महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुन्तीनन्दन श्वेतवाहन अर्जुन भी उन्हें भाईके रूपमें नहीं जानते थे। मुझको, भीमसेनको तथा नकुल-सहदेवको भी इस बातका पता नहीं था; किंतु उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कर्ण हमें अपने भाईके रूपमें जानते थे॥ २५ १/२॥ गता किल पृथा तस्य सकाशमिति नः श्रुतम्॥ २६॥ अस्माकं शमकामा वै त्वं च पुत्रो ममेत्यथ। पृथाया न कृतः कामस्तेन चापि महात्मना॥ २७॥ सुननेमें आया है कि मेरी माता कुन्ती हमलोगोंमें संधि करानेकी इच्छासे उनके पास गयी थीं और उन्हें बताया था कि ‘तुम मेरे पुत्र हो।’ परन्तु महामनस्वी कर्णने माता कुन्तीकी यह इच्छा पूरी नहीं की॥ २६-२७॥ अपि पश्चादिदं मातर्यवोचदिति नः श्रुतम्। न हि शक्ष्याम्यहं त्यक्तुं नृपं दुर्योधनं रणे॥ २८॥ अनार्यत्वं नृशंसत्वं कृतघ्नत्वं च मे भवेत्। हमने यह भी सुना है कि उन्होंने पीछे माता कुन्तीको यह जवाब दिया कि ‘मैं युद्धके समय राजा दुर्योधनका साथ नहीं छोड़ सकता; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरी नीचता, क्रूरता और कृतघ्नता सिद्ध होगी॥ २८ १/२॥ युधिष्ठिरेण संधिं हि यदि कुर्यां मते तव॥ २९॥ भीतो रणे श्वेतवाहादिति मां मंस्यते जनः। ‘माताजी! यदि तुम्हारे मतके अनुसार मैं इस समय युधिष्ठिरके साथ संधि कर लूँ तो सब लोग यही समझेंगे कि ‘कर्ण युद्धमें अर्जुनसे डर गया’॥ २९ १/२॥ सोऽहं निर्जित्य समरे विजयं सहकेशवम्॥ ३०॥ संधास्ये धर्मपुत्रेण पश्चादिति च सोऽब्रवीत्। ‘अतः मैं पहले समरांगणमें श्रीकृष्णसहित अर्जुनको परास्त करके पीछे धर्मपुत्र युधिष्ठिरके साथ संधि करूँगा’ ऐसी बात उन्होंने कही॥ ३० १/२॥ तमुवाच किल पृथा पुनः पृथुलवक्षसम्॥ ३१॥ चतुर्णामभयं देहि कामं युध्यस्व फाल्गुनम्। तब कुन्तीने चौड़ी छातीवाले कर्णसे फिर कहा—‘बेटा! तुम इच्छानुसार अर्जुनसे युद्ध करो; किंतु अन्य चार भाइयोंको अभय दे दो’॥ ३१ १/२॥ सोऽब्रवीन्मातरं धीमान् वेपमानां कृताञ्जलिः॥ ३२॥ प्राप्तान् विषह्यांश्चतुरो न हनिष्यामि ते सुतान्। पञ्चैव हि सुता देवि भविष्यन्ति तव ध्रुवाः॥ ३३॥ सार्जुना वा हते कर्णे सकर्णा वा हतेऽर्जुने।