भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2391

राजन्! जैसे सारे जल-प्रवाह समुद्रसे ही प्रसारको प्राप्त होते हैं और फिर उस समुद्रमें ही आकर मिल जाते हैं, उसी प्रकार ज्ञानरूपी जलके महान् प्रवाह नारायणसे ही प्रकट होकर फिर उन्हींमें लीन हो जाते हैं ॥ ८३ ॥

एष ते कथितो धर्मः सात्वतः कुरुनन्दन ।
कुरुष्वैनं यथान्यायं यदि शक्तोऽसि भारत ॥ ८४ ॥
भरतभूषण! कुरुनन्दन! यह तुम्हें सात्वत-धर्मका परिचय दिया गया है। यदि तुमसे हो सके तो यथोचितरूपसे इस धर्मका पालन करो ॥ ८४ ॥

एवं हि स महाभागो नारदो गुरवे मम ।
श्वेतानां यतिनां चाह एकान्तगतिमव्ययाम् ॥ ८५ ॥
इस प्रकार महाभाग नारदजीने मेरे गुरु व्यासजीसे श्वेतवस्त्रधारी गृहस्थों और काषायवस्त्रधारी संन्यासियोंकी अविनश्वर एकान्त गतिका वर्णन किया है ॥ ८५ ॥

व्यासश्चाकथयत् प्रीत्या धर्मपुत्राय धीमते ।
स एवायं मया तुभ्यमाख्यातः प्रसृतो गुरोः ॥ ८६ ॥
व्यासजीने भी बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिरको प्रेमपूर्वक इस धर्मका उपदेश दिया। गुरुके मुखसे प्रकट हुए उसी धर्मका मैंने यहाँ तुम्हारे लिये वर्णन किया है ॥ ८६ ॥

इत्थं हि दुष्करो धर्म एष पार्थिवसत्तम ।
यथैव त्वं तथैवान्ये भवन्तीह विमोहिताः ॥ ८७ ॥
नृपश्रेष्ठ! इस तरह यह धर्म दुष्कर है। तुम्हारी तरह दूसरे लोग भी इसके विषयमें मोहित हो जाते हैं ॥ ८७ ॥

कृष्ण एव हि लोकानां भावनो मोहनस्तथा ।
संहारकारकश्चैव कारणं च विशांपते ॥ ८८ ॥
प्रजानाथ! भगवान् श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण लोकोंके पालक, मोहक, संहारक तथा कारण हैं (अतः तुम उन्हींका भक्तिभावसे भजन करो)॥ ८८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
ऐकान्तिकभावेऽष्टचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमा एवं उनके प्रति ऐकान्तिकभावविषयक तीन सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४८ ॥