भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**नृपश्रेष्ठ! अब आप अत्यन्त हठपूर्वक शोकको ही पकड़े न रहें। भगवान् व्यास जो आज्ञा देते हैं, वही करें॥ २१॥
ब्राह्मणास्त्वां महाबाहो भ्रातरश्च महौजसः।
पर्जन्यमिव घर्मान्ते नाथमाना उपासते॥ २२॥
महाबाहो! जैसे वर्षाकालमें लोग मेघकी ओर टकटकी लगाये देखते हैं—उससे जलकी याचना करते हैं, उसी प्रकार ये सारे ब्राह्मण और आपके ये महातेजस्वी भाई आपसे धैर्य धारण करनेकी प्रार्थना करते हुए आपके पास बैठे हैं॥ २२॥
हतशिष्टाश्च राजानः कृत्स्नं चैव समागतम्।
चातुर्वर्ण्यं महाराज राष्ट्रं ते कुरुजाङ्गलम्॥ २३॥
महाराज! मरनेसे बचे हुए राजालोग और चारों वर्णोंकी प्रजाओंसे युक्त यह सारा कुरुजाङ्गल देश इस समय आपकी सेवामें उपस्थित है॥ २३॥
प्रियार्थमपि चैतेषां ब्राह्मणानां महात्मनाम्।
नियोगादस्य च गुरोर्व्यासस्यामिततेजसः॥ २४॥
सुहृदामस्मदादीनां द्रौपद्याश्च परंतप।
कुरु प्रियममित्रघ्न लोकस्य च हितं कुरु॥ २५॥
शत्रुओंको मारने और संताप देनेवाले नरेश! इन महामना ब्राह्मणोंका प्रिय करनेके लिये भी आपको इनकी बात मान लेनी चाहिये। आप अमित तेजस्वी गुरुदेव व्यासकी आज्ञासे हम सुहृदोंका और द्रौपदीका प्रिय कीजिये तथा सम्पूर्ण जगत्‌के हितसाधनमें लग जाइये॥ २४-२५॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः स कृष्णेन राजा राजीवलोचनः।
हितार्थं सर्वलोकस्य समुत्तस्थौ महामनाः॥ २६॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कमलनयन महामनस्वी राजा युधिष्ठिर सम्पूर्ण जगत्‌के हितके लिये उठ खड़े हुए॥ २६॥
सोऽनुनीतो नरव्याघ्र विष्टरश्रवसा स्वयम्।
द्वैपायनेन च तथा देवस्थानेन जिष्णुना॥ २७॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिरनुनीतो युधिष्ठिरः।
व्यजहान्मानसं दुःखं संतापं च महायशाः॥ २८॥
पुरुषसिंह! साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण, द्वैपायन व्यास, देवस्थान, अर्जुन तथा अन्य बहुत-से लोगोंके समझाने-बुझाने पर महायशस्वी युधिष्ठिरने मानसिक दुःख और संतापको त्याग दिया॥ २७-२८॥
श्रुतवाक्यः श्रुतनिधिः श्रुतश्रव्यविशारदः।