महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2381, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकेनैश धर्मः कथितो देवेन ऋषिणापि वा ।। ६ ।।
एकान्तिनां च का चर्या कदा चोत्पादिता विभो ।
एतन्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ।। ७ ।।
भगवन्! इस भक्तिरूप धर्मका किस देवता अथवा ऋषिने उपदेश किया है? अनन्य भक्तोंकी जीवनचर्या क्या है? और वह कबसे प्रचलित हुई? मेरे इस संशयका निवारण कीजिये। इस विषयको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ।। ६-७ ।।
वैशम्पायन उवाच
समुपोढेष्वनीकेषु कुरुपाण्डवयोधर्मृधे ।
अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वयम् ।। ८ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! जिस समय कौरव और पाण्डवोंकी सेनाएँ युद्धके लिये आमने-सामने डटी हुई थीं और अर्जुन युद्धसे अनमने हो रहे थे, उस समय स्वयं भगवान्ने उन्हें गीतामें इस धर्मका उपदेश दिया ।। ८ ।।
अगतिश्च गतिश्चैव पूर्वं ते कथिता मया ।
गहनो ह्येष धर्मो वै दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः ।। ९ ।।
मैंने पहले तुमसे गति और अगदिका स्वरूप भी बताया था। यह धर्म गहन तथा अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्गम है ।। ९ ।।
सम्मितः सामवेदेन पुरैवादियुगे कृतः ।
धार्यते स्वयमीशेन राजन् नारायणेन च ।। १० ।।
राजन्! यह धर्म सामवेदके समान है। प्राचीनकालके सत्ययुगसे ही यह प्रचलित हुआ है। स्वयं जगदीश्वर भगवान् नारायण ही इस धर्मको धारण करते हैं ।। १० ।।
एतदर्थं महाराज पृष्टः पार्थेन नारदः ।
ऋषिमध्ये महाभागः शृण्वतोः कृष्णभीष्मयोः ।। ११ ।।
महाराज! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने ऋषियोंके बीचमें महाभाग नारदजीसे यही विषय पूछा था। उस समय श्रीकृष्ण और भीष्म भी इस विषयको सुन रहे थे ।। ११ ।।
गुरुणा च मयाप्येष कथितो नृपसत्तम ।
यथा तत् कथितं तत्र नारदेन तथा शृणु ।। १२ ।।
नृपश्रेष्ठ! मेरे गुरु व्यासजीने और मैंने भी यह विषय कहा था; परंतु वहाँ नारदजीने उस विषयका जैसा वर्णन किया था, उसे बताता हूँ, सुनो ।। १२ ।।
यदासीन्मानसं जन्म नारायणमुखोद्गतम् ।
ब्रह्मणः पृथिवीपाल तदा नारायणः स्वयम् ।। १३ ।।
तेन धर्मेण कृतवान् दैवं पित्र्यं च भारत ।
फेनपा ऋषयश्चैव तं धर्मं प्रतिपेदिरे ।। १४ ।।