भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2382

भूपाल! सृष्टिके आदिमें जब भगवान् नारायणके मुखसे ब्रह्माजीका मानसिक जन्म हुआ था, उस समय साक्षात् नारायणने उन्हें इस धर्मका उपदेश किया था। भरतनन्दन! नारायणने उस धर्मसे देवताओं और पितरोंका पूजनादि कर्म किया था। फिर फेनप ऋषियोंने उस धर्मको ग्रहण किया ।। १३-१४ ।।

वैखानसाः फेनपेभ्यो धर्मं तं प्रतिपेदिरे ।
वैखानसेभ्यः सोमस्तु ततः सोऽन्तर्दधे पुनः ।। १५ ।।
फेनपोंसे वैखानसोंने उस धर्मको उपलब्ध किया। उनसे सोमने उसे ग्रहण किया। तदनन्तर वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। १५ ।।

यदासीच्चाक्षुषं जन्म द्वितीयं ब्रह्मणो नृप ।
तदा पितामहेनैव सोमाद् धर्मः परिश्रुतः ।। १६ ।।
नारायणात्मको राजन् रुद्राय प्रददौ च तम् ।
नरेश्वर! जब ब्रह्माजीका नेत्रजनित द्वितीय जन्म हुआ, तब उन्होंने सोमसे उस नारायण-स्वरूप धर्मको सुना था। राजन्! ब्रह्माजीने रुद्रको इसका उपदेश दिया ।। १६ १/२ ।।

ततो योगस्थितो रुद्रः पुरा कृतयुगे नृप ।। १७ ।।
बालखिल्यानृषीन् सर्वान् धर्ममेतदपाठयत् ।
अन्तर्दधे ततो भूयस्तस्य देवस्य मायया ।। १८ ।।
नरेश्वर! तत्पश्चात् योगनिष्ठ रुद्रने पूर्वकालके कृतयुगमें सम्पूर्ण बालखिल्य ऋषियोंको इस धर्मसे अवगत कराया; तदनन्तर भगवान् विष्णुकी मायासे वह धर्म फिर लुप्त हो गया ।। १७-१८ ।।

तृतीयं ब्रह्मणो जन्म यदासीद् वाचिकं महत् ।
तत्रैष धर्मः सम्भूतः स्वयं नारायणान्नृप ।। १९ ।।
राजन्! जब भगवान्‌की वाणीसे ब्रह्माजीका तीसरा महत्त्वपूर्ण जन्म हुआ, तब फिर साक्षात् नारायणसे ही यह धर्म प्रकट हुआ ।। १९ ।।

सुपर्णो नाम तमृषिः प्राप्तवान् पुरुषोत्तमात् ।
तपसा वै सुतप्तेन दमेन नियमेन च ।। २० ।।
सुपर्ण नामक ऋषिने इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह-पूर्वक भलीभाँति तपस्या करके भगवान् पुरुषोत्तमसे इस धर्मको प्राप्त किया ।। २० ।।

त्रिःपरिक्रान्तवानेतत् सुपर्णो धर्ममुत्तमम् ।
यस्मात् तस्माद् व्रतं ह्येतत् त्रिसौपर्णमिहोच्यते ।। २१ ।।
सुपर्णने प्रतिदिन इस उत्तम धर्मकी तीन आवृत्ति की थी, इसलिये इस व्रत या धर्मको यहाँ 'त्रिसौपर्ण' कहते हैं ।। २१ ।।

ऋग्वेदपाठपठितं व्रतमेतद्धि दुश्चरम् ।