महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2398, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतपसा च सुतप्तेन यमेन नियमेन च । मन्वन्तरेषु पुत्रत्वमेवमेव प्रवर्तकः ॥ ४३ ॥ ‘अपान्तरतमाने स्वायम्भुव मन्वन्तरमें भगवान्की आज्ञाके अनुसार वेदोंका विभाग किया। उनके इस कर्मसे तथा उनके द्वारा की हुई उत्तम तपस्या, यम और नियमसे भी भगवान् श्रीहरि बहुत संतुष्ट हुए और बोले—‘बेटा! तुम सभी मन्वन्तरोंमें इसी प्रकार धर्मके प्रवर्तक होओगे’ ।। भविष्यस्यचलो ब्रह्मन्नप्रधृष्यश्च नित्यशः । पुनस्तिष्ये च सम्प्राप्ते कुरवो नाम भारताः ॥ ४४ ॥ भविष्यन्ति महात्मानो राजानः प्रथिता भुवि । ‘ब्रह्मन्! तुम सदा ही अविचल एवं अजेय बने रहोगे। फिर द्वापर और कलियुगकी संधिका समय आनेपर भरतवंशमें कुरुवंशी क्षत्रिय होंगे। वे महामनस्वी राजा समस्त भूमण्डलमें विख्यात होंगे ।। तेषां त्वत्तः प्रसूतानां कुलभेदो भविष्यति ॥ ४५ ॥ परस्परविनाशार्थं त्वामृते द्विजसत्तम । ‘द्विजश्रेष्ठ! उनमेंसे जो लोग तुम्हारी संतानोंके वंशज होंगे, उनमें परस्पर विनाशके लिये फूट हो जायगी। तुम्हारे सहयोगके बिना उनमें विग्रह होगा ।। ४५ १/२ ।। तत्राप्यनेकधा वेदान् भेत्स्यसे तपसान्वितः ॥ ४६ ॥ कृष्णे युगे च सम्प्राप्ते कृष्णवर्णो भविष्यसि । ‘उस समय भी तुम तपोबलसे सम्पन्न हो वेदोंके अनेक विभाग करोगे। उस समय कलियुग आ जानेपर तुम्हारे शरीरका वर्ण काला होगा ।। ४६ १/२ ।। धर्माणां विविधानां च कर्ता ज्ञानकरस्तथा । भविष्यसि तपोयुक्तो न च रागाद् विमोक्ष्यसे ॥ ४७ ॥ ‘तुम नाना प्रकारके धर्मोंके प्रवर्तक, ज्ञानदाता और तपस्वी होओगे, परंतु रागसे सर्वथा मुक्त नहीं रहोगे ।। ४७ ।। वीतरागश्च पुत्रस्ते परमात्मा भविष्यति । महेश्वरप्रसादेन नैतद् वचनमन्यथा ॥ ४८ ॥ ‘तुम्हारा पुत्र भगवान् महेश्वरकी कृपासे वीतराग होकर परमात्मस्वरूप हो जायगा। मेरी यह बात टल नहीं सकती ।। ४८ ।। यं मानसं वै प्रवदन्ति विप्राः पितामहस्योत्तमबुद्धियुक्तम् । वसिष्ठमग्र्यं च तपोनिधानं यस्यातिसूर्यं व्यतिरिच्यते भाः ॥ ४९ ॥ तस्यान्वये चापि ततो महर्षिः