महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरेशमी पीताम्बर धारण किये भगवान् सुवर्णजटित नीलमके समान जान पड़ते हैं॥ १३-१४॥ कौस्तुभेनोरसिस्थेन मणिनाभिविराजितम्। उद्यतेवोदयं शैलं सूर्येणाभिविराजितम्॥ १५॥ उनके वक्षःस्थलपर स्थित हुई कौस्तुभमणि अपना प्रकाश बिखेरती हुई उसी प्रकार उनकी शोभा बढ़ाती है, मानो उगते हुए सूर्य उदयाचलको प्रकाशित कर रहे हों॥ १५॥ नौपम्यं विद्यते तस्य त्रिषु लोकेषु किंचन। सोऽभिगम्य महात्मानं विष्णुं पुरुषविग्रहम्॥ १६॥ उवाच मधुरं राजा स्मितपूर्वमिदं तदा। भगवान्की उस दिव्य झाँकीकी तीनों लोकोंमें कहीं उपमा नहीं थी। राजा युधिष्ठिर मानवविग्रहधारी उन परमात्मा विष्णुके समीप जाकर मुसकराते हुए मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले—॥ १६ १/२॥ सुखेन ते निशा कच्चिद् व्युष्टा बुद्धिमतां वर॥ १७॥ कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत। ‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अच्युत! आपकी रात सुखसे बीती है न? सारी ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न तो हैं न?॥ १७ १/२॥ तथैवोपाश्रिता देवी बुद्धिर्बुद्धिमतां वर॥ १८॥ वयं राज्यमनुप्राप्ताः पृथिवी च वशे स्थिता। तव प्रसादाद् भगवंस्त्रिलोकगतिविक्रम॥ १९॥ जयं प्राप्ता यशश्चाग्र्यं न च धर्मच्युता वयम्। ‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! बुद्धिदेवीने आपका आश्रय लिया है न? प्रभो! हमने आपकी ही कृपासे राज्य पाया है और यह पृथ्वी हमारे अधिकारमें आयी है। भगवन्! आप ही तीनों लोकोंके आश्रय और पराक्रम हैं। आपकी ही दयासे हमने विजय तथा उत्तम यश प्राप्त किये हैं और धर्मसे भ्रष्ट नहीं हुए हैं’॥ १८-१९ १/२॥ तं तथा भाषमाणं तु धर्मराजमरिंदमम्। नोवाच भगवान् किंचिद् ध्यानमेवान्वपद्यत॥ २०॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रकार कहते चले जा रहे थे; परंतु भगवान्ने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। वे उस समय ध्यानमें मग्न थे॥ २०॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कृष्णं प्रति युधिष्ठिरवाक्ये पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्णके प्रति युधिष्ठिरका वचनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥