महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस ते धर्मरहस्येषु संशयान् मनसि स्थितान् । छेत्ता भागीरथीपुत्रः सर्वज्ञः सर्वधर्मवित् ॥ ७ ॥ ‘गङ्गापुत्र भीष्म सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ हैं। वे धर्म-रहस्यके विषयमें तुम्हारे मनमें स्थित हुए सम्पूर्ण संदेहोंका निवारण करेंगे ॥ ७ ॥ जनयामास यं देवी दिव्या त्रिपथगा नदी । साक्षाद् ददर्श यो देवान् सर्वानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ८ ॥ बृहस्पतिपुरोगांस्तु देवर्षीनसकृत् प्रभुः । तोषयित्वोपचारेण राजनीतिमधीतवान् ॥ ९ ॥ ‘जिन्हें दिव्य नदी त्रिपथगा गङ्गादेवीने जन्म दिया है, जिन्होंने इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंका साक्षात् दर्शन किया है तथा जिन शक्तिशाली भीष्मने बृहस्पति आदि देवर्षियोंको बारम्बार अपनी सेवाद्वारा संतुष्ट करके राजनीतिका अध्ययन किया है, उनके पास चलो ॥ ८-९ ॥ उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च देवगुरुर्द्विजः । तच्च सर्वं सव्याख्यं प्राप्तवान् कुरुसत्तमः ॥ १० ॥ ‘शुक्राचार्य जिस शास्त्रको जानते हैं तथा देवगुरु विप्रवर बृहस्पतिको जिस शास्त्रका ज्ञान है, वह सम्पूर्ण शास्त्र कुरुश्रेष्ठ भीष्मने व्याख्यासहित प्राप्त किया है ॥ १० ॥ भार्गवाच्च्यवनाच्चापि वेदानङ्गोपबृंहितान् । प्रतिपेदे महाबाहुर्वसिष्ठाच्चरितव्रतः ॥ ११ ॥ ‘ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके महाबाहु भीष्मने भृगुवंशी च्यवन तथा महर्षि वसिष्ठसे वेदाङ्गोंसहित वेदोंका अध्ययन किया है ॥ ११ ॥ पितामहसुतं ज्येष्ठं कुमारं दीप्ततेजसम् । अध्यात्मगतितत्त्वज्ञमुपाशिक्षत यः पुरा ॥ १२ ॥ ‘इन्होंने पूर्वकालमें ब्रह्माजीके ज्येष्ठ पुत्र उद्दीप्त तेजस्वी सनत्कुमारजीसे, जो अध्यात्मगतिके तत्त्वको जाननेवाले हैं, अध्यात्मज्ञानकी शिक्षा पायी थी ॥ १२ ॥ मार्कण्डेयमुखात् कृत्स्नं यतिधर्ममवाप्तवान् । रामादस्त्राणि शक्राच्च प्राप्तवान् पुरुषर्षभः ॥ १३ ॥ ‘पुरुषप्रवर भीष्मने मार्कण्डेयजीके मुखसे सम्पूर्ण यतिधर्मका ज्ञान प्राप्त किया है और परशुराम तथा इन्द्रसे अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा पायी है ॥ १३ ॥ मृत्युरात्मेच्छया यस्य जातस्य मनुजेष्वपि । तथानपत्यस्य सतः पुण्यलोका दिवि श्रुताः ॥ १४ ॥ ‘मनुष्योंमें उत्पन्न होकर भी इन्होंने मृत्युको अपनी इच्छाके अधीन कर लिया है। संतानहीन होनेपर भी उनको प्राप्त होनेवाले पुण्य-लोक देवलोकमें विख्यात हैं ॥ १४ ॥ यस्य ब्रह्मर्षयः पुण्या नित्यमासन् सभासदः ।