महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 28, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै ॥ १८ ॥ यः स नागायुतबलो लोकेऽप्रतिरथो रणे । सिंहखेलगतिर्धीमान् घृणी दाता यतव्रतः ॥ १९ ॥ आश्रयो धार्तराष्ट्राणां मानी तीक्ष्णपराक्रमः । अमर्षी नित्यसंरम्भी क्षेप्तास्माकं रणे रणे ॥ २० ॥ शीघ्रास्त्रश्चित्रयोधी च कृती चाद्भुतविक्रमः । गूढोत्पन्नः सुतः कुन्त्या भ्रातास्माकमसौ किल ॥ २१ ॥ जिनमें दस हजार हाथियोंका बल था, संसारमें जिनका सामना करनेवाला दूसरा कोई भी महारथी नहीं था, जो रणभूमिमें सिंहके समान खेलते हुए विचरते थे, जो बुद्धिमान्, दयालु, दाता, संयमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले और धृतराष्ट्रपुत्रोंके आश्रय थे; अभिमानी, तीव्रपराक्रमी, अमर्षशील, नित्य रोषमें भरे रहनेवाले तथा प्रत्येक युद्धमें हमलोगोंपर अस्त्रों एवं वाग्बाणोंका प्रहार करनेवाले थे, जिनमें विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेकी कला थी, जो शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले, धनुर्वेदके विद्वान् तथा अद्भुत पराक्रम कर दिखानेवाले थे, वे कर्ण गुप्तरूपसे उत्पन्न हुए कुन्तीके पुत्र और हमलोगोंके बड़े भाई थे; यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ १९—२१ ॥ तोयकर्मणि तं कुन्ती कथयामास सूर्यजम् । पुत्रं सर्वगुणोपेतमवकीर्णं जले पुरा ॥ २२ ॥ जलदान करते समय स्वयं माता कुन्तीने यह रहस्य बताया था कि कर्ण भगवान् सूर्यके अंशसे उत्पन्न हुआ मेरा ही सर्वगुणसम्पन्न पुत्र रहा है, जिसे मैंने पहले पानीमें बहा दिया था ॥ २२ ॥ मञ्जूषायां समाधाय गङ्गास्रोतस्यमज्जयत् । यं सूतपुत्रं लोकोऽयं राधेयं चाभ्यमन्यत ॥ २३ ॥ स ज्येष्ठपुत्रः कुन्त्या वै भ्रातास्माकं च मातृजः । नारदजी! मेरी माता कुन्तीने कर्णको जन्मके पश्चात् एक पेटीमें रखकर गङ्गाजीकी धारामें बहाया था। जिन्हें यह सारा संसार अबतक अधिरथ सूत एवं राधाका पुत्र समझता था, वे कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्र और हमलोगोंके सहोदर भाई थे ॥ २३ १/२ ॥ अजानता मया भ्रात्रा राज्यलुब्धेन घातितः ॥ २४ ॥ तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः । मैंने अनजानमें राज्यके लोभमें आकर भाईके हाथसे ही भाईका वध करा दिया। इस बातकी चिन्ता मेरे अंगोंको उसी प्रकार जला रही है, जैसे आग रूईके ढेरको भस्म कर देती है ॥ २४ १/२ ॥ न हि तं वेद पार्थोऽपि भ्रातरं श्वेतवाहनः ॥ २५ ॥ नाहं न भीमो न यमौ स त्वस्मान् वेद सुव्रतः ।