भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 27

न? ॥ ११ ॥ कच्चिच्च निहतामित्रः प्रीणासि सुहृदो नृप । कच्चिच्छ्रियमिमां प्राप्य न त्वां शोकः प्रबाधते ॥ १२ ॥ ‘नरेश्वर! आपके शत्रु तो मारे जा चुके। अब आप अपने सुहृदोंको तो प्रसन्न रखते हैं न? इस राज्यलक्ष्मीको पाकर आपको कोई शोक तो नहीं सता रहा है?’ ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर उवाच विजितेयं मही कृत्स्ना कृष्णबाहुबलाश्रयात् । ब्राह्मणानां प्रसादेन भीमार्जुनबलेन च ॥ १३ ॥ युधिष्ठिर बोले—मुने! भगवान् श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेनेसे ब्राह्मणोंकी कृपा होनेसे तथा भीमसेन और अर्जुनके बलसे इस सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त हुई ॥ १३ ॥

इदं मम महद् दुःखं वर्तते हृदि नित्यदा । कृत्वा ज्ञातिक्षयमिमं महान्तं लोभकारितम् ॥ १४ ॥ परन्तु मेरे हृदयमें निरन्तर यह महान् दुःख बना रहता है कि मैंने लोभवश अपने बन्धु-बान्धवोंका महान् संहार करा डाला ॥ १४ ॥

सौभद्रं द्रौपदेयांश्च घातयित्वा सुतान् प्रियान् । जयोऽयमजयाकारो भगवन् प्रतिभाति मे ॥ १५ ॥ भगवन्! सुभद्राकुमार अभिमन्यु तथा द्रौपदीके प्यारे पुत्रोंको मरवाकर मिली हुई यह विजय भी मुझे पराजय-सी ही जान पड़ती है ॥ १५ ॥

किं नु वक्ष्यति वार्ष्णेयी वधूर्मे मधुसूदनम् । द्वारकावासिनी कृष्णमितः प्रतिगतं हरिम् ॥ १६ ॥ वृष्णिकुलकी कन्या मेरी बहू सुभद्रा, जो इस समय द्वारकामें रहती है, जब मधुसूदन श्रीकृष्ण यहाँसे लौटकर द्वारका जायँगे, तब इनसे क्या कहेगी? ॥ १६ ॥

द्रौपदी हतपुत्रेयं कृपणा हतबान्धवा । अस्मत्प्रियहिते युक्ता भूयः पीडयतीव माम् ॥ १७ ॥ यह द्रुपदकुमारी कृष्णा अपने पुत्रोंके मारे जानेसे अत्यन्त दीन हो गयी है। इस बेचारीके भाई-बन्धु भी मार डाले गये। यह हमलोगोंके प्रिय और हितमें सदा लगी रहती है। मैं जब-जब इसकी ओर देखता हूँ तब-तब मेरे मनमें अधिक-से-अधिक पीड़ा होने लगती है॥

इद्मन्यत् तु भगवन् यत् त्वां वक्ष्यामि नारद । मन्त्रसंवरणेनास्मि कुन्त्या दुःखेन योजितः ॥ १८ ॥ भगवन् नारद! यह दूसरी बात जो मैं आपसे बता रहा हूँ और भी दुःख देनेवाली है। मेरी माता कुन्तीने कर्णके जन्मका रहस्य छिपाकर मुझे बड़े भारी दुःखमें डाल दिया

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