भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2412

महाधनुर्धर नरेश! एक समय वे नारदजी देवराज इन्द्रके यहाँ पधारे। इन्द्रने उन्हें अपने समीप ही बिठाकर उनका बड़ा आदर-सत्कार किया।। ६।।

तं कृतक्षणमासीनं पर्यपृच्छच्छचीपतिः।
महर्षे किंचिदाश्चर्यमस्ति दृष्टं त्वयानघ।। ७।।

जब नारदजी थोड़ी देर बैठकर विश्राम ले चुके, तब शचीपति इन्द्रने पूछा-'निष्पाप महर्षे! इधर आपने कोई आश्चर्यजनक घटना देखी है क्या?।। ७।।

यदा त्वमपि विप्रर्षे त्रैलोक्यं सचराचरम्।
जातकौतूहलो नित्यं सिद्धश्वरसि साक्षिवत् ।। ८ ।।

'ब्रह्मर्षे! आप सिद्ध पुरुष हैं और कौतूहलवश चराचर प्राणियोंसे युक्त तीनों लोकोंमें सदा साक्षीकी भाँति विचरते रहते हैं।। ८।।

न ह्यस्त्यविदितं लोके देवर्षे तव किंचन।
श्रुतं वाप्यनुभूतं वा दृष्टं वा कथयस्व मे।। ९।।

'देवर्षे! जगत्में कोई भी ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो। यदि आपने कोई अद्भुत बात देखी हो, सुनी हो अथवा अनुभव की हो तो वह मुझे बताइये'।। ९।।

तस्मै राजन् सुरेन्द्राय नारदो वदतां वरः।
आसीनायोपपन्नाय प्रोक्तवान् विपुलां कथाम् ।। १० ।।

राजन्! उनके इस प्रकार पूछनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने अपने पास ही बैठे हुए सुरेन्द्रको एक विस्तृत कथा सुनायी।। १०।।

यथा येन च कल्पेन स तस्मै द्विजसत्तमः।
कथां कथितवान् पृष्टस्तथा त्वमपि मे शृणु ।। ११ ।।

इन्द्रके पूछनेपर द्विजश्रेष्ठ नारदने उन्हें जैसे और जिस ढंगसे वह कथा कही थी, वैसे ही मैं भी कहूँगा। तुम भी मेरी कही हुई उस कथाको ध्यान देकर सुनो।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
द्विपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३५२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ।। ३५२ ।।