भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 253

'खीर, खिचड़ी, फलका गूदा और पूए यदि देवताके उद्देश्यसे न बनाये गये हों तो गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये खाने-पीने योग्य नहीं हैं ॥ ३३ १/२ ॥ देवानृषीन् मनुष्यांश्च पितॄन् गृह्याश्च देवताः ॥ ३४ ॥ पूजयित्वा ततः पश्चाद् गृहस्थो भोक्तुमर्हति । 'गृहस्थको चाहिये कि वह पहले देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों (अतिथियों), पितरों और घरके देवताओंका पूजन करके पीछे अपने भोजन करे ॥ ३४ १/२ ॥ यथा प्रव्रजितो भिक्षुस्तथैव स्वे गृहे वसेत् ॥ ३५ ॥ एवंवृत्तः प्रियैर्दारैः संवसन् धर्ममाप्नुयात् । 'जैसे गृहत्यागी संन्यासी घरके प्रति अनासक्त होता है, उसी प्रकार गृहस्थको भी ममता और आसक्ति छोड़कर ही घरमें रहना चाहिये। जो इस प्रकार सदाचारका पालन करते हुए अपनी प्रिय पत्नीके साथ घरमें निवास करता है, वह धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ १/२ ॥ न दद्याद् यशसे दानं न भयान्नोपकारिणे ॥ ३६ ॥ न नृत्यगीतशीलेषु हासकेषु च धार्मिकः । न मत्ते चैव नोन्मत्ते न स्तेने न च कुत्सके ॥ ३७ ॥ न वाग्धीने विवर्णे वा नाङ्गहीने न वामने । न दुर्जने दौष्कुले वा व्रतैर््यो वा न संस्कृतः । न श्रोत्रियमृते दानं ब्राह्मणे ब्रह्मवर्जिते ॥ ३८ ॥ 'धर्मात्मा पुरुषको चाहिये कि वह यशके लोभसे, भयके कारण अथवा अपना उपकार करनेवालेको दान न दे अर्थात् उसे जो दिया जाय वह दान नहीं है, ऐसा समझना चाहिये। जो नाचने-गानेवाले, हँसी-मजाक करनेवाले (भाँड़ आदि), मदमत्त, उन्मत्त, चोर, निन्दक, गूँगे, कान्तिहीन, अङ्गहीन, बौने, दुष्ट, दूषित कुलमें उत्पन्न तथा व्रत एवं संस्कारसे शून्य हों, उन्हें भी दान न दे। श्रोत्रियके सिवा वेदज्ञानशून्य ब्राह्मणको दान नहीं देना चाहिये ॥ ३६—३८ ॥ असम्यक् चैव यद् दत्तमसम्यक् च प्रतिग्रहः । उभयं स्यादनर्थाय दातुरादातुरेव च ॥ ३९ ॥ 'जो उत्तम विधिसे दिया न गया हो तथा जिसे उत्तम विधिके साथ ग्रहण न किया गया हो, वह देना और लेना दोनों ही देने और लेनेवालेके लिये अनर्थकारी होते हैं ॥ ३९ ॥ यथा खदिरमालम्ब्य शिलां वाप्यर्णवं तरन् । मज्जेत मज्जतस्तद्वद् दाता यश्च प्रतिग्रही ॥ ४० ॥ 'जैसे खैरकी लकड़ी या पत्थरकी शिलाका सहारा लेकर समुद्र पार करनेवाला मनुष्य बीचमें ही डूब जाता है, उसी प्रकार अविधिपूर्वक दान देने और लेनेवाले यजमान और पुरोहित दोनों डूब जाते हैं ॥ ४० ॥