भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2393

नारायणके अंशसे उत्पन्न हैं, अपने पिताके एक ही पुत्र हैं और द्वीपमें उत्पन्न होनेके कारण द्वैपायन कहलाते हैं, उन वेदके महान् भण्डाररूप व्यासजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥

तमादिकालेषु महाविभूति- र्नारायणो ब्रह्ममहानिधानम् । ससर्ज पुत्रार्थमुदारतेजा व्यासं महात्मानमजं पुराणम् ॥ ५ ॥

प्राचीनकालमें उदार तेजस्वी, महान् वैभवसम्पन्न भगवान् नारायणने वैदिक ज्ञानकी महानिधिरूप महात्मा अजन्मा और पुराणपुरुष व्यासजीको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्न किया था ॥ ५ ॥

जनमेजय उवाच

त्वयैव कथितं पूर्वं सम्भवे द्विजसत्तम । वसिष्ठस्य सुतः शक्तिः शक्तिपुत्रः पराशरः ॥ ६ ॥ पराशरस्य दायादः कृष्णद्वैपायनो मुनिः । भूयो नारायणसुतं त्वमेवैनं प्रभाषसे ॥ ७ ॥

**जनमेजयने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! आपहीने पहले आदिपर्वकी कथा सुनाते समय यह कहा था कि वसिष्ठके पुत्र शक्ति, शक्तिके पुत्र पराशर और पराशरके पुत्र मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हैं और अब पुनः आप इन्हें नारायणका पुत्र बतला रहे हैं ॥ ६-७ ॥

किमतः पूर्वजं जन्म व्यासस्यामिततेजसः । कथयस्वोत्तममते जन्म नारायणोद्भवम् ॥ ८ ॥

श्रेष्ठ बुद्धिवाले मुनीश्वर! क्या अमिततेजस्वी व्यासजीका इससे पहले भी कोई जन्म हुआ था? नारायणसे व्यासजीका जन्म कब और कैसे हुआ? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

वेदार्थान् वेत्तुकामस्य धर्मिष्ठस्य तपोनिधेः । गुरोर्मे ज्ञाननिष्ठस्य हिमवत्पाद आसतः ॥ ९ ॥ कृत्वा भारतमाख्यानं तपःश्रान्तस्य धीमतः । शुश्रूषां तत्परा राजन् कृतवन्तो वयं तदा ॥ १० ॥ सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः । अहं चतुर्थः शिष्यो वै शुकोव्यासात्मजस्तथा ॥ ११ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! मेरे धर्मिष्ठ गुरु वेदव्यास तपस्याकी निधि और ज्ञाननिष्ठ हैं। पहले वे वेदोंके अर्थका वास्तविक ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे हिमालयके एक शिखरपर रहते थे। ये महाभारत नामक इतिहासकी रचना करके तपस्या करते-करते थक