भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2399

पराशरो नाम महाप्रभावः । पिता स ते वेदनिधिर्वरिष्ठो महातपा वै तपसो निवासः ॥ ५० ॥ 'जिन्हें ब्राह्मणलोग ब्रह्माजीका मानसपुत्र कहते हैं, जो उत्तम बुद्धिसे युक्त, तपस्याकी निधि एवं सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिके नामसे प्रसिद्ध हैं और जिनका तेज भगवान् सूर्यसे भी बढ़कर प्रकाशित होता है, उन्हीं ब्रह्मर्षि वसिष्ठके वंशमें पराशर नामवाले महान् प्रभावशाली महर्षि होंगे। वे वैदिक ज्ञानके भण्डार, मुनियोंमें श्रेष्ठ, महान् तपस्वी एवं तपस्याके आवासस्थान होंगे। वे ही पराशर मुनि उस समय तुम्हारे पिता होंगे ॥ ४९-५० ॥ कानीनगर्भः पितृकन्यकायां तस्मादृषेस्त्वं भविता च पुत्रः ॥ ५१ ॥ 'उन्हीं ऋषिसे तुम पिताके घरमें रहनेवाली एक कुमारी कन्याके पुत्ररूपसे जन्म लोगे और कानीनगर्भ (कन्याकी संतान) कहलाओगे ॥ ५१ ॥ भूतभव्यभविष्याणां छिन्नसर्वार्थसंशयः । ये ह्यतिक्रान्तकाः पूर्वं सहस्रयुगपर्ययाः ॥ ५२ ॥ तांश्च सर्वान् मयोद्दिष्टान् द्रक्ष्यसे तपसान्वितः । पुनर्द्रक्ष्यसि चानेकसहस्रयुगपर्ययान् ॥ ५३ ॥ 'भूत, वर्तमान और भविष्यके सभी विषयोंमें तुम्हारा संशय नष्ट हो जायगा। पहले जो सहस्र-युगोंके कल्प व्यतीत हो चुके हैं, उन सबको मेरी आज्ञासे तुम देख सकोगे और तपोबलसे सम्पन्न बने रहोगे। भविष्यमें होनेवाले अनेक कल्प भी तुम्हें दृष्टिगोचर होंगे ॥ ५२-५३ ॥ अनादिनिधनं लोके चक्रहस्तं च मां मुने । अनुध्यानान्मम मुने नैतद् वचनमन्यथा ॥ ५४ ॥ “मुने! तुम निरन्तर मेरा चिन्तन करनेसे जगत्में मुझ अनादि और अनन्त परमेश्वरको चक्र हाथमें लिये देखोगे। मेरी यह बात कभी मिथ्या नहीं होगी ॥ ५४ ॥ भविष्यति महासत्त्व ख्यातिश्चाप्यतुला तव । शनैश्चरः सूर्यपुत्रो भविष्यति मनुर्महान् ॥ ५५ ॥ तस्मिन्मन्वन्तरे चैव मन्वादिगणपूर्वकः । त्वमेव भविता वत्स मत्प्रसादान्न संशयः ॥ ५६ ॥ “महान् शक्तिशाली मुनीश्वर! जगत्में तुम्हारी अनुपम ख्याति होगी। वत्स! जब सूर्यपुत्र शनैश्चर मन्वन्तरके प्रवर्तक हो महामनुके पदपर प्रतिष्ठित होंगे, उस मन्वन्तरमें तुम्हीं मेरे कृपाप्रसादसे मन्वादि गणोंमें प्रधान होओगे। इसमें संशय नहीं है ॥ ५५-५६ ॥ यत्किंचिद् विद्यते लोके सर्वं तन्मद्विचेष्टितम् । अन्यो ह्यन्यं चिन्तयति स्वच्छन्दं विदधाम्यहम् ॥ ५७ ॥