भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2397, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2397

‘पापियोंको दण्ड देने और साधु पुरुषोंपर अनुग्रह करनेसे यह तपस्विनी सत्यस्वरूपा पृथ्वी बलसे टिकी रह सकेगी ॥ ३४ ॥
मया ह्येषा हि ध्रियते पातालस्थेन भोगिना ।
मया धृता धारयति जगद् विश्वं चराचरम् ॥ ३५ ॥
‘मैं पातालमें शेषनागके रूपसे रहकर इस पृथ्वीको धारण करता हूँ और मेरेद्वारा धारित होकर यह सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को धारण करती है ॥ ३५ ॥
तस्मात् पृथ्व्याः परित्राणं करिष्ये सम्भवं गतः ।
एवं स चिन्तयित्वा तु भगवान् मधुसूदनः ॥ ३६ ॥
रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावे भवाय सः ।
वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥ ३७ ॥
एभिर्मया निहन्तव्या दुर्विनीताः सुरारयः ।
‘इसलिये मैं अवतार लेकर इस पृथ्वीकी रक्षा अवश्य करूँगा। ऐसा सोच-विचारकर भगवान् मधुसूदनने जगत्‌के लिये अवतार ग्रहण करनेके निमित्त अपने अनेक रूपोंकी सृष्टि की अर्थात् वाराह, नरसिंह, वामन एवं मनुष्यरूपोंका स्मरण किया। उन्होंने यह निश्चय किया था कि मुझे इन अवतारोंद्वारा उद्दण्ड दैत्योंका वध करना है ॥ ३६-३७ १/२ ॥
अथ भूयो जगत्स्रष्टा भोःशब्देनानुनादयन् ॥ ३८ ॥
सरस्वतीमुच्चचार तत्र सारस्वतोऽभवत् ।
अपान्तरतमा नाम सुतो वाक्सम्भवः प्रभुः ॥ ३९ ॥
‘तदनन्तर जगत्स्रष्टा श्रीहरिने ‘भोः' शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए सरस्वती (वाणी) का उच्चारण किया। इससे वहाँ सारस्वतका आविर्भाव हुआ। सरस्वती या वाणीसे उत्पन्न हुए उस शक्तिशाली पुत्रका नाम ‘अपान्तरतमा' हुआ ॥ ३८-३९ ॥
भूतभव्यभविष्यज्ञः सत्यवादी दृढव्रतः ।
तमुवाच नतं मूर्ध्ना देवानामादिरव्ययः ॥ ४० ॥
‘वे अपान्तरतमा भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता, सत्यवादी तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले थे। मस्तक झुकाकर खड़े हुए उस पुत्रसे देवताओंके आदिकारण अविनाशी श्रीहरिने कहा— ॥ ४० ॥
वेदाख्याने श्रुतिः कार्या त्वया मतिमतां वर ।
तस्मात् कुरु यथाऽऽज्ञप्तं ममैतद् वचनं मुने ॥ ४१ ॥
‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ मुने! तुम्हें वेदोंकी व्याख्याके लिये ऋक्, साम, यजुष् आदि श्रुतियोंका पृथक्-पृथक् संग्रह करना चाहिये। अतः तुम मेरी आज्ञाके अनुसार कार्य करो। मुझे तुमसे इतना ही कहना है’ ॥ ४१ ॥
तेन भिन्नास्तदा वेदा मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे ।
ततस्तुतोष भगवान् हरिस्तेनास्य कर्मणा ॥ ४२ ॥