महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“संसारमें जो कुछ हो रहा है, वह सब मेरी ही चेष्टाका फल है। दूसरे लोग दूसरी-दूसरी बातें सोचते रहते हैं, परंतु मैं स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार कार्य करता हूँ' ॥ ५७ ॥
एवं सारस्वतमृषिमपान्तरतमं तथा ।
उक्त्वा वचनमीशानः साधयस्वेत्यथाब्रवीत् ॥ ५८ ॥
'सरस्वती-पुत्र अपान्तरतम मुनिसे ऐसा कहकर भगवान् उन्हें विदा करते हुए बोले—'जाओ, अपना काम करो' ॥ ५८ ॥
सोऽहं तस्य प्रसादेन देवस्य हरिमेधसः ।
अपान्तरतमा नाम ततो जातोऽऽज्ञया हरेः ।
पुनश्च जातो विख्यातो वसिष्ठकुलनन्दनः ॥ ५९ ॥
'इस प्रकार मैं भगवान् विष्णुके कृपा-प्रसादसे पहले अपान्तरतमा नामसे उत्पन्न हुआ था और अब उन्हीं श्रीहरिकी आज्ञासे पुनः वसिष्ठकुलनन्दन व्यासके नामसे उत्पन्न होकर प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ हूँ ॥ ५९ ॥
तदेतत् कथितं जन्म मया पूर्वकमात्मनः ।
नारायणप्रसादेन तथा नारायणांशजम् ॥ ६० ॥
'नारायणकी कृपासे और उन्हींके अंशसे जो पहले मेरा जन्म हुआ था, उसका यह वृत्तान्त मैंने तुम सब लोगोंसे कहा है ॥ ६० ॥
मया हि सुमहत् तप्तं तपः परमदारुणम् ।
पुरा मतिमतां श्रेष्ठाः परमेण समाधिना ॥ ६१ ॥
'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शिष्यगण! पूर्वकालमें मैंने उत्तम समाधिके द्वारा अत्यन्त कठोर एवं बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ ६१ ॥
एतद् वः कथितं सर्वं यन्मां पृच्छत पुत्रकाः ।
पूर्वजन्म भविष्यं च भक्तानां स्नेहतो मया ॥ ६२ ॥
'पुत्रो! तुमलोग मुझसे जो कुछ पूछते थे, वह सब मैंने तुम्हें कह सुनाया। तुम गुरुभक्त शिष्योंके स्नेहवश ही मैंने यह अपने पूर्वजन्म और भविष्यका वृत्तान्त तुम्हें बताया है' ॥ ६२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एष ते कथितः पूर्वं सम्भवोऽस्मद्गुरोर्नृप ।
व्यासस्याक्लिष्टमनसो यथा पृष्टः पुनः शृणु ॥ ६३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरेश्वर! तुमने जैसा मुझसे प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने पहले क्लेशरहित चित्तवाले अपने गुरु व्यासजीके जन्मका वृत्तान्त कहा है। अब दूसरी बातें सुनो ॥ ६३ ॥