महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रतिपेदे महाबाहुर्मन्दिरं मघवानिव ।। ७ ।। तदनन्तर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे भाई युधिष्ठिरने दुर्योधनका महल भीमसेनको अर्पित किया। वह बहुत-सी अट्टालिकाओंसे सुशोभित था। वहाँ अनेक प्रकारके रत्नोंका भण्डार पड़ा था और बहुत-सी दास-दासियाँ सेवाके लिये प्रस्तुत थीं। जैसे इन्द्र अपने भवनमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार महाबाहु भीमसेन उस महलमें चले गये ।। ६-७ ।।
यथा दुर्योधनगृहं तथा दुःशासनस्य तु । प्रासादमालासंयुक्तं हेमतोरणभूषितम् ।। ८ ।। दासीदाससुसम्पूर्णं प्रभूतधनधान्यवत् । प्रतिपेदे महाबाहुरर्जुनो राजशासनात् ।। ९ ।। जैसा दुर्योधनका भवन सजा हुआ था, वैसा ही दुःशासनका भी था। उसमें भी प्रासादमालाएँ शोभा दे रही थीं। वह सोनेकी बंदनवारोंसे सजाया गया था। प्रचुर धन-धान्य तथा दास-दासियोंसे भरा-पूरा था। राजाकी आज्ञासे वह भवन महाबाहु अर्जुनको मिला ।। ८-९ ।।
दुर्मर्षणस्य भवनं दुःशासनगृहाद् वरम् । कुबेरभवनप्रख्यं मणिहेमविभूषितम् ।। १० ।। दुर्मर्षणका महल तो दुःशासनके घरसे भी सुन्दर था। उसे सोने और मणियोंसे सजाया गया था; अतः वह कुबेरके राजभवनकी भाँति प्रकाशित होता था ।। १० ।।
नकुलाय वराहाय कर्शिताय महावने । ददौ प्रीतो महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। ११ ।। महाराज! धर्मपुत्र युधिष्ठिरने अत्यन्त प्रसन्न होकर महान् वनमें कष्ट उठाये हुए, वर पानेके अधिकारी नकुलको दुर्मर्षणका वह सुन्दर भवन प्रदान किया ।। ११ ।।
दुर्मुखस्य च वेश्माग्र्यं श्रीमत् कनकभूषणम् । पूर्णपद्मदलाक्षीणां स्त्रीणां शयनसंकुलम् ।। १२ ।। प्रददौ सहदेवाय संततं प्रियकारिणे । मुमुदे तच्च लब्ध्वासौ कैलासं धनदो यथा ।। १३ ।। दुर्मुखका श्रेष्ठ भवन तो और भी सुन्दर था। उसे सुवर्णसे सुसज्जित किया गया था। खिले हुए कमलदलके समान नेत्रोंवाली सुन्दर स्त्रियोंकी शय्याओंसे भरा हुआ वह भवन युधिष्ठिरने सदा अपना प्रिय करनेवाले सहदेवको दिया। जैसे कुबेर कैलासको पाकर संतुष्ट हुए थे, उसी प्रकार उस सुन्दर महलको पाकर सहदेवको बड़ी प्रसन्नता हुई ।। १२-१३ ।।
युयुत्सुर्विदुरश्चैव संजयश्च विशाम्पते । सुधर्मा चैव धौम्यश्च यथास्वान् जग्मुरालयान् ।। १४ ।। प्रजानाथ! युयुत्सु, विदुर, संजय, सुधर्मा और धौम्य मुनि भी अपने-अपने पहलेके ही घरोंमें गये ।। १४ ।।
सह सात्यकिना शौरिरर्जुनस्य निवेशनम् । विवेश पुरुषव्याघ्रो व्याघ्रो गिरिगुहामिव ॥ १५ ॥ जैसे व्याघ्र पर्वतकी कन्दरामें प्रवेश करता है, उसी प्रकार सात्यकिसहित पुरुषसिंह श्रीकृष्णने अर्जुनके महलमें पदार्पण किया ॥ १५ ॥ तत्र भक्ष्यान्नपानैस्ते मुदिताः सुसुखोषितः । सुखप्रबुद्धा राजानमुपतस्थुर्युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥ वहाँ अपने-अपने स्थानोंपर खान-पानसे संतुष्ट हो वे सब लोग रातभर बड़े सुखसे सोये और सबेरे उठकर राजा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हो गये ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि गृहविभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें गृहोंका विभाजनविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
प्राप्य राज्यं महाबाहुर्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन
जनमेजय उवाच
प्राप्य राज्यं महाबाहुर्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
यदन्यदकरोद् विप्र तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**विप्रवर! राज्य पानेके पश्चात् धर्मपुत्र महाबाहु युधिष्ठिरने और कौन-कौन-सा कार्य किया था? यह मुझे बतानेकी कृपा करें? ॥ १ ॥
भगवान् वा हृषीकेशस्त्रैलोक्यस्य परो गुरुः ।
ऋषे यदकरोद् वीरस्तच्च व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥
महर्षे! तीनों लोकोंके परम गुरु वीरवर भगवान् श्रीकृष्णने भी क्या-क्या किया था? यह भी विस्तारपूर्वक बतावें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु तत्त्वेन राजेन्द्र कीर्त्यमानं मयानघ ।
वासुदेवं पुरस्कृत्य यदकुर्वत पाण्डवाः ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**निष्पाप नरेश! भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके पाण्डवोंने जो कुछ किया था, उसे ठीक-ठीक बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ३ ॥
प्राप्य राज्यं महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
चातुर्वर्ण्यं यथायोग्यं स्वे स्वे स्थाने न्यवेशयत् ॥ ४ ॥
महाराज! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने राज्य प्राप्त करनेके बाद सबसे पहले चारों वर्णोंको योग्यतानुसार अपने-अपने स्थान (कर्तव्यपालन) में स्थिर किया ॥ ४ ॥
ब्राह्मणानां सहस्रं च स्नातकानां महात्मनाम् ।
सहस्रं निष्कमैकैकं दापयामास पाण्डवः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् सहस्रों महामना स्नातक ब्राह्मणोंमेंसे प्रत्येकको पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने एक-एक हजार स्वर्णमुद्राएँ दिलवायीं ॥ ५ ॥
तथाऽनुजीविनो भृत्यान् संश्रितानतिथीनपि ।
कामैः संतर्पयामास कृपणांस्तर्ककानपि ॥ ६ ॥
इसी तरह जिनकी जीविकाका भार उन्हींके ऊपर था, उन भृत्यों, शरणागतों तथा अतिथियोंको उन्होंने इच्छानुसार भोग्यपदार्थ देकर संतुष्ट किया। दीन-दुखियों तथा पूछे हुए
प्रश्नोंका उत्तर देनेवाले ज्योतिषियोंको भी संतुष्ट किया ॥ ६ ॥ पुरोहिताय धौम्याय प्रादादयुतः स गाः । धनं सुवर्णं रजतं वासांसि विविधान्यपि ॥ ७ ॥ अपने पुरोहित धौम्यजीको उन्होंने दस हजार गौएँ, धन, सोना, चाँदी तथा नाना प्रकारके वस्त्र दिये ॥ ७ ॥ कृपाय च महाराज गुरुवृत्तिमवर्तत । विदुराय च राजासौ पूजां चक्रे यतव्रतः ॥ ८ ॥ महाराज! राजाने कृपाचार्यके साथ वही बर्ताव किया, जो एक शिष्यको अपने गुरुके साथ करना चाहिये। नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले युधिष्ठिरजीने विदुरजीका भी पूजनीय पुरुषकी भाँति सम्मान किया ॥ ८ ॥ भक्ष्यान्नपानैर्विविधैर्वासोभिः शयनासनैः । सर्वान् संतोषयामास संश्रितान् ददतां वरः ॥ ९ ॥ दाताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने समस्त आश्रित जनोंको खाने-पीनेकी वस्तुएँ, भाँति-भाँतिके कपड़े, शय्या तथा आसन देकर संतुष्ट किया ॥ ९ ॥ लब्धप्रशमनं कृत्वा स राजा राजसत्तम । युयुत्सोर्धार्तराष्ट्रस्य पूजां चक्रे महायशाः ॥ १० ॥ धृतराष्ट्राय तद् राज्यं गान्धार्यै विदुराय च । निवेद्य सुस्थवद् राजा सुखमास्ते युधिष्ठिरः ॥ ११ ॥ नृपश्रेष्ठ! महायशस्वी राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार प्राप्त हुए धनका यथोचित विभाग करके उसकी शान्ति की तथा युयुत्सु एवं धृतराष्ट्रका विशेष सत्कार किया। धृतराष्ट्र, गान्धारी तथा विदुरजीकी सेवामें अपना सारा राज्य समर्पित करके राजा युधिष्ठिर स्वस्थ एवं सुखी हो गये ॥ १०-११ ॥ तथा सर्वं स नगरं प्रसाद्य भरतर्षभ । वासुदेवं महात्मानमभ्यगच्छत् कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥ भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार सम्पूर्ण नगरकी प्रजाको प्रसन्न करके वे हाथ जोड़कर महात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके पास गये ॥ १२ ॥ ततो महति पर्यङ्के मणिकाञ्चनभूषिते । ददर्श कृष्णमासीनं नीलमेघसमद्युतिम् ॥ १३ ॥ जाज्वल्यमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् । पीतकौशेयवसनं हेम्नेवोपगतं मणिम् ॥ १४ ॥ उन्होंने देखा, भगवान् श्रीकृष्ण मणियों तथा सुवर्णसे भूषित एक बड़े पलंगपर बैठे हैं, उनकी श्याम सुन्दर छवि नील मेघके समान सुशोभित हो रही है। उनका श्रीविग्रह दिव्य तेजसे उद्भासित हो रहा है। एक-एक अङ्ग दिव्य आभूषणोंसे विभूषित है। श्याम शरीरपर
रेशमी पीताम्बर धारण किये भगवान् सुवर्णजटित नीलमके समान जान पड़ते हैं॥ १३-१४॥ कौस्तुभेनोरसिस्थेन मणिनाभिविराजितम्। उद्यतेवोदयं शैलं सूर्येणाभिविराजितम्॥ १५॥ उनके वक्षःस्थलपर स्थित हुई कौस्तुभमणि अपना प्रकाश बिखेरती हुई उसी प्रकार उनकी शोभा बढ़ाती है, मानो उगते हुए सूर्य उदयाचलको प्रकाशित कर रहे हों॥ १५॥ नौपम्यं विद्यते तस्य त्रिषु लोकेषु किंचन। सोऽभिगम्य महात्मानं विष्णुं पुरुषविग्रहम्॥ १६॥ उवाच मधुरं राजा स्मितपूर्वमिदं तदा। भगवान्की उस दिव्य झाँकीकी तीनों लोकोंमें कहीं उपमा नहीं थी। राजा युधिष्ठिर मानवविग्रहधारी उन परमात्मा विष्णुके समीप जाकर मुसकराते हुए मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले—॥ १६ १/२॥ सुखेन ते निशा कच्चिद् व्युष्टा बुद्धिमतां वर॥ १७॥ कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत। ‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अच्युत! आपकी रात सुखसे बीती है न? सारी ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न तो हैं न?॥ १७ १/२॥ तथैवोपाश्रिता देवी बुद्धिर्बुद्धिमतां वर॥ १८॥ वयं राज्यमनुप्राप्ताः पृथिवी च वशे स्थिता। तव प्रसादाद् भगवंस्त्रिलोकगतिविक्रम॥ १९॥ जयं प्राप्ता यशश्चाग्र्यं न च धर्मच्युता वयम्। ‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! बुद्धिदेवीने आपका आश्रय लिया है न? प्रभो! हमने आपकी ही कृपासे राज्य पाया है और यह पृथ्वी हमारे अधिकारमें आयी है। भगवन्! आप ही तीनों लोकोंके आश्रय और पराक्रम हैं। आपकी ही दयासे हमने विजय तथा उत्तम यश प्राप्त किये हैं और धर्मसे भ्रष्ट नहीं हुए हैं’॥ १८-१९ १/२॥ तं तथा भाषमाणं तु धर्मराजमरिंदमम्। नोवाच भगवान् किंचिद् ध्यानमेवान्वपद्यत॥ २०॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रकार कहते चले जा रहे थे; परंतु भगवान्ने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। वे उस समय ध्यानमें मग्न थे॥ २०॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कृष्णं प्रति युधिष्ठिरवाक्ये पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्णके प्रति युधिष्ठिरका वचनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥
युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवाद, श्रीकृष्णद्वारा भीष्मकी प्रशंसा और युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवाद, श्रीकृष्णद्वारा भीष्मकी प्रशंसा और युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश
युधिष्ठिर उवाच
किमिदं परमाश्चर्यं ध्यायस्यमितविक्रम ।
कच्चिल्लोकत्रयस्यास्य स्वस्ति लोकपरायण ॥ १ ॥
चतुर्थं ध्यानमार्गं त्वालम्ब्य पुरुषर्षभ ।
अपक्रान्तो यतो देवस्तेन मे विस्मितं मनः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— अमितपराक्रमी, जगत्के आश्रयदाता पुरुषोत्तम! आप यह किसका ध्यान कर रहे हैं? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! इस त्रिलोकीका कुशल तो है न? आप तो जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंसे परे तुरीय ध्यानमार्गका आश्रय लेकर स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे ऊपर उठ गये हैं। इससे मेरे मनको बड़ा आश्चर्य हो रहा है ॥ १-२ ॥
निगृहीतो हि वायुस्ते पञ्चकर्मा शरीरगः ।
इन्द्रियाणि प्रसन्नानि मनसि स्थापितानि ते ॥ ३ ॥
आपके शरीरमें रहनेवाली और श्वास-प्रश्वास आदि पाँच कर्म करनेवाली प्राणवायु अवरुद्ध हो गयी है। आपने अपनी प्रसन्न इन्द्रियोंको मनमें स्थापित कर दिया है ॥ ३ ॥
वाक् च सत्त्वं च गोविन्द बुद्धौ संवेशितानि ते ।
सर्वे चैव गुणा देवाः क्षेत्रज्ञे ते निवेशिताः ॥ ४ ॥
गोविन्द! मन तथा वाक् आदि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ आपके द्वारा बुद्धिमें लीन कर दी गयी हैं। समस्त गुणोंको और इन्द्रियोंके अनुग्राहक देवताओंको आपने क्षेत्रज्ञ आत्मामें स्थापित कर दिया है ॥ ४ ॥
नेङ्गन्ति तव रोमाणि स्थिरा बुद्धिस्तथा मनः ।
काष्ठकुड्यशिलाभूतो निरीहश्चासि माधव ॥ ५ ॥
आपके रोंगटे खड़े हो गये हैं। जरा भी हिलते नहीं हैं। बुद्धि तथा मन भी स्थिर हैं। माधव! आप काठ, दीवार और पत्थरकी तरह निश्चेष्ट हो गये हैं ॥ ५ ॥
यथा दीपो निवातस्थो निरिङ्गो ज्वलते पुनः ।
तथासि भगवन् देव पाषाण इव निश्चलः ॥ ६ ॥
भगवन्! देवदेव! जैसे वायुशून्य स्थानमें रखे हुए दीपककी लौ काँपती नहीं, एकतार जलती रहती है, उसी तरह आप भी स्थिर हैं मानो पाषाणकी मूर्ति हों ॥
यदि श्रोतुमिहार्हामि न रहस्यं च ते यदि । छिन्धि मे संशयं देव प्रपन्नायाभियाचते ॥ ७ ॥ देव! यदि मैं सुननेका अधिकारी होऊँ और यदि यह आपका कोई गोपनीय रहस्य न हो तो मेरे इस संशयका निवारण कीजिये; इसके लिये मैं आपकी शरणमें आकर बारंबार याचना करता हूँ ॥ ७ ॥
त्वं हि कर्ता विकर्ता च क्षरं चैवाक्षरं च हि । अनादिनिधनश्चाद्यस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥ ८ ॥ पुरुषोत्तम! आप ही इस जगत्को बनाने और विलीन करनेवाले हैं। आप ही क्षर और अक्षर पुरुष हैं। आपका न आदि है और न अन्त। आप ही सबके आदि कारण हैं ॥ ८ ॥
त्वत्प्रपन्नाय भक्ताय शिरसा प्रणताय च । ध्यानस्यास्य यथा तत्त्वं ब्रूहि धर्मभृतां वर ॥ ९ ॥ मैं आपकी शरणमें आया हुआ भक्त हूँ और माथा टेककर आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रभो! इस ध्यानका यथार्थ तत्त्व मुझे बता दीजिये ॥
ततः स्वे गोचरे न्यस्य मनोबुद्धीन्द्रियाणि सः । स्मितपूर्वमुवाचेदं भगवान् वासवानुजः ॥ १० ॥ युधिष्ठिरकी यह प्रार्थना सुनकर मन, बुद्धि तथा इन्द्रियोंको अपने स्थानमें स्थापित करके इन्द्रके छोटे भाई भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए इस प्रकार बोले ॥ १० ॥
अध्याय (पृष्ठ 295)
वासुदेव उवाच
शरत्तल्पगतो भीष्मः शाम्यन्निव हुताशनः ।
मां ध्याति पुरुषव्याघ्रस्ततो मे तद्गतं मनः ॥ ११ ॥
श्रीकृष्णने कहा— राजन्! बाण-शय्यापर पड़े हुए पुरुषसिंह भीष्म, जो इस समय बुझती हुई आगके समान हो रहे हैं, मेरा ध्यान कर रहे हैं; इसलिये मेरा मन भी उन्हींमें लगा हुआ है ॥ ११ ॥
यस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।
न सेहे देवराजोऽपि तमस्मि मनसा गतः ॥ १२ ॥
बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान जिनके धनुषकी टंकारको देवराज इन्द्र भी नहीं सह सके थे, उन्हीं भीष्मके चिन्तनमें मेरा मन लगा हुआ है ॥ १२ ॥
येनाभिजित्य तरसा समस्तं राजमण्डलम् ।
ऊढास्तिस्रस्तु ताः कन्यास्तमस्मि मनसा गतः ॥ १३ ॥
जिन्होंने काशीपुरीमें समस्त राजाओंके समुदायको वेगपूर्वक परास्त करके काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण किया था, उन्हीं भीष्मके पास मेरा मन चला गया है ॥ १३ ॥
त्रयोविंशतिरात्रं यो योधयामास भार्गवम् ।
न च रामेण निस्तीर्णस्तमस्मि मनसा गतः ॥ १४ ॥
जो लगातार तेईस दिनोंतक भृगुनन्दन परशुरामजीके साथ युद्ध करते रहे, तो भी परशुरामजी जिन्हें परास्त न कर सके, उन्हीं भीष्मके पास मैं मनके द्वारा पहुँच गया था ॥ १४ ॥
एकीकृत्येन्द्रियग्रामं मनः संयम्य मेधया ।
शरणं मामुपागच्छत् ततो मे तद्गतं मनः ॥ १५ ॥
वे भीष्मजी अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी वृत्तियोंको एकाग्रकर बुद्धिके द्वारा मनका संयम करके मेरी शरणमें आ गये थे; इसीलिये मेरा मन भी उन्हींमें जा लगा था ॥ १५ ॥
यं गङ्गा गर्भविधिना धारयामास पार्थिव ।
वसिष्ठशिक्षितं तात तमस्मि मनसा गतः ॥ १६ ॥
तात! भूपाल! जिन्हें गङ्गादेवीने विधिपूर्वक अपने गर्भमें धारण किया था और जिन्हें महर्षि वसिष्ठके द्वारा वेदोंकी शिक्षा प्राप्त हुई थी, उन्हीं भीष्मजीके पास मैं मन-ही-मन पहुँच गया था ॥ १६ ॥
दिव्यास्त्राणि महातेजा यो धारयति बुद्धिमान् ।
साङ्गांश्च चतुरो वेदांस्तमस्मि मनसा गतः ॥ १७ ॥
जो महातेजस्वी बुद्धिमान् भीष्म दिव्यास्त्रों तथा अंगोंसहित चारों वेदोंको धारण करते हैं, उन्हींके चिन्तनमें मेरा मन लगा हुआ था ॥ १७ ॥
रामस्य दयितं शिष्यं जामदग्न्यस्य पाण्डव । आधारं सर्वविद्यानां तमस्मि मनसा गतः ॥ १८ ॥ पाण्डुकुमार! जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीके प्रिय शिष्य तथा सम्पूर्ण विद्याओंके आधार हैं, उन्हीं भीष्मजीका मैं मन-ही-मन चिन्तन करता था ॥ १८ ॥
स हि भूतं भविष्यच्च भवच्च भरतर्षभ । वेत्ति धर्मविदां श्रेष्ठं तमस्मि मनसा गतः ॥ १९ ॥ भरतश्रेष्ठ! वे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंकी बातें जानते हैं। धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ उन्हीं भीष्मका मैं मन-ही-मन चिन्तन करने लगा था ॥ १९ ॥
तस्मिन् हि पुरुषव्याघ्रे कर्मभिः स्वैर्दिवं गते । भविष्यति मही पार्थ नष्टचन्द्रेव शर्वरी ॥ २० ॥ पार्थ! जब पुरुषसिंह भीष्म अपने कर्मोंके अनुसार स्वर्गलोकमें चले जायँगे, उस समय यह पृथ्वी अमावास्याकी रात्रिके समान श्रीहीन हो जायगी ॥ २० ॥
तद् युधिष्ठिर गाङ्गेयं भीष्मं भीमपराक्रमम् । अभिगम्योपसंगृह्य पृच्छ यत् ते मनोगतम् ॥ २१ ॥ अतः महाराज युधिष्ठिर! आप भयानक पराक्रमी गंगानन्दन भीष्मके पास चलकर उनके चरणोंमें प्रणाम कीजिये और आपके मनमें जो संदेह हो उसे पूछिये ॥ २१ ॥
चातुर्विद्यं चातुर्होत्रं चातुराश्रम्यमेव च । राजधर्मांश्च निखिलान् पृच्छैनं पृथिवीपते ॥ २२ ॥ पृथिवीनाथ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों विद्याओंको, होता, उद्गाता, ब्रह्मा और अध्वर्युसे सम्बन्ध रखनेवाले यज्ञादि कर्मोंको, चारों आश्रमोंके धर्मोंको तथा सम्पूर्ण राजधर्मोंको उनसे पूछिये ॥ २२ ॥
तस्मिन्नस्तमिते भीष्मे कौरवाणां धुरंधरे । ज्ञानान्यस्तं गमिष्यन्ति तस्मात् त्वां चोदयाम्यहम् ॥ २३ ॥ कौरववंशका भार सँभालनेवाले भीष्मरूपी सूर्य जब अस्त हो जायँगे, उस समय सब प्रकारके ज्ञानोंका प्रकाश नष्ट हो जायगा; इसलिये मैं आपको वहाँ चलनेके लिये कहता हूँ ॥ २३ ॥
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथ्यं वचनमुत्तमम् । साश्रुकण्ठः स धर्मज्ञो जनार्दनमुवाच ह ॥ २४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका वह उत्तम और यथार्थ वचन सुनकर धर्मज्ञ युधिष्ठिरका गला भर आया और वे आँसू बहाते हुए वहाँ श्रीकृष्णसे कहने लगे— ॥ २४ ॥
यद् भवानाह भीष्मस्य प्रभावं प्रति माधव । तथा तन्नात्र संदेहो विद्यते मम माधव ॥ २५ ॥
‘माधव! भीष्मजीके प्रभावके विषयमें आप जैसा कहते हैं, वह सब ठीक है। उसमें मुझे भी संदेह नहीं है ॥ २५ ॥ महाभाग्यं च भीष्मस्य प्रभावश्च महाद्युते । श्रुतं मया कथयतां ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥ २६ ॥ ‘महातेजस्वी केशव! मैंने महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे भी भीष्मजीके महान् सौभाग्य और प्रभावका वर्णन सुना है ॥ २६ ॥ भवांश्च कर्ता लोकानां यद् ब्रवीत्यरिसूदन । तथा तदनभिध्येयं वाक्यं यादवनन्दन ॥ २७ ॥ ‘शत्रुसूदन! यादवनन्दन! आप सम्पूर्ण जगत्के विधाता हैं। आप जो कुछ कह रहे हैं, उसमें भी सोचने-विचारनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २७ ॥ यदि त्वनुग्रहवती बुद्धिस्ते मयि माधव । त्वामग्रतः पुरस्कृत्य भीष्मं यास्यामहे वयम् ॥ २८ ॥ ‘माधव! यदि आपका विचार मेरे ऊपर अनुग्रह करनेका है तो हमलोग आपको ही आगे करके भीष्मजीके पास चलेंगे ॥ २८ ॥ आवृत्ते भगवत्यर्के स हि लोकान् गमिष्यति । त्वद्दर्शनं महाबाहो तस्मादर्हति कौरवः ॥ २९ ॥ ‘महाबाहो! सूर्यके उत्तरायण होते ही कुरुकुलभूषण भीष्म देवलोकको चले जायँगे; अतः उन्हें आपका दर्शन अवश्य प्राप्त होना चाहिये ॥ २९ ॥ तव चाद्यस्य देवस्य क्षरस्यैवाक्षरस्य च । दर्शनं त्वस्य लाभः स्यात् त्वं हि ब्रह्ममयो निधिः ॥ ३० ॥ ‘आप आदिदेव तथा क्षर-अक्षर पुरुष हैं। आपका दर्शन उनके लिये महान् लाभकारी होगा; क्योंकि आप ब्रह्ममयी निधि हैं’ ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वैवं धर्मराजस्य वचनं मधुसूदनः । पार्श्वस्थं सात्यकिं प्राह रथो मे युज्यतामिति ॥ ३१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! धर्मराजका यह वचन सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्णने पास ही खड़े हुए सात्यकिसे कहा—‘मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाय’ ॥ ३१ ॥ सात्यकिस्त्वाशु निष्क्रम्य केशवस्य समीपतः । दारुकं प्राह कृष्णस्य युज्यतां रथ इत्युत ॥ ३२ ॥ आज्ञा पाते ही सात्यकि श्रीकृष्णके पाससे तुरंत बाहर निकल गये और दारुकसे बोले—‘भगवान् श्रीकृष्णका रथ तैयार करो’ ॥ ३२ ॥ स सात्यकेराशु वचो निशम्य
रथोत्तमं काञ्चनभूषिताङ्गम् ।
मसारगल्वर्कमयैर्विभङ्गैर-
विभूषितं हेमनिबद्धचक्रम् ॥ ३३ ॥
दिवाकरांशुप्रभमाशुगामिनं
विचित्रनानामणिभूषितान्तरम् ।
नवोदितं सूर्यमिव प्रतापिनं
विचित्रतार्क्ष्यध्वजिनं पताकिनम् ॥ ३४ ॥
सुग्रीवशैब्यप्रमुखैर्वराश्वै-
र्मनोजवैः काञ्चनभूषिताङ्गैः ।
संयुक्तमावेदयदच्युताय
कृताञ्जलिर्दारुको राजसिंह ॥ ३५ ॥
राजसिंह! सात्यकिका यह वचन सुनकर दारुकने मरकत, चन्द्रकान्त तथा सूर्यकान्त मणियोंकी ज्योतिर्मयी तरंगोंसे विभूषित उस उत्तम रथको, जिसका एक-एक अंग सुनहरे साजोंसे सजाया गया था तथा जिसके पहियोंपर सोनेके पत्र जड़े गये थे, जोतकर तैयार किया और हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णको इसकी सूचना दी। वह शीघ्रगामी रथ सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे उद्भासित हो तुरंतके उगे हुए सूर्यके समान प्रकाशित होता था, उसके भीतरी भागको नाना प्रकारकी विचित्र मणियोंसे विभूषित किया गया था। वह प्रतापी रथ विचित्र गरुड़चिह्नित ध्वजा और पताकासे सुशोभित था। उसमें सोनेके साजबाजसे सजे हुए अंगोंवाले, मनके समान वेगशाली, सुग्रीव और शैब्य आदि सुन्दर घोड़े जुते हुए थे ॥ ३३—३५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि महापुरुषस्तवे
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें महापुरुषस्तुतिविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 300)
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज
जनमेजय उवाच
शरत्तल्पे शयानस्तु भरतानां पितामहः ।
कथमुत्सृष्टवान् देहं कं च योगमधारयत् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— बाणशय्यापर सोये हुए भरतवंशियोंके पितामह भीष्मजीने किस प्रकार अपने शरीरका त्याग किया और उस समय उन्होंने किस योगकी धारणा की? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहितः ।
भीष्मस्य कुरुशार्दूल देहोत्सर्गं महात्मनः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! कुरुश्रेष्ठ! तुम सावधान, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर महात्मा भीष्मके देहत्यागका वृत्तान्त सुनो ॥ २ ॥
(शुक्लपक्षस्य चाष्टम्यां माघमासस्य पार्थिव ।
प्राजापत्ये च नक्षत्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥)
निवृत्तमात्रे त्वयन उत्तरे वै दिवाकरे ।
समावेशयदात्मानमात्मन्येव समाहितः ॥ ३ ॥
राजन्! जब दक्षिणायन समाप्त हुआ और सूर्य उत्तरायणमें आ गये, तब माघमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको रोहिणीनक्षत्रमें मध्याह्नके समय भीष्मजीने ध्यान-मग्न होकर अपने मनको परमात्मामें लगा दिया ॥ ३ ॥
विकीर्णांशुरादित्यो भीष्मः शरशतैश्चितः ।
शुशुभे परया लक्ष्म्या वृतो ब्राह्मणसत्तमैः ॥ ४ ॥
चारों ओर अपनी किरणें बिखेरनेवाले सूर्यके समान सैकड़ों बाणोंसे छिदे हुए भीष्म उत्तम शोभासे सुशोभित होने लगे, अनेकानेक श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें घेरकर बैठे थे ॥ ४ ॥
व्यासेन वेदविदुषा नारदेन सुरर्षिणा ।
देवस्थानेन वात्स्येन तथाश्मकसुमन्तुना ॥ ५ ॥
तथा जैमिनिना चैव पैलेन च महात्मना ।
शाण्डिल्यदेवलाभ्यां च मैत्रेयेण च धीमता ॥ ६ ॥
असितेन वसिष्ठेन कौशिकेन महात्मना ।
हारीतलोमशाभ्यां च तथाऽऽत्रेयेण धीमता ॥ ७ ॥
बृहस्पतिश्च शुक्रश्च च्यवनश्च महामुनिः ।
सनत्कुमारः कपिलो वाल्मीकिस्तुम्बुरुः कुरुः ॥ ८ ॥
मौद्गल्यो भार्गवो रामस्तृणबिन्दुर्महामुनिः ।
पिप्पलादोऽथ वायुश्च संवर्तः पुलहः कचः ॥ ९ ॥
काश्यपश्च पुलस्त्यश्च क्रतुर्दक्षः पराशरः ।
मरीचिरंगिराः काश्यो गौतमो गालवो मुनिः ॥ १० ॥
धौम्यो विभाण्डो माण्डव्यो धौम्रः कृष्णानुभौतिकः ।
उलूकः परमो विप्रो मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ ११ ॥
भास्करिः पूरणः कृष्णः सूतः परमधार्मिकः ।
एतैश्चान्यैर्मुनिगणैर्महाभागैर्महात्मभिः ॥ १२ ॥
श्रद्धादमशमोपेतैर्वृतश्चन्द्र इव ग्रहैः ।
वेदोंके ज्ञाता व्यास, देवर्षि नारद, देवस्थान, वात्स्य, अश्मक, सुमन्तु, जैमिनि, महात्मा पैल, शाण्डिल्य, देवल, बुद्धिमान् मैत्रेय, असित, वसिष्ठ, महात्मा कौशिक (विश्वामित्र), हारीत, लोमश, बुद्धिमान् दत्तात्रेय, बृहस्पति, शुक्र, महामुनि च्यवन, सनत्कुमार, कपिल, वाल्मीकि, तुम्बुरु, कुरु, मौद्गल्य, भृगुवंशी परशुराम, महामुनि तृणबिन्दु, पिप्पलाद, वायु, संवर्त, पुलह, कच, कश्यप, पुलस्त्य, क्रतु, दक्ष, पराशर, मरीचि, अंगिरा, काश्य, गौतम, गालव मुनि, धौम्य, विभाण्ड, माण्डव्य, धौम्र, कृष्णानुभौतिक, श्रेष्ठ ब्राह्मण उलूक, महामुनि मार्कण्डेय, भास्करि, पूरण, कृष्ण और परम धार्मिक सूत—ये तथा और भी बहुत-से सौभाग्यशाली महात्मा मुनि, जो श्रद्धा, शम, दम आदि गुणोंसे सम्पन्न थे, भीष्मजीको घेरे हुए थे। इन ऋषियोंके बीचमें भीष्मजी ग्रहोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे॥ ५—१२ १/२ ॥
भीष्मस्तु पुरुषव्याघ्रः कर्मणा मनसा गिरा ॥ १३ ॥
शरतल्पगतः कृष्णं प्रदध्यौ प्राञ्जलिः शुचिः ।
पुरुषसिंह भीष्म शरशय्यापर ही पड़े-पड़े हाथ जोड़ पवित्र भावसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करने लगे ॥ १३ १/२ ॥
स्वरेण हृष्टपुष्टेन तुष्टाव मधुसूदनम् ॥ १४ ॥
योगेश्वरं पद्मनाभं विष्णुं जिष्णुं जगत्पतिम् ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा वाग्विदां प्रवरः प्रभुः ॥ १५ ॥
भीष्मः परमधर्मात्मा वासुदेवमथास्तुवत् ।
ध्यान करते-करते वे हृष्ट-पुष्ट स्वरसे भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे। वाग्वेत्ताओंमें श्रेष्ठ, शक्तिशाली, परम धर्मात्मा भीष्मने हाथ जोड़कर योगेश्वर, पद्मनाभ, सर्वव्यापी, विजयशील जगदीश्वर वासुदेवकी इस प्रकार स्तुति आरम्भ की ॥ १४-१५ १/२ ॥
भीष्म उवाच
आरिराधयिषुः कृष्णं वाचं जिगदिषामि याम् ॥ १६ ॥
तया व्याससमासिन्या प्रीयतां पुरुषोत्तमः ।
**भीष्मजी बोले—**मैं श्रीकृष्णके आराधनकी इच्छा मनमें लेकर जिस वाणीका प्रयोग करना चाहता हूँ, वह विस्तृत हो या संक्षिप्त, उसके द्वारा वे पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों ॥ १६ १/२ ॥
शुचिं शुचिपदं हंसं तत्पदं परमेष्ठिनम् ॥ १७ ॥
युक्त्या सर्वात्मनाऽऽत्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ।
जो स्वयं शुद्ध हैं, जिनकी प्राप्तिका मार्ग भी शुद्ध है, जो हंसस्वरूप, तत् पदके लक्ष्यार्थ परमात्मा और प्रजापालक परमेष्ठी हैं, मैं सब ओरसे सम्बन्ध तोड़ केवल उन्हींसे नाता जोड़कर सब प्रकारसे उन्हीं सर्वात्मा श्रीकृष्णकी शरण लेता हूँ ॥ १७ १/२ ॥
अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः ॥ १८ ॥
एको यं वेद भगवान् धाता नारायणो हरिः ।
उनका न आदि है न अन्त। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं। उनको न देवता जानते हैं न ऋषि। एकमात्र सबका धारण-पोषण करनेवाले ये भगवान् श्रीनारायण हरि ही उन्हें जानते हैं ॥ १८ १/२ ॥
नारायणादृषिगणास्तथा सिद्धमहोरगाः ॥ १९ ॥
देवा देवर्षयश्चैव यं विदुः परमव्ययम् ।
नारायणसे ही ऋषिगण, सिद्ध, बड़े-बड़े नाग, देवता तथा देवर्षि भी उन्हें अविनाशी परमात्माके रूपमें जानने लगे हैं ॥ १९ १/२ ॥
देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ २० ॥
यं न जानन्ति को ह्येष कुतो वा भगवानिति ।
देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग भी जिनके विषयमें यह नहीं जानते हैं कि ‘ये भगवान् कौन हैं तथा कहाँसे आये हैं?’ ॥ २० १/२ ॥
यस्मिन् विश्वानि भूतानि तिष्ठन्ति च विशन्ति च ॥ २१ ॥
गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव ।
उन्हींमें सम्पूर्ण प्राणी स्थित हैं और उन्हींमें उनका लय होता है। जैसे डोरेमें मनके पिरोये होते हैं, उसी प्रकार उन भूतेश्वर परमात्मामें समस्त त्रिगुणात्मक भूत पिरोये हुए हैं ॥ २१ १/२ ॥
यस्मिन् नित्ये तते तन्तौ दृढे स्रगिव तिष्ठति ॥ २२ ॥
सदसद्ग्रथितं विश्वं विश्वाङ्गे विश्वकर्मणि ।
भगवान् सदा नित्य विद्यमान (कभी नष्ट न होनेवाले) और तने हुए एक सुदृढ़ सूतके समान हैं। उनमें यह कार्य-कारणरूप जगत् उसी प्रकार गुँथा हुआ है, जैसे सूतमें फूलकी माला। यह सम्पूर्ण विश्व उनके ही श्रीअंगमें स्थित है; उन्होंने ही इस विश्वकी सृष्टि की है ।। २२½ ।।
हरिं सहस्रशिरसं सहस्रचरणेक्षणम् ।। २३ ।। सहस्रबाहुमुकुटं सहस्रवदनोज्ज्वलम् । उन श्रीहरिके सहस्रों सिर, सहस्रों चरण और सहस्रों नेत्र हैं, वे सहस्रों भुजाओं, सहस्रों मुकुटों तथा सहस्रों मुखोंसे देदीप्यमान रहते हैं ।। २३½ ।।
प्राहुर्नारायणं देवं यं विश्वस्य परायणम् ।। २४ ।। अणीयसामणीयांसं स्थविष्ठं च स्थवीयसाम् । गरीयसां गरिष्ठं च श्रेष्ठं च श्रेयसामपि ।। २५ ।। वे ही इस विश्वके परम आधार हैं। इन्हींको नारायणदेव कहते हैं। वे सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और स्थूलसे भी स्थूल हैं। वे भारी-से-भारी और उत्तमसे भी उत्तम हैं ।।
यं वाकेष्वनुवाकेषु निषत्सूपनिषत्सु च । गृणन्ति सत्यकर्माणं सत्यं सत्येषु सामसु ।। २६ ।। वाकों¹, और अनुवाकोंमें², निषदों³, और उपनिषदोंमें⁴ तथा सच्ची बात बतानेवाले साममन्त्रोंमें उन्हींको सत्य और सत्यकर्मा कहते हैं ।। २६ ।।
चतुर्भिश्चतुरात्मानं सत्त्वस्थं सात्वतां पतिम् । यं दिव्यैर्देवमर्चन्ति गुह्यैः परमनामभिः ।। २७ ।। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार दिव्य गोपनीय और उत्तम नामोंद्वारा ब्रह्म, जीव, मन और अहंकार—इन चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए उन्हीं भक्तप्रतिपालक भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की जाती है, जो सबके अन्तःकरणमें विद्यमान हैं ।। २७ ।।
यस्मिन् नित्यं तपस्तप्तं यदङ्गेष्वनुतिष्ठति । सर्वात्मा सर्ववित् सर्वः सर्वज्ञः सर्वभावनः ।। २८ ।। भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये ही नित्य तपका अनुष्ठान किया जाता है; क्योंकि वे सबके हृदयोंमें विराजमान हैं। वे सबके आत्मा, सबको जाननेवाले, सर्वस्वरूप, सर्वज्ञ और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं ।।
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् । भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै दीप्तमग्निमिवारणिः ।। २९ ।। जैसे अरणि प्रज्वलित अग्निको प्रकट करती है, उसी प्रकार देवकीदेवीने इस भूतलपर रहनेवाले ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञोंकी रक्षाके लिये उन भगवान्को वसुदेवजीके तेजसे प्रकट
किया था॥ २९॥ यमनन्यो व्यपेताशीरात्मानं वीतकल्मषम् । दृष्ट्यानन्त्याय गोविन्दं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ ३० ॥ अतिवाग्विन्द्रकर्माणमतिसूर्यातितेजसम् । अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥ ३१ ॥ सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके अनन्यभावसे स्थित रहनेवाला साधक मोक्षके उद्देश्यसे अपने विशुद्ध अन्तःकरणमें जिन पापरहित शुद्ध-बुद्ध परमात्मा गोविन्दका ज्ञानदृष्टिसे साक्षात्कार करता है, जिनका पराक्रम वायु और इन्द्रसे बहुत बढ़कर है, जो अपने तेजसे सूर्यको भी तिरस्कृत कर देते हैं तथा जिनके स्वरूपतक इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी भी पहुँच नहीं हो पाती, उन प्रजापालक परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ॥ ३०-३१॥ पुराणे पुरुषं प्रोक्तं ब्रह्म प्रोक्तं युगादिषु । क्षये संकर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्महे ॥ ३२ ॥ पुराणोंमें जिनका 'पुरुष' नामसे वर्णन किया गया है, जो युगोंके आरम्भमें 'ब्रह्म' और युगान्तमें 'संकर्षण' कहे गये हैं, उन उपास्य परमेश्वरकी हम उपासना करते हैं॥ ३२॥ यमेकं बहुधाऽऽत्मानं प्रादुर्भूतमधोक्षजम् । नान्यभक्ताः क्रियावन्तो यजन्ते सर्वकामदम् ॥ ३३ ॥ यमाहुर्जगतः कोशं यस्मिन् संनिहिताः प्रजाः । यस्मिँल्लोकाः स्फुरन्तीमे जले शकुनयो यथा ॥ ३४ ॥ ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म यत् तत् सदसतः परम् । अनादिमध्यपर्यन्तं न देवा नर्षयो विदुः ॥ ३५ ॥ यं सुरासुरगन्धर्वाः सिद्धा ऋषिमहोरगाः । प्रयता नित्यमर्चन्ति परमं दुःखभेषजम् ॥ ३६ ॥ अनादिनिधनं देवमात्मयोनिं सनातनम् । अप्रेक्ष्यमनभिज्ञेयं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ ३७ ॥ जो एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं, जो इन्द्रियों और उनके विषयोंसे ऊपर उठे होनेके कारण 'अधोक्षज' कहलाते हैं, उपासकोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, यज्ञादि कर्म और पूजनमें लगे हुए अनन्य भक्त जिनका यजन करते हैं, जिन्हें जगत्का कोषागार कहा जाता है, जिनमें सम्पूर्ण प्रजाएँ स्थित हैं, पानीके ऊपर तैरनेवाले जलपक्षियोंकी तरह जिनके ही ऊपर इस सम्पूर्ण जगत्की चेष्टाएँ हो रही हैं, जो परमार्थ सत्यस्वरूप और एकाक्षर ब्रह्म (प्रणव) हैं, सत् और असत्से विलक्षण हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जिन्हें न देवता ठीक-ठीक जानते हैं और न ऋषि, अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सम्पूर्ण देवता, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि, बड़े-बड़े नागगण जिनकी सदा पूजा किया करते हैं, जो दुःखरूपी रोगकी सबसे बड़ी ओषधि हैं, जन्म-
मरणसे रहित, स्वयम्भू एवं सनातन देवता हैं, जिन्हें इन चर्म-चक्षुओंसे देखना और बुद्धिके द्वारा सम्पूर्णरूपसे जानना असम्भव है, उन भगवान् श्रीहरि नारायण देवकी मैं शरण लेता हूँ।। ३३—३७।। यं वै विश्वस्य कर्तारं जगतस्तस्थुषां पतिम्। वदन्ति जगतोऽध्यक्षमक्षरं परमं पदम् ।। ३८ ।। जो इस विश्वके विधाता और चराचर जगत्के स्वामी हैं, जिन्हें संसारका साक्षी और अविनाशी परमपद कहते हैं, उन परमात्माकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।। हिरण्यवर्णं यं गर्भमदितेर्दैत्यनाशनम् । एकं द्वादशधा जज्ञे तस्मै सूर्यात्मने नमः ।। ३९ ।। जो सुवर्णके समान कान्तिमान्, अदितिके गर्भसे उत्पन्न, दैत्योंके नाशक तथा एक होकर भी बारह रूपोंमें प्रकट हुए हैं, उन सूर्यस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ।। ३९ ।। शुक्ले देवान् पितॄन् कृष्णे तर्पयत्यमृतेन यः । यश्च राजा द्विजातीनां तस्मै सोमात्मने नमः ।। ४० ।। जो अपनी अमृतमयी कलाओंसे शुक्लपक्षमें देवताओंको और कृष्णपक्षमें पितरोंको तृप्त करते हैं तथा जो सम्पूर्ण द्विजोंके राजा हैं, उन सोमस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ।। ४० ।। (हुताशनमुखैर्देवैर्धार्यते सकलं जगत् । हविःप्रथमभोक्ता यस्तस्मै होत्रात्मने नमः ॥) अग्नि जिनके मुख हैं, वे देवता सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं, जो हविष्यके सबसे पहले भोक्ता हैं, उन अग्निहोत्रस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ।। महत्तस्तमसः पारे पुरुषं ह्यतितेजसम् । यं ज्ञात्वा मृत्युमत्येति तस्मै ज्ञेयात्मने नमः ।। ४१ ।। जो अज्ञानमय महान् अन्धकारसे परे और ज्ञानालोकसे अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले आत्मा हैं, जिन्हें जान लेनेपर मनुष्य मृत्युसे सदाके लिये छूट जाता है, उन ज्ञेयरूप परमेश्वरको नमस्कार है ।। ४१ ।। यं बृहन्तं बृहत्युक्थे यमग्नौ यं महाध्वरे । यं विप्रसंघा गायन्ति तस्मै वेदात्मने नमः ।। ४२ ।। उक्थनामक बृहत् यज्ञके समय, अग्न्याधानकालमें तथा महायागमें ब्राह्मणवृन्द जिनका ब्रह्मके रूपमें स्तवन करते हैं, उन वेदस्वरूप भगवान्को नमस्कार है ।। ४२ ।। ऋग्यजुःसामधामानं दशार्धहविरात्मकम् । यं सप्ततन्तुं तन्वन्ति तस्मै यज्ञात्मने नमः ।। ४३ ।। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद जिसके आश्रय हैं, पाँच प्रकारका हविष्य जिसका स्वरूप है, गायत्री आदि सात छन्द ही जिसके सात तन्तु हैं, उस यज्ञके रूपमें प्रकट हुए
परमात्माको प्रणाम है ॥ ४३ ॥ चतुर्भिborder चतुर्भिborder द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै होमात्मने नमः ॥ ४४ ॥ चार¹, चार², दो³, पाँच⁴ और दो⁵—इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंसे जिन्हें हविष्य अर्पण किया जाता है, उन होमस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ४४ ॥ यः सुपर्णा यजुर्नामच्छन्दोगात्रस्त्रिवृच्छिराः । रथन्तरं बृहत् साम तस्मै स्तोत्रात्मने नमः ॥ ४५ ॥ जो 'यजुः' नाम धारण करनेवाले वेदरूपी पुरुष हैं, गायत्री आदि छन्द जिनके हाथ-पैर आदि अवयव हैं, यज्ञ ही जिनका मस्तक है तथा 'रथन्तर' और 'बृहत्' नामक साम ही जिनकी सान्त्वनाभरी वाणी है, उन स्तोत्ररूपी भगवान्को प्रणाम है ॥ ४५ ॥ यः सहस्रसमे सत्रे जज्ञे विश्वसृजामृषिः । हिरण्यपक्षः शकुनिस्तस्मै हंसात्मने नमः ॥ ४६ ॥ जो ऋषि हजार वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले प्रजापतियोंके यज्ञमें सोनेकी पाँखोंवाले पक्षीके रूपमें प्रकट हुए थे, उन हंसरूपधारी परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ४६ ॥ पादाङ्गं संधिपर्वाणं स्वरव्यञ्जनभूषणम् । यमाहुरक्षरं दिव्यं तस्मै वागात्मने नमः ॥ ४७ ॥ पदोंके समूह जिनके अंग हैं, सन्धि जिनके शरीरकी जोड़ हैं, स्वर और व्यंजन जिनके लिये आभूषणका काम देते हैं तथा जिन्हें दिव्य अक्षर कहते हैं, उन परमेश्वरको वाणीके रूपमें नमस्कार है ॥ ४७ ॥ यज्ञाङ्गो यो वराहो वै भूत्वा गामुज्जहार ह । लोकत्रयहितार्थाय तस्मै वीर्यात्मने नमः ॥ ४८ ॥ जिन्होंने तीनों लोकोंका हित करनेके लिये यज्ञमय वराहका स्वरूप धारण करके इस पृथ्वीको रसातलसे ऊपर उठाया था, उन वीर्यस्वरूप भगवान्को प्रणाम है ॥ यः शेते योगमास्थाय पर्यङ्के नागभूषिते । फणासहस्ररचिते तस्मै निद्रात्मने नमः ॥ ४९ ॥ जो अपनी योगमायाका आश्रय लेकर शेषनागके हजार फनोंसे बने हुए पलंगपर शयन करते हैं, उन निद्रास्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ४९ ॥ (विश्वे च मरुतश्चैव रुद्रादित्याश्विनावपि । वसवः सिद्धसाध्याश्च तस्मै देवात्मने नमः ॥ विश्वेदेव, मरुद्गण, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, वसु, सिद्ध और साध्य—ये सब जिनकी विभूतियाँ हैं, उन देवस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ अव्यक्तबुद्ध्यहंकारमनोबुद्धीन्द्रियाणि च । तन्मात्राणि विशेषाश्च तस्मै तत्त्वात्मने नमः ॥