भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 252

भीतरका हो तो उसे नहीं पीना चाहिये ॥ २६ ॥ राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् । आयुः सुवर्णकारान्नंमवीरायाश्च योषितः ॥ २७ ॥ ‘राजाका अन्न तेज हर लेता है, शूद्रका अन्न ब्रह्मतेजको नष्ट कर देता है, सुनारका तथा पति और पुत्रसे हीन युवतीका अन्न आयुका नाश करता है ॥ २७ ॥ विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं गणिकान्नंमथेन्द्रियम् । मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितान्नं च सर्वशः ॥ २८ ॥ ‘व्याजखोरका अन्न विष्ठाके समान है और वेश्याका अन्न वीर्यके समान। जो अपनी स्त्रीके पास किसी उपपतिका आना सह लेते हैं, उन कायरोंका तथा सदा स्त्रीके वशीभूत रहनेवाले पुरुषोंका अन्न भी वीर्यके ही तुल्य है ॥ २८ ॥ दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रतुविक्रयिकस्य च । तक्षणश्चर्मावकर्तुश्च पुंश्चल्या रजकस्य च ॥ २९ ॥ चिकित्सकस्य यच्चान्नंमभोज्यं रक्षिणस्तथा । ‘जिसने यज्ञकी दीक्षा ली हो उसका अन्न अग्निषोमीय होमविशेषके पहले अग्राह्य है। कंजूस, यज्ञ बेचनेवाले, बढ़ई, चमार या मोची, व्यभिचारिणी स्त्री, धोबी, वैद्य तथा चौकीदारका अन्न भी खाने योग्य नहीं है ॥ २९ ½ ॥ गणग्रामाभिशस्तानां रङ्गस्त्रीजीविनां तथा ॥ ३० ॥ परिवित्तीनां पुंसां च बन्दिद्यूतविदां तथा । ‘जिन्हें किसी समाज या गाँवने दोषी ठहराया हो, जो नर्तकीके द्वारा अपनी जीविका चलाते हों, छोटे भाईका ब्याह हो जानेपर भी कुँवारे रह गये हों, बंदी (चारण या भाट)-का काम करते हों या जुआरी हों, ऐसे लोगोंका अन्न भी ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥ ३० ½ ॥ वामहस्ताहृतं चान्नं भक्तं पर्युषितं च यत् ॥ ३१ ॥ सुरानुगतमुच्छिष्टमभोज्यं शेषितं च यत् । ‘बायें हाथसे लाया अथवा परोसा गया अन्न, बासी भात, शराब मिला हुआ, जूठा और घरवालोंको न देकर अपने लिये बचाया हुआ अन्न भी अखाद्य ही है ॥ ३१ ½ ॥ पिष्टस्य चेक्षुशाकानां विकाराः पयसस्तथा ॥ ३२ ॥ सक्तुधानाकरम्भाणां नोपभोग्याश्चिरस्थिताः । ‘इसी प्रकार जो पदार्थ आटे, ईखके रस, साग या दूधको बिगाड़कर या सड़ाकर बनाये गये हों, सत्तू, भूने हुए जौ और दहीमिश्रित सत्तू इन्हें विकृत करके बनाये हुए पदार्थ यदि बहुत देरके बने हों तो उन्हें नहीं खाना चाहिये ॥ ३२ ½ ॥ पायसं कृसरं मांसमपूपांश्च वृथाकृताः ॥ ३३ ॥ अपेयाश्चाप्यभक्ष्याश्च ब्राह्मणैर्गृहमेधिभिः ।

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व · पृष्ठ 252, कुल 2450 में से · BharatKosha