महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2384, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिको नमस्कार किया और उन्हीं नारायणदेवके मुखसे प्रकट आरण्यक, रहस्य तथा संग्रहसहित उस श्रेष्ठ धर्मका उपदेश ग्रहण किया ।। ३० १/२ ।। उपदिश्य ततो धर्मं ब्रह्मणेऽमिततेजसे ।। ३१ ।। त्वं कर्ता युगधर्माणां निराशीः कर्मसंज्ञितम् । अमिततेजस्वी ब्रह्माको इस धर्मका उपदेश देकर उस समय भगवान्ने उनसे कहा—‘तुम निष्कामभावसे सारे कर्म करते हुए युगधर्मोंके प्रवर्तक बनो’ ।। ३१ १/२ ।। जगाम तमसः पारं यत्राव्यक्तं व्यवस्थितम् ।। ३२ ।। ततोऽथ वरदो देवो ब्रह्मा लोकपितामहः । असृजत् स ततो लोकान् कृत्स्नान् स्थावरजङ्गमान् ।। ३३ ।। यह आदेश देकर वे अज्ञानान्धकारसे परे विराजमान अपने परम अव्यक्त धामको चले गये। तदनन्तर वरदायक देवता लोकपितामह ब्रह्माने सम्पूर्ण चराचर लोकोंकी सृष्टि की ।। ३२-३३ ।। ततः प्रावर्तत तदा आदौ कृतयुगं शुभम् । ततो हि सात्वतो धर्मो व्याप्य लोकानवस्थितः ।। ३४ ।। फिर तो सृष्टिके आरम्भमें कल्याणकारी कृतयुगकी प्रवृत्ति हुई और तबसे सात्वतधर्म सारे संसारमें व्याप्त हो गया ।। ३४ ।। तेनैवाद्येन धर्मेण ब्रह्मा लोकविसर्गकृत् । पूजयामास देवेशं हरिं नारायणं प्रभुम् ।। ३५ ।। लोकस्रष्टा ब्रह्माने उसी आदिधर्मके द्वारा देवेश्वर भगवान् नारायण हरिकी आराधना की ।। ३५ ।। धर्मप्रतिष्ठाहेतोश्च मनुं स्वारोचिषं ततः । अध्यापयामास तदा लोकानां हितकाम्यया ।। ३६ ।। फिर इस धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये समस्त लोकोंके हितकी कामनासे उन्होंने स्वारोचिषमनुको उस समय इस धर्मका उपदेश किया ।। ३६ ।। ततः स्वरोचिषः पुत्रं स्वयं शङ्खपदं नृप । अध्यापयत् पुराव्यग्रः सर्वलोकपतिर्विभुः ।। ३७ ।। नरेश्वर! उन दिनों स्वारोचिष मनु ही सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति एवं प्रभु थे। उन्होंने शान्तभावसे पहले अपने पुत्र शंखपदको स्वयं इस धर्मका ज्ञान प्रदान किया ।। ३७ ।। ततः शङ्खपदश्चापि पुत्रमात्मजमौरसम् । दिशां पालं सुवर्णाभमध्यापयत भारत । सोऽन्तर्दधे ततो भूयः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ।। ३८ ।। भारत! फिर शंखपदने भी अपने औरस पुत्र दिक्पाल सुवर्णाभको इस धर्मका अध्ययन कराया। इसके बाद त्रेतायुग प्राप्त होनेपर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। ३८ ।।