भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

काष्ठैरार्द्रैर्यथा वह्निरुपस्तीर्णो न दीप्यते । तपःस्वाध्यायचारित्रैरेवं हीनः प्रतिग्रही ॥ ४१ ॥ ‘जैसे गीली लकड़ीसे ढकी हुई आग प्रज्वलित नहीं होती, उसी प्रकार तपस्या, स्वाध्याय तथा सदाचारसे हीन ब्राह्मण यदि दान ग्रहण कर ले तो वह उसे पचा नहीं सकता ॥ ४१ ॥

कपाले यद्वदापः स्युः श्वदृतौ च यथा पयः । आश्रयस्थानदोषेण वृत्तहीने तथा श्रुतम् ॥ ४२ ॥ ‘जैसे मनुष्यकी खोपड़ीमें भरा हुआ जल और कुत्तेकी खालमें रखा हुआ दूध आश्रयदोषसे अपवित्र होता है, उसी प्रकार सदाचारहीन ब्राह्मणका शास्त्रज्ञान भी आश्रय-स्थानके दोषसे दूषित हो जाता है ॥ ४२ ॥

निर्मन्त्रो निर्वृतो यः स्यादशास्त्रज्ञोऽनसूयकः । अनुक्रोशात् प्रदातव्यं हीनेष्वव्रतिकेषु च ॥ ४३ ॥ ‘जो ब्राह्मण वेदज्ञानसे शून्य और शास्त्रज्ञानसे रहित होता हुआ भी दूसरोंमें दोष नहीं देखता तथा संतुष्ट रहता है, उसे तथा व्रतशून्य दीन-हीनको भी दया करके दान देना चाहिये ॥ ४३ ॥

न वै देयमनुक्रोशाद् दीनायाप्यपकारिणे । आप्ताचरित इत्येव धर्म इत्येव वा पुनः ॥ ४४ ॥ ‘पर जो दूसरोंका बुरा करनेवाला हो वह यदि दीन हो तो भी उसे दया करके नहीं देना चाहिये। यह शिष्टोंका आचार है और यही धर्म है ॥ ४४ ॥

निष्कारणं स्मृतं दत्तं ब्राह्मणे ब्रह्मवर्जिते । भवेद्पात्रदोषेण न चात्रास्ति विचारणा ॥ ४५ ॥ ‘वेदविहीन ब्राह्मणोंको दिया हुआ दान अपात्रदोषसे निरर्थक हो जाता है, इसमें कोई विचार करनेकी बात नहीं है ॥ ४५ ॥

यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणश्चानधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥ ४६ ॥ ‘जैसे लकड़ीका हाथी और चामका बना हुआ मृग हो, उसी प्रकार वेदशास्त्रोंके अध्ययनसे शून्य ब्राह्मण है। ये तीनों नाममात्र धारण करते हैं (परंतु नामके अनुसार काम नहीं देते) ॥ ४६ ॥

यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला । शकुनिर्वाप्यपक्षः स्यान्निर्मन्त्रो ब्राह्मणस्तथा ॥ ४७ ॥ ‘जैसे नपुंसक मनुष्य स्त्रियोंके पास जाकर निष्फल होता है, गाय गायसे ही संयुक्त होनेपर कोई फल नहीं दे सकती और जैसे बिना पंखका पक्षी उड़ नहीं सकता, उसी प्रकार वेदमन्त्रोंके ज्ञानसे शून्य ब्राह्मण भी व्यर्थ ही होता है ॥ ४७ ॥