महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रश्नोंका उत्तर देनेवाले ज्योतिषियोंको भी संतुष्ट किया ॥ ६ ॥ पुरोहिताय धौम्याय प्रादादयुतः स गाः । धनं सुवर्णं रजतं वासांसि विविधान्यपि ॥ ७ ॥ अपने पुरोहित धौम्यजीको उन्होंने दस हजार गौएँ, धन, सोना, चाँदी तथा नाना प्रकारके वस्त्र दिये ॥ ७ ॥ कृपाय च महाराज गुरुवृत्तिमवर्तत । विदुराय च राजासौ पूजां चक्रे यतव्रतः ॥ ८ ॥ महाराज! राजाने कृपाचार्यके साथ वही बर्ताव किया, जो एक शिष्यको अपने गुरुके साथ करना चाहिये। नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले युधिष्ठिरजीने विदुरजीका भी पूजनीय पुरुषकी भाँति सम्मान किया ॥ ८ ॥ भक्ष्यान्नपानैर्विविधैर्वासोभिः शयनासनैः । सर्वान् संतोषयामास संश्रितान् ददतां वरः ॥ ९ ॥ दाताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने समस्त आश्रित जनोंको खाने-पीनेकी वस्तुएँ, भाँति-भाँतिके कपड़े, शय्या तथा आसन देकर संतुष्ट किया ॥ ९ ॥ लब्धप्रशमनं कृत्वा स राजा राजसत्तम । युयुत्सोर्धार्तराष्ट्रस्य पूजां चक्रे महायशाः ॥ १० ॥ धृतराष्ट्राय तद् राज्यं गान्धार्यै विदुराय च । निवेद्य सुस्थवद् राजा सुखमास्ते युधिष्ठिरः ॥ ११ ॥ नृपश्रेष्ठ! महायशस्वी राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार प्राप्त हुए धनका यथोचित विभाग करके उसकी शान्ति की तथा युयुत्सु एवं धृतराष्ट्रका विशेष सत्कार किया। धृतराष्ट्र, गान्धारी तथा विदुरजीकी सेवामें अपना सारा राज्य समर्पित करके राजा युधिष्ठिर स्वस्थ एवं सुखी हो गये ॥ १०-११ ॥ तथा सर्वं स नगरं प्रसाद्य भरतर्षभ । वासुदेवं महात्मानमभ्यगच्छत् कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥ भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार सम्पूर्ण नगरकी प्रजाको प्रसन्न करके वे हाथ जोड़कर महात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके पास गये ॥ १२ ॥ ततो महति पर्यङ्के मणिकाञ्चनभूषिते । ददर्श कृष्णमासीनं नीलमेघसमद्युतिम् ॥ १३ ॥ जाज्वल्यमानं वपुषा दिव्याभरणभूषितम् । पीतकौशेयवसनं हेम्नेवोपगतं मणिम् ॥ १४ ॥ उन्होंने देखा, भगवान् श्रीकृष्ण मणियों तथा सुवर्णसे भूषित एक बड़े पलंगपर बैठे हैं, उनकी श्याम सुन्दर छवि नील मेघके समान सुशोभित हो रही है। उनका श्रीविग्रह दिव्य तेजसे उद्भासित हो रहा है। एक-एक अङ्ग दिव्य आभूषणोंसे विभूषित है। श्याम शरीरपर