भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2383, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 2383

सुपर्णाच्चाप्यधिगतो धर्म एष सनातनः ॥ २२ ॥ वायुना द्विपदां श्रेष्ठ कथितो जगदायुषा । यह दुष्कर धर्म ऋग्वेदके पाठमें स्पष्टरूपसे पढ़ा गया है। नरश्रेष्ठ! सुपर्णसे उस सनातन धर्मको इस जगत्के प्राणस्वरूप वायुने प्राप्त किया ॥ २२ १/२ ॥ वायोः सकाशात् प्राप्तश्च ऋषिभिर्विघसाशिभिः ॥ २३ ॥ ततो महोदधिश्चैव प्राप्तवान् धर्ममुत्तमम् । अन्तर्दधे ततो भूयो नारायणसमाहितः ॥ २४ ॥ वायुसे विघसाशी ऋषियोंने इस धर्मका उपदेश ग्रहण किया। उनसे महोदधिको इस उत्तम धर्मकी प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् यह धर्म फिर लुप्त होकर भगवान् नारायणमें विलीन हो गया ॥ २३-२४ ॥ यदा भूयः श्रवणजा सृष्टिरासीन्महात्मनः । ब्रह्मणः पुरुषव्याघ्र तत्र कीर्तयतः शृणु ॥ २५ ॥ पुरुषसिंह! जब पुनः भगवान्‌के कानोंसे महात्मा ब्रह्माजीकी चौथी बार उत्पत्ति हुई, तब जिस प्रकार इस धर्मका प्रादुर्भाव हुआ था, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २५ ॥ जगत्स्रष्टुमना देवो हरिनारायणः स्वयम् । चिन्तयामास पुरुषं जगत्सर्गकरं प्रभुम् ॥ २६ ॥ साक्षात् भगवान् नारायण हरिने जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे एक ऐसे पुरुषका चिन्तन किया, जो संसारकी सृष्टि करनेमें पूर्णतः समर्थ हो ॥ २६ ॥ अथ चिन्तयतस्तस्य कर्णाभ्यां पुरुषः स्मृतः । प्रजासर्गकरो ब्रह्मा तमुवाच जगत्पतिः ॥ २७ ॥ सृज प्रजाः पुत्र सर्वा मुखतः पादतस्तथा । कहा जाता है, चिन्तन करते समय भगवान्‌के दोनों कानोंसे एक पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। वही प्रजाकी सृष्टि करनेवाला ब्रह्मा हुआ। जगदीश्वर नारायणने ब्रह्मासे कहा—'बेटा! तुम अपने मुखसे लेकर पैरतकके अंगोंसे समस्त प्रजाकी सृष्टि करो ॥ २७ १/२ ॥ श्रेयस्तव विधास्यामि बलं तेजश्च सुव्रत ॥ २८ ॥ धर्मं च मत्तो गृह्णीष्व सात्वतं नाम नामतः । तेन सृष्टं कृतयुगं स्थापयस्व यथाविधि ॥ २९ ॥ 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुत्र! मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा और तुम्हारे भीतर तेज एवं बलकी वृद्धि करता रहूँगा। तुम मुझसे इस सात्वत नामक धर्मको ग्रहण करो और उसके द्वारा विधिपूर्वक सत्ययुगकी सृष्टि करके उसकी स्थापना करो' ॥ २८-२९ ॥ ततो ब्रह्मा नमश्चक्रे देवाय हरिमेधसे । धर्मं चाग्र्यं स जग्राह सरहस्यं ससंग्रहम् ॥ ३० ॥ आरण्यकेन सहितं नारायणमुखोद्भवम् ।