महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2385, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंनासिक्ये जन्मनि पुरा ब्रह्मणः पार्थिवोत्तम । धर्ममेतं स्वयं देवो हरिनारायणः प्रभुः ॥ ३९ ॥ तज्जगादारविन्दाक्षो ब्रह्मणः पश्यतस्तदा । नृपश्रेष्ठ! फिर पूर्वकालमें ब्रह्माजीने नासिकाके द्वारा जब पाँचवाँ जन्म ग्रहण किया, तब स्वयं कमलनयन भगवान् नारायण हरिने ब्रह्माजीके सामने इस धर्मका उपदेश दिया ॥ ३९ १/२ ॥
सनत्कुमारो भगवांस्ततः प्राधीतवान् नृप ॥ ४० ॥ सनत्कुमारादपि च वीरणो वै प्रजापतिः । कृतादौ कुरुशार्दूल धर्ममेतदधीतवान् ॥ ४१ ॥ नरेश्वर! तत्पश्चात् भगवान् सनत्कुमारने उनसे उस सात्वत-धर्मका उपदेश ग्रहण किया। कुरुश्रेष्ठ! सनत्कुमारसे वीरण प्रजापतिने कृतयुगके आदिमें इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया ॥ ४०-४१ ॥
वीरणश्चाप्यधीत्यैनं रैभ्याय मुनये ददौ । रैभ्यः पुत्राय शुद्धाय सुव्रताय सुमेधसे ॥ ४२ ॥ कुक्षिनाम्ने स प्रददौ दिशां पालाय धर्मिणे । ततोऽप्यन्तर्दधे भूयो नारायणमुखोद्भवः ॥ ४३ ॥ वीरणने इसका अध्ययन करके रैभ्यमुनिको उपदेश दिया। रैभ्यने उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ बुद्धिसे युक्त धर्मात्मा एवं शुद्ध आचार-विचारवाले अपने पुत्र दिक्पाल कुक्षिको इसका उपदेश दिया। तदनन्तर नारायणके मुखसे निकला हुआ यह सात्वत धर्म फिर लुप्त हो गया ॥ ४२-४३ ॥
अण्डजे जन्मनि पुनर्ब्रह्मणे हरियोनये । एष धर्मः समुद्भूतो नारायणमुखात् पुनः ॥ ४४ ॥ इसके बाद जब ब्रह्माजीका अण्डसे छठा जन्म हुआ, तब भगवान्से उत्पन्न हुए ब्रह्माजीके लिये पुनः भगवान् नारायणके मुखसे यह धर्म प्रकट हुआ ॥ ४४ ॥
गृहीतो ब्रह्मणा राजन् प्रयुक्तश्च यथाविधि । अध्यापिताश्च मुनयो नाम्ना बर्हिषदो नृप ॥ ४५ ॥ राजन्! ब्रह्माजीने इस धर्मको ग्रहण किया और वे विधिपूर्वक उसे अपने उपयोगमें लाये। नरेश्वर! फिर उन्होंने बर्हिषद् नामवाले मुनियोंको इसका अध्ययन कराया ॥ ४५ ॥
बर्हिषद्भ्यश्च सम्प्राप्तः सामवेदान्तगं द्विजम् । ज्येष्ठं नामाभिविख्यातं ज्येष्ठसामव्रतो हरिः ॥ ४६ ॥ बर्हिषद् नामक ऋषियोंसे इस धर्मका उपदेश ज्येष्ठ नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मणको मिला, जो सामवेदके पारंगत विद्वान् थे। ज्येष्ठसामकी उपासनाका उन्होंने व्रत ले रखा था। इसलिये वे ज्येष्ठसामव्रती हरि कहलाते थे ॥ ४६ ॥