महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयहाँ भी वह इस बातको अच्छी तरह जानता है कि परमपुरुष नारायण सर्वोत्तम वेदवेत्ता हैं और मोक्षके परम आश्रय भगवान् नारायण ही हैं, इसीलिये वह मनुष्य सात्त्विक माना गया है ।। ७० ।।
मनीषितं च प्राप्नोति चिन्तयन् पुरुषोत्तमम् ।
एकान्तभक्तिः सततं नारायणपरायणः ।। ७१ ।।
भगवान् नारायणके आश्रित उनका अनन्य भक्त अपने मनके अभीष्ट भगवान् पुरुषोत्तमका निरन्तर चिन्तन करता हुआ उनको प्राप्त कर लेता है ।। ७१ ।।
मनीषिणो हि ये केचिद् यतयो मोक्षधर्मिणः ।
तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः ।। ७२ ।।
मोक्षधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो कोई भी मनीषी यति हैं तथा जिनकी तृष्णाका सर्वथा नाश हो गया है, उनके योग-क्षेमका भार स्वयं भगवान् नारायण वहन करते हैं ।। ७२ ।।
जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः ।
सात्त्विकस्तु स विज्ञेयो भवेन्मोक्षे च निश्चितः ।। ७३ ।।
जन्म-मरणके चक्करमें पड़े हुए जिस पुरुषको भगवान् मधुसूदन अपनी कृपा-दृष्टिसे देख लेते हैं, उसे सात्त्विक जानना चाहिये। वह मोक्षका सुनिश्चित अधिकारी हो जाता है ।। ७३ ।।
सांख्ययोगेन तुल्यो हि धर्म एकान्तसेवितः ।
नारायणात्मके मोक्षे ततो यान्ति परां गतिम् ।। ७४ ।।
एकान्त भक्तोंद्वारा सेवित धर्म सांख्य और योगके तुल्य है। उसके सेवनसे मनुष्य नारायणस्वरूप मोक्षमें ही परम गतिको प्राप्त होते हैं ।। ७४ ।।
नारायणेन दृष्टस्तु प्रतिबुद्धो भवेत् पुमान् ।
एवमात्मेच्छया राजन् प्रतिबुद्धो न जायते ।। ७५ ।।
राजन्! जिसपर भगवान् नारायणकी कृपादृष्टि हो जाती है, वह पुरुष ही ज्ञानवान् होता है। इस तरह अपनी इच्छामात्रसे कोई ज्ञानी नहीं होता ।। ७५ ।।
राजसी तामसी चैव व्यामिश्रे प्रकृती स्मृते ।
तदात्मकं हि पुरुषं जायमानं विशाम्पते ।। ७६ ।।
प्रवृत्तिलक्षणैर्युक्तं नावेक्षति हरिः स्वयम् ।
प्रजानाथ! राजसी और तामसी—ये दो प्रकृतियाँ दोषोंसे मिश्रित होती हैं। जो पुरुष राजस और तामस प्रकृतिसे युक्त होकर जन्म धारण करता है, वह प्रायः सकाम कर्ममें प्रवृत्तिके लक्षणोंसे युक्त होता है। अतः भगवान् श्रीहरि उसकी ओर नहीं देखते ।। ७६ १/२ ।।
पश्यत्येनं जायमानं ब्रह्मा लोकपितामहः ।। ७७ ।।
रजसा तमसा चैव मानसं समभिप्लुतम् ।