भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

प्रतिपेदे महाबाहुर्मन्दिरं मघवानिव ।। ७ ।। तदनन्तर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे भाई युधिष्ठिरने दुर्योधनका महल भीमसेनको अर्पित किया। वह बहुत-सी अट्टालिकाओंसे सुशोभित था। वहाँ अनेक प्रकारके रत्नोंका भण्डार पड़ा था और बहुत-सी दास-दासियाँ सेवाके लिये प्रस्तुत थीं। जैसे इन्द्र अपने भवनमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार महाबाहु भीमसेन उस महलमें चले गये ।। ६-७ ।।

यथा दुर्योधनगृहं तथा दुःशासनस्य तु । प्रासादमालासंयुक्तं हेमतोरणभूषितम् ।। ८ ।। दासीदाससुसम्पूर्णं प्रभूतधनधान्यवत् । प्रतिपेदे महाबाहुरर्जुनो राजशासनात् ।। ९ ।। जैसा दुर्योधनका भवन सजा हुआ था, वैसा ही दुःशासनका भी था। उसमें भी प्रासादमालाएँ शोभा दे रही थीं। वह सोनेकी बंदनवारोंसे सजाया गया था। प्रचुर धन-धान्य तथा दास-दासियोंसे भरा-पूरा था। राजाकी आज्ञासे वह भवन महाबाहु अर्जुनको मिला ।। ८-९ ।।

दुर्मर्षणस्य भवनं दुःशासनगृहाद् वरम् । कुबेरभवनप्रख्यं मणिहेमविभूषितम् ।। १० ।। दुर्मर्षणका महल तो दुःशासनके घरसे भी सुन्दर था। उसे सोने और मणियोंसे सजाया गया था; अतः वह कुबेरके राजभवनकी भाँति प्रकाशित होता था ।। १० ।।

नकुलाय वराहाय कर्शिताय महावने । ददौ प्रीतो महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ११ ।। महाराज! धर्मपुत्र युधिष्ठिरने अत्यन्त प्रसन्न होकर महान् वनमें कष्ट उठाये हुए, वर पानेके अधिकारी नकुलको दुर्मर्षणका वह सुन्दर भवन प्रदान किया ।। ११ ।।

दुर्मुखस्य च वेश्माग्र्यं श्रीमत् कनकभूषणम् । पूर्णपद्मदलाक्षीणां स्त्रीणां शयनसंकुलम् ।। १२ ।। प्रददौ सहदेवाय संततं प्रियकारिणे । मुमुदे तच्च लब्ध्वासौ कैलासं धनदो यथा ।। १३ ।। दुर्मुखका श्रेष्ठ भवन तो और भी सुन्दर था। उसे सुवर्णसे सुसज्जित किया गया था। खिले हुए कमलदलके समान नेत्रोंवाली सुन्दर स्त्रियोंकी शय्याओंसे भरा हुआ वह भवन युधिष्ठिरने सदा अपना प्रिय करनेवाले सहदेवको दिया। जैसे कुबेर कैलासको पाकर संतुष्ट हुए थे, उसी प्रकार उस सुन्दर महलको पाकर सहदेवको बड़ी प्रसन्नता हुई ।। १२-१३ ।।

युयुत्सुर्विदुरश्चैव संजयश्च विशाम्पते । सुधर्मा चैव धौम्यश्च यथास्वान् जग्मुरालयान् ।। १४ ।। प्रजानाथ! युयुत्सु, विदुर, संजय, सुधर्मा और धौम्य मुनि भी अपने-अपने पहलेके ही घरोंमें गये ।। १४ ।।