महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् सदा नित्य विद्यमान (कभी नष्ट न होनेवाले) और तने हुए एक सुदृढ़ सूतके समान हैं। उनमें यह कार्य-कारणरूप जगत् उसी प्रकार गुँथा हुआ है, जैसे सूतमें फूलकी माला। यह सम्पूर्ण विश्व उनके ही श्रीअंगमें स्थित है; उन्होंने ही इस विश्वकी सृष्टि की है ।। २२½ ।।
हरिं सहस्रशिरसं सहस्रचरणेक्षणम् ।। २३ ।। सहस्रबाहुमुकुटं सहस्रवदनोज्ज्वलम् । उन श्रीहरिके सहस्रों सिर, सहस्रों चरण और सहस्रों नेत्र हैं, वे सहस्रों भुजाओं, सहस्रों मुकुटों तथा सहस्रों मुखोंसे देदीप्यमान रहते हैं ।। २३½ ।।
प्राहुर्नारायणं देवं यं विश्वस्य परायणम् ।। २४ ।। अणीयसामणीयांसं स्थविष्ठं च स्थवीयसाम् । गरीयसां गरिष्ठं च श्रेष्ठं च श्रेयसामपि ।। २५ ।। वे ही इस विश्वके परम आधार हैं। इन्हींको नारायणदेव कहते हैं। वे सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और स्थूलसे भी स्थूल हैं। वे भारी-से-भारी और उत्तमसे भी उत्तम हैं ।।
यं वाकेष्वनुवाकेषु निषत्सूपनिषत्सु च । गृणन्ति सत्यकर्माणं सत्यं सत्येषु सामसु ।। २६ ।। वाकों¹, और अनुवाकोंमें², निषदों³, और उपनिषदोंमें⁴ तथा सच्ची बात बतानेवाले साममन्त्रोंमें उन्हींको सत्य और सत्यकर्मा कहते हैं ।। २६ ।।
चतुर्भिश्चतुरात्मानं सत्त्वस्थं सात्वतां पतिम् । यं दिव्यैर्देवमर्चन्ति गुह्यैः परमनामभिः ।। २७ ।। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार दिव्य गोपनीय और उत्तम नामोंद्वारा ब्रह्म, जीव, मन और अहंकार—इन चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए उन्हीं भक्तप्रतिपालक भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की जाती है, जो सबके अन्तःकरणमें विद्यमान हैं ।। २७ ।।
यस्मिन् नित्यं तपस्तप्तं यदङ्गेष्वनुतिष्ठति । सर्वात्मा सर्ववित् सर्वः सर्वज्ञः सर्वभावनः ।। २८ ।। भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये ही नित्य तपका अनुष्ठान किया जाता है; क्योंकि वे सबके हृदयोंमें विराजमान हैं। वे सबके आत्मा, सबको जाननेवाले, सर्वस्वरूप, सर्वज्ञ और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं ।।
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् । भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै दीप्तमग्निमिवारणिः ।। २९ ।। जैसे अरणि प्रज्वलित अग्निको प्रकट करती है, उसी प्रकार देवकीदेवीने इस भूतलपर रहनेवाले ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञोंकी रक्षाके लिये उन भगवान्को वसुदेवजीके तेजसे प्रकट