महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2411, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नारदके द्वारा इन्द्रको उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणकी कथा सुनानेका उपक्रम
युधिष्ठिर उवाच
धर्माः पितामहेनोक्ता मोक्षधर्माश्रिताः शुभाः ।
धर्ममाश्रमिणां श्रेष्ठं वक्तुमर्हसि मे भवान् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपके बतलाये हुए कल्याणमय मोक्षसम्बन्धी धर्मोंका मैंने श्रवण किया। अब आप आश्रमधर्मोंका पालन करनेवाले मनुष्योंके लिये जो सबसे उत्तम धर्म हो, उसका उपदेश करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्गः सत्यफलं महत् ।
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! सभी आश्रमोंमें स्वधर्मपालनका विधान है, सबमें स्वर्गका तथा महान् सत्यफल—मोक्षका भी साधन है। धर्मके यज्ञ, दान, तप आदि बहुत-से द्वार हैं; अतः इस जगत्में धर्मकी कोई भी क्रिया निष्फल नहीं होती ॥ २ ॥
यस्मिन् यस्मिंश्च विषये यो यो याति विनिश्चयम् ।
स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो-जो मनुष्य जिस-जिस विषय-स्वर्ग या मोक्षके लिये साधन करके उसमें सुनिश्चित सफलताको प्राप्त कर लेता है, उसी साधन या धर्मको वह श्रेष्ठ समझता है, दूसरेको नहीं ॥ ३ ॥
इमां च त्वं नरव्याघ्र श्रोतुमर्हसि मे कथाम् ।
पुरा शक्रस्य कथितां नारदेन महर्षिणा ॥ ४ ॥
पुरुषसिंह! इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा सुना रहा हूँ, उसे सुनो। पूर्वकालमें महर्षि नारदने इन्द्रको यह कथा सुनायी थी ॥ ४ ॥
महर्षिर्नारदो राजन् सिद्धस्त्रैलोक्यसम्मतः ।
पर्येति क्रमशो लोकान् वायुरव्याहतो यथा ॥ ५ ॥
राजन्! महर्षि नारद तीनों लोकोंद्वारा सम्मानित सिद्ध पुरुष हैं। वायुके समान उनकी सर्वत्र अबाधित गति है। वे क्रमशः सभी लोकोंमें घूमते रहते हैं ॥ ५ ॥
स कदाचिन्महेष्वास देवराजालयं गतः ।
सत्कृतश्च महेन्द्रेण प्रत्यासन्नगतोऽभवत् ॥ ६ ॥