महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा पुरुष जब जन्म लेता है, तब उसपर लोकपितामह ब्रह्माकी कृपादृष्टि होती है (और वे उसे प्रवृत्तिमार्गमें नियुक्त कर देते हैं)। उसका मन रजोगुण और तमोगुणके प्रवाहमें डूबा रहता है ।। ७७ १/२ ।।
कामं देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम ।। ७८ ।।
हीनाः सत्त्वेन शुद्धेन ततो वैकारिकाः स्मृताः ।
नृपश्रेष्ठ! देवता और ऋषि कामनायुक्त सत्त्वगुणमें स्थित होते हैं। उनमें भी शुद्ध सत्त्वगुणकी कमी होती है, इसलिये वे वैकारिक माने जाते हैं ।। ७८ १/२ ।।
जनमेजय उवाच
कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।। ७९ ।।
वद सर्वं यथादृष्टं प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् ।
**जनमेजयने पूछा—**मुने! वैकारिक पुरुष भगवान् पुरुषोत्तमको कैसे प्राप्त कर सकता है? यह सब आप अपने अनुभवके अनुसार बताइये और उसकी प्रवृत्तिका भी क्रमशः वर्णन कीजिये ।। ७९ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
सुसूक्ष्मं सत्त्वसंयुक्तं संयुक्तं त्रिभिरक्षरैः ।। ८० ।।
पुरुषः पुरुषं गच्छेन्निष्क्रियः पञ्चविंशकः ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**जो अत्यन्त सूक्ष्म, सत्त्वगुणसे संयुक्त तथा अकार, उकार और मकार—इन तीन अक्षरोंसे युक्त प्रणवस्वरूप है, उस परम पुरुष परमात्माको पचीसवाँ तत्त्वरूप पुरुष (जीवात्मा) कर्तृत्वके अहंकारसे शून्य होनेपर प्राप्त करता है ।। ८० १/२ ।।
एवमेकं सांख्ययोगं वेदारण्यकमेव च ।। ८१ ।।
परस्पराङ्गान्यतानि पाञ्चरात्रं च कथ्यते ।
एष एकान्तिनां धर्मो नारायणपरात्मकः ।। ८२ ।।
इस प्रकार आत्मा और अनात्माका विवेक करानेवाला सांख्य, चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपदेश देनेवाला योग, जीव और ब्रह्मके अभेदका बोध करानेवाला वेदोंका आरण्यकभाग (उपनिषद्) तथा भक्तिमार्गका प्रतिपादन करनेवाला पाञ्चरात्र आगम—ये सब शास्त्र एक लक्ष्यके साधक होनेके कारण एक बताये जाते हैं। ये सब एक-दूसरेके अंग हैं। सारे कर्मोंको भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंमें समर्पित कर देना यह एकान्त भक्तोंका धर्म है ।। ८१-८२ ।।
यथा समुद्रात् प्रसृता जलौघा-
स्तमेव राजन् पुनराविशन्ति ।
इमे तथा ज्ञानमहाजलौघा
नारायणं वै पुनराविशन्ति ।। ८३ ।।