भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2405

स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मेऽन्तिकम् । कच्चित् ते कुशलं पुत्र स्वाध्यायतपसोः सदा ॥ १५ ॥ नित्यमुग्रतपास्त्वं हि ततः पृच्छामि ते पुनः ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी बोले— महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है। सौभाग्यसे मेरे निकट आये हो। बेटा! तुम्हारा स्वाध्याय और तप सदा सकुशल चल रहा है न? तुम सर्वदा कठोर तपस्यामें ही लगे रहते हो; इसलिये मैं तुमसे बारंबार तपके विषयमें पूछता हूँ ॥ १५-१६ ॥

रुद्र उवाच

त्वत्प्रसादेन भगवन् स्वाध्यायतपसोर्मम । कुशलं चाव्ययं चैव सर्वस्य जगतस्त्वथ ॥ १७ ॥ रुद्रने कहा— भगवन्! आपकी कृपासे मेरे स्वाध्याय और तप सकुशल चल रहे हैं; कभी भंग नहीं हुए हैं। सम्पूर्ण जगत् भी कुशल-क्षेमसे है ॥ १७ ॥ चिरदृष्टो हि भगवान् वैराजसदने मया । ततोऽहं पर्वतं प्राप्तस्त्विमं त्वत्पादसेवितम् ॥ १८ ॥ प्रभो! बहुत दिन हुए, मैंने ब्रह्मलोकमें आपका दर्शन किया था। इसीलिये आज आपके चरणोंद्वारा सेवित इस पर्वतपर पुनः दर्शनके लिये आया हूँ ॥ १८ ॥ कौतूहलं चापि हि मे एकान्तगमनेन ते । नैतत् कारणमल्पं हि भविष्यति पितामह ॥ १९ ॥ पितामह! आपके एकान्तमें जानेसे मेरे मनमें बड़ा कौतूहल पैदा हुआ। मैंने सोचा, इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं होगा ॥ १९ ॥ किं नु तत्सदनं श्रेष्ठं क्षुत्पिपासाविवर्जितम् । सुरासुरैरध्युषितं ऋषिभिश्चामितप्रभैः ॥ २० ॥ गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सततं संनिषेवितम् । उत्सृज्येमं गिरिवरमेकाकी प्राप्तवानसि ॥ २१ ॥ क्या कारण है कि क्षुधा-पिपासासे रहित उस श्रेष्ठ धामको, जहाँ निरन्तर देवता, असुर, अमिततेजस्वी ऋषि, गन्धर्व और अप्सराओंके समूह आपकी सेवामें उपस्थित रहते हैं, छोड़कर आप अकेले इस श्रेष्ठ पर्वतपर चले आये हैं? ॥ २०-२१ ॥

ब्रह्मोवाच

वैजयन्तो गिरिवरः सततं सेव्यते मया । अत्रैकाग्रेण मनसा पुरुषश्चिन्त्यते विराट् ॥ २२ ॥ ब्रह्माजीने कहा— वत्स! मैं इन दिनों गिरिवर वैजयन्तका जो निरन्तर सेवन कर रहा हूँ, इसका कारण यह है कि यहाँ एकाग्रचित्तसे विराट् पुरुषका चिन्तन किया करता हूँ ॥ २२ ॥