महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2410, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयद् वै सूते धातुराद्यं विधानं तद् वै विप्राः प्रवदन्तेऽनिरुद्धम्। यद् वै लोके वैदिकं कर्म साधु आशीर्युक्तं तद्धि तस्यैव भाव्यम्॥ १९॥ वही मुझ विधाताके आदि विधानको उत्पन्न करता है। विद्वान् ब्राह्मण उसीको अनिरुद्ध कहते हैं। लोकमें सकाम भावसे जो वैदिक सत्कर्म किये जाते हैं, वे उस अनिरुद्धात्मा पुरुषकी प्रसन्नताके लिये ही होते हैं—ऐसा चिन्तन करना चाहिये॥ १९॥
देवाः सर्वे मुनयः साधु शान्ता- स्तं प्राग्वंशे यज्ञभागैर्यजन्ते। अहं ब्रह्मा आद्य ईशः प्रजानां तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः॥ २०॥ सम्पूर्ण देवता और शान्त स्वभाववाले मुनि यज्ञशालामें यज्ञभागोंद्वारा उसीका यजन करते हैं। मैं प्रजाओंका आदि ईश्वर ब्रह्मा उसी परम पुरुषसे उत्पन्न हुआ हूँ और मुझसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है॥ २०॥
मत्तो जगज्जङ्गमं स्थावरं च सर्वे वेदाः सरहस्या हि पुत्र॥ २१॥ पुत्र! मुझसे यह चराचर जगत् तथा रहस्यसहित सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं॥ २१॥
चतुर्विभक्तः पुरुषः स क्रीडति यथेच्छति। एवं स भगवान् स्वेन ज्ञानेन प्रतिबोधितः॥ २२॥ वासुदेव आदि चार व्यूहोंमें विभक्त हुए वे परम पुरुष ही जैसी इच्छा होती है, वैसी क्रीड़ा करते हैं। इसी तरह वे भगवान् अपने ही ज्ञानसे जाननेमें आते हैं॥ २२॥
एतत् ते कथितं पुत्र यथावदनुपृच्छतः। सांख्यज्ञाने तथा योगे यथावदनुवर्णितम्॥ २३॥ पुत्र! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यथावत्रूपसे ये सब बातें बतायी हैं। सांख्य और योगमें इस विषयका यथार्थरूपसे वर्णन किया गया है॥ २३॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीयसमाप्तौ एकपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ ३५१॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाका उपसंहारविषयक तीन सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५१॥