भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2404

समासतस्तु यद् व्यासः पुरुषैकत्वमुक्तवान् । तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि प्रसादादमितौजसः ॥ ७ ॥ परंतु व्यासजीने संक्षेपसे पुरुषकी एकताका जिस तरह प्रतिपादन किया है, उसीको मैं भी उन अमिततेजस्वी गुरुके कृपा-प्रसादसे तुम्हें बताऊँगा ॥ ७ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ब्रह्मणा सह संवादं त्र्यम्बकस्य विशाम्पते ॥ ८ ॥ प्रजानाथ! इस विषयमें जानकार मनुष्य ब्रह्माजीके साथ रुद्रके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ८ ॥

क्षीरोदस्य समुद्रस्य मध्ये हाटकसप्रभः । वैजयन्त इति ख्यातः पर्वतप्रवरो नृप ॥ ९ ॥ नरेश्वर! क्षीरसागरके मध्यभागमें वैजयन्त नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ पर्वत है, जो सुवर्णकी-सी कान्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ९ ॥

तत्राध्यात्मगतिं देव एकाकी प्रविचिन्तयन् । वैराजसदनान्नित्यं वैजयन्तं निषेवते ॥ १० ॥ वहाँ एकाकी ब्रह्मा अध्यात्मगतिका चिन्तन करनेके लिये ब्रह्मलोकसे प्रतिदिन आते और उस वैजयन्त पर्वतका सेवन करते थे ॥ १० ॥

अथ तत्रासतस्तस्य चतुर्वक्त्रस्य धीमतः । ललाटप्रभवः पुत्रः शिव आगाद् यदृच्छया ॥ ११ ॥ आकाशेन महायोगी पुरा त्रिनयनः प्रभुः । ततः खान्निपपाताशु धरणीधरमूर्धनि ॥ १२ ॥ पहले एक दिन बुद्धिमान् चतुर्मुख ब्रह्माजी जब वहाँ बैठे हुए थे, उसी समय उनके ललाटसे उत्पन्न हुए पुत्र महायोगी त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव अनायास ही आकाशमार्गसे घूमते हुए वैजयन्तपर्वतके सामने आये और शीघ्र ही आकाशसे उस पर्वतशिखरपर उतर पड़े ॥ ११-१२ ॥

अग्रतश्चाभवत् प्रीतो ववन्दे चापि पादयोः । तं पादयोर्निपतितं दृष्ट्वा सव्येन पाणिना ॥ १३ ॥ उत्थापयामास तदा प्रभुरेकः प्रजापतिः । उवाच चैनं भगवांश्चिरस्यागतमात्मजम् ॥ १४ ॥ सामने ब्रह्माजीको देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने उनके दोनों चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। भगवान् शिवको अपने चरणोंमें पड़ा देख उस समय एकमात्र सर्वसमर्थ भगवान् प्रजापतिने दाहिने हाथसे उन्हें उठाया और दीर्घकालके पश्चात् अपने निकट आये हुए पुत्रसे इस प्रकार कहा ॥ १३-१४ ॥

पितामह उवाच