महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 258, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयस्य नाविदितं किंचिज्ज्ञानयज्ञेषु विद्यते ॥ १५ ॥ 'पुण्यात्मा ब्रह्मर्षि सदा उनके सभासद रहे हैं। ज्ञानयज्ञमें कोई भी ऐसी बात नहीं है, जिसका उन्हें ज्ञान न हो ॥ १५ ॥
स ते वक्ष्यति धर्मज्ञः सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्ववित् । तमभ्येहि पुरा प्राणान् स विमुञ्चति धर्मवित् ॥ १६ ॥ 'सूक्ष्म धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले वे धर्मवेत्ता भीष्म तुम्हें धर्मका उपदेश देंगे। वे धर्मज्ञ महात्मा अपने प्राणोंका परित्याग करें, इसके पहले ही तुम इनके पास चलो' ॥ १६ ॥
एवमुक्तस्तु कौन्तेयो दीर्घप्रज्ञो महामतिः । उवाच वदतां श्रेष्ठं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥ १७ ॥ उनके ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् दूरदर्शी कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने वक्ताओंमें श्रेष्ठ सत्यवतीनन्दन व्यासजीसे कहा ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
वैशसं सुमहत् कृत्वा ज्ञातीनां रोमहर्षणम् । आगस्कृत् सर्वलोकस्य पृथिवीनाशकारकः ॥ १८ ॥ घातयित्वा तमेवाजौ छलेनाजिह्मयोधिनम् । उपसम्प्रष्टुमर्हामि तमहं केन हेतुना ॥ १९ ॥ युधिष्ठिर बोले—मुने! मैं अपने भाई-बन्धुओंका यह महान् एवं रोमाञ्चकारी संहार करके सम्पूर्ण लोकोंका अपराधी बन गया हूँ। मैंने इस सम्पूर्ण भूमण्डलका विनाश किया है। भीष्मजी सरलतापूर्वक युद्ध करनेवाले थे तो भी मैंने युद्धमें उन्हें छलसे मरवा डाला। अब फिर उन्हींसे मैं अपनी शङ्काओंको पूछूँ, क्या इसके योग्य मैं रह गया हूँ? अब मैं किस हेतुसे उन्हें मुँह दिखा सकता हूँ? ॥ १८-१९ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्तं नृपतिश्रेष्ठं चातुर्वर्ण्यहितेप्सया । पुनराह महाबाहुर्यदुश्रेष्ठो महामतिः ॥ २० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब परम बुद्धिमान् महाबाहु यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने चारों वर्णोंके हितकी इच्छासे नृपतिशिरोमणि युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा ॥ २० ॥
वासुदेव उवाच
नेदानीमतिनिबन्धं शोके त्वं कर्तुमर्हसि । यदाह भगवान् व्यासस्तत् कुरुष्व नृपोत्तम ॥ २१ ॥