनाथ भगवान् शिवके समान शोभा पाते थे ॥ १२ ॥

वेदानावर्तयन् साङ्गान् भारतार्थांश्च सर्वशः ।
तमेकमनसं दान्तं युक्ता वयमुपास्महे ॥ १३ ॥
वहाँ व्यासजी अंगोंसहित सब वेदों तथा महाभारतके अर्थोंकी आवृत्ति करते और हम सब शिष्योंको पढ़ाते थे एवं हम सब लोग सदा उद्यत रहकर उन एकाग्रचित्त एवं जितेन्द्रिय गुरुकी सेवा करते थे ॥ १३ ॥

कथान्तरेऽथ कस्मिंश्चित् पृष्टोऽस्माभिर्द्विजोत्तमः ।
वेदार्थान् भारतार्थांश्च जन्म नारायणात् तथा ॥ १४ ॥
एक दिन किसी बातचीतके प्रसंगमें हमलोगोंने द्विजश्रेष्ठ व्यासजीसे वेदों और महाभारतका अर्थ तथा भगवान् नारायणसे उनके जन्म होनेका वृत्तान्त पूछा ॥ १४ ॥

स पूर्वमुक्त्वा वेदार्थान् भारतार्थांश्च तत्त्ववित् ।
नारायणादिदं जन्म व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १५ ॥
तत्त्वज्ञानी व्यासजीने पहले हमें वेदों और महाभारतका अर्थ बताया। उसके बाद भगवान् नारायणसे अपने जन्मका वृत्तान्त इस प्रकार बताना आरम्भ किया— ॥ १५ ॥

शृणुध्वमाख्यानवरमिदमार्षेयमुत्तमम् ।
आदिकालोद्भवं विप्रास्तपसाधिगतं मया ॥ १६ ॥
‘विप्रगण! ऋषिसम्बन्धी यह उत्तम आख्यान सुनो। प्राचीन कालका यह वृत्तान्त मैंने तपस्याके द्वारा जाना है ॥ १६ ॥

प्राप्ते प्रजाविसर्गे वै सप्तमे पद्मसंभवे ।
नारायणो महायोगी शुभाशुभविवर्जितः ॥ १७ ॥
ससृजे नाभितः पूर्वं ब्रह्माणममितप्रभः ।
ततः स प्रादुरभवदथैनं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८ ॥
‘जब सातवें कल्पके आरम्भमें सातवीं बार ब्रह्माजीके कमलसे जन्म-ग्रहण करनेका अवसर आया, तब शुभ और अशुभसे रहित अमिततेजस्वी महायोगी भगवान् नारायणने सबसे पहले अपने नाभिकमलसे ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। जब ब्रह्माजी प्रकट हो गये, तब उनसे भगवान्‌ने यह बात कही— ॥ १७-१८ ॥

मम त्वं नाभितो जातः प्रजासर्गकरः प्रभुः ।