महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमृतकोंके लिये जलांजलि देकर बैठे हुए धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके पास बहुतसे श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि सिद्ध महात्मा पधारे ॥ ३ ॥ द्वैपायनो नारदश्च देवलश्च महानृषिः । देवस्थानश्च कण्वश्च तेषां शिष्याश्च सत्तमाः ॥ ४ ॥ द्वैपायन व्यास, नारद, महर्षि देवल, देवस्थान, कण्व तथा उनके श्रेष्ठ शिष्य भी वहाँ आये थे ॥ ४ ॥ अन्ये च वेदविद्वांसः कृतप्रज्ञा द्विजातयः । गृहस्थाः स्नातकाः सन्तो ददृशः कुरुसत्तमम् ॥ ५ ॥ इनके अतिरिक्त अनेक वेदवेत्ता एवं पवित्र बुद्धिवाले ब्राह्मण, गृहस्थ एवं स्नातक संत भी वहाँ आकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे मिले ॥ ५ ॥ तेऽभिगम्य महात्मानः पूजिताश्च यथाविधि । आसनेषु महार्हेषु विविशुस्ते महर्षयः ॥ ६ ॥ वे महात्मा महर्षि वहाँ पहुँचकर विधिपूर्वक पूजित हो राजाके दिये हुए बहुमूल्य आसनोंपर विराजमान हुए ॥ ६ ॥ प्रतिगृह्य ततः पूजां तत्कालसदृशीं तदा । पर्युपासन् यथान्यायं परिवार्य युधिष्ठिरम् ॥ ७ ॥ पुण्ये भागीरथीतीरे शोकव्याकुलचेतसम् । आश्वासयन्तो राजानं विप्राः शतसहस्रशः ॥ ८ ॥ उस समयके अनुरूप पूजा स्वीकार करके वे सैकड़ों हजारों ब्रह्मर्षि भागीरथीके पावन तटपर शोकसे व्याकुलचित्त हुए राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर आश्वासन देते हुए यथोचितरूपसे उनके पास बैठे रहे ॥ ७-८ ॥ नारदस्त्वब्रवीत् काले धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । सम्भाष्य मुनिभिः सार्धं कृष्णद्वैपायनादिभिः ॥ ९ ॥ उस समय श्रीकृष्णद्वैपायन आदि मुनियोंके साथ बातचीत करके सबसे पहले नारदजीने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ९ ॥ भवता बाहुवीर्येण प्रसादान्माधवस्य च । जितेयमवनिः कृत्स्ना धर्मेण च युधिष्ठिर ॥ १० ॥ महाराज युधिष्ठिर! आपने अपने बाहुबल, भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा तथा धर्मके प्रभावसे इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय पायी है ॥ १० ॥ दिष्ट्या मुक्तस्तु संग्रामादस्माल्लोकभयंकरात् । क्षत्रधर्मरतश्चापि कच्चिन्मोदसि पाण्डव ॥ ११ ॥ 'पाण्डुनन्दन! सौभाग्यकी बात है कि आप सम्पूर्ण जगत्को भयमें डालनेवाले इस संग्रामसे छुटकारा पा गये। अब क्षत्रियधर्मके पालनमें तत्पर रहकर आप प्रसन्न तो हैं